अवध की ऐतिहासिक धरोहरों को अतिक्रमण और प्रदूषण निगल रहा
सदियों पुरानी अवध की स्थापत्य कला की बेजोड़ कारीगरी और नवाबी शान ओ शौकत की प्रतीक लखनऊ की ऐतिहासिक धरोहरें समुचित रखरखाव के अभाव में खंडहर की शक्ल अख्तियार करती जा रही है।
लखौरी ईटों और बादामी चूने के अलावा अलग-अलग किस्मों की दालों से निर्मित इन इमारतों पर अद्भुत नक्काशी मुगल सल्तनत की अनूठी दास्तां बयां करने के लिये काफी हैं, मगर हाल के दशकों में वाहनों की तादाद में जबरदस्त इजाफा और उनसे निकलते धुएं के गुबार ने इमारतों की चमक फीकी कर दी है।
भारतीय पुरातत्व विभाग भी ऐतिहासिक धरोहरों की गरिमा को बरकरार रखने में नाकाम रहा है। इसका उदाहरण है कि कई इमारतें जर्जर खंडहर की शक्ल में तब्दील हो चुकी है, जबकि कई में लोगों ने अतिक्रमण कर दुकानों और आशियानों में तब्दील कर लिया है। इतिहासविदों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि इन इमारतों और दरवाजों कों बचाने का यदि कोई ठोस प्रयास न किया गया तो लखनऊ ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की स्थापत्य कला के बेहतरीन नमूनों में से एक इन शाही इमारतों और दरवाजों को बहुत दिनों तक कायम रख पाना मुश्किल होगा।
लखनऊ के प्रतीक चिन्हों में से एक रुमी दरवाजा अपनी प्रभावशाली एवं आकर्षक स्थापत्य कला के कारण देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। सन् 1784 में निर्मित साठ फीट विशाल दरवाजे का संबंध नवाब आसफुद्दौला से है। उन्होंने उस वक्त पडे़ अकाल में गरीबों के जीविकोपार्जन के लिए दस दरवाजे समेत कई इमारतों का निर्माण कराया था।
बडे़ इमामवाड़े के पश्चिम में स्थित तीन खानों वाला यह दरवाजा ईटों और बादमी चूने की बेहतरीन कारीगरों से निर्मित है। इसमें लोहे या लकड़ी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं हुआ है। इसके ऊपरी हिस्से पर एक अष्टधातु की छतरी बनी हुई है। यहां तक जाने के लिए सीढ़ियां भी हैं। पश्चिम की ओर से इसकी संरचना त्रिपोलिया है और पूर्वी ओर से यह पंचमहल की तरह दिखाई देता है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि पुरातत्व विभाग की ओर से सरकार को सलाह दी गयी है कि इसके नीचे से भारी वाहनों का गुजरना तत्काल बंद किया जाना चाहिए क्योंकि इनके गुजरने से सड़क पर होने वाले कंपन से इसको भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है। वाहनों के धुएं से भी इसे क्षति पहुंचती है। इसका रंग रोगन काला पड़ता है तथा प्लास्टर का क्षरण भी होता है।
उन्होने बताया कि हालांकि अब इसके रखरखाव और मरम्मत का काम चल रहा है। एक अनुमान के अनुसार इससे होकर प्रतिदिन करीब बीस हजार वाहन गुजरते हैं। जब इसका निर्माण हुआ था उस जमाने में हाथगाडी,बैलगाडी तथा तांगे इक्के ही इसके नीचे से गुजरते थे। पुरातत्व विभाग दूरसंचार,बिजली विभाग एवं जल संस्थान के केबिलों और पाइपों को गड्ढा खोदकर इसके नीचे से निकालने के खिलाफ है। इससे इसकी नींव को क्षति पहुंचती है पर विभाग के आपत्ति के बावजूद खनन कार्य जारी रहता है।
बेगम हजरत महल पार्क के दक्षिणी हिस्से में स्वतंत्रता संग्राम से गहरा ताल्लुक रखने वाले हल्के पीले रंग में पुता एक शेर दरवाजा सन 1857 की जनक्रांति का केंद्र रहा है। लखनऊ-कानपुर मार्ग पर आलमबाग कोठी में एक अन्य शाही दरवाजा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान की गाथा को समेटे हुए फांसी दरवाजा के नाम से जाना जाता है । सन 1857 के स्वाधीनता संग्रामियों को अंग्रेज जनरल आउटरस इसी दरवाजे पर फांसी दिया करता था।
कैसरबाग बारादरी के पूर्व व पश्चिम में दो दरवाजे हैं। इन्हीं दरवाजों के बीच में कैसरबाग महल का पूरा क्षेत्र आता है। नवाब वाजिद अली शाह ने 185० में इन दरवाजों को एक लाख रुपयों में बनवाया था, जिससे इनका नाम लाखी दरवाजा भी पड़ा। नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में इसके ऊपरी हिस्से पर सुनहरे गुम्बद के छत्र में सल्तनत अवध का झंडा फहराया जाता था। हर कलाकृति को सजा संवार कर सजीवता प्रदान की जाती थी। ये दरवाजे कैसरबाग क्षेत्र की शोभा को निखाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे।
इन दोनों दरवाजों की हालत ठीक नहीं है। इसके नीचे से तिपाहिया वाहनों का मार्ग निर्धारित कर दिया गया है जिससे इसके नीचे यातायात का दबाव रहता है और प्रदूषण तथा अतिक्रमण जोरो पर है। ऐतिहासिक बाजार चौक में दो दरवाजे हैं, जिन्हें अकबरी दरवाजा तथा गोल दरवाजा कहा जाता है। अकबरी दरवाजे का निर्माण कार्य बादशाह अकबर ने अपने खास र्कांरदे काजी महमूद बिलग्रामी को सौंपा था। लखौरी ईंद व चूने से यह दरवाजा खास आकर्षण वाला तो नहीं है, पर यह लखनऊ को मुगल इतिहास से जोड़ता है।
अवध के तीसरे बादशाह नवाब मोहम्मद अली शाह के दामाद मोहसिनउद्दौला की बेगम ने चौक में एक बेहतरीन गोल दरवाजा बनवाया। नवाबी दौर में अकबरी गेट से लेकर गोल दरवाजे तक खूबसूरत चौक बाजार था, जहां रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के अलावा जरी, गोटा, इत्र, जर्दा, तम्बाकू, फूल गजरों ,चांदी और चिकन का व्यापार होता था तथा दूर-दूर तक यहां का सामान भेजा जाता था। इस दरवाजे के साथ साथ बने दो हाथियों को अंग्रेजी हुकूमत में तोड़ दिया गया था। छोटा इमामबाडे के सामने की सडक पर पूर्व एवं पश्चिम में दो दरवाजे हैं, जिन्हें अवध के तीसरे बादशाह मोहम्मद अली शाह ने इसी इमामबाडे़ के साथ बनवाया था। तीन-तीन शानों वाले इन दरवाजों को छोटा इमामबाड़ा का पहला दरवाजा तथा दूसरा दरवाजा कहा जाता है। सफेद रंग में पुते ये दरवाजे छोटे इमामबाडे़ की शान में काफी इजाफा करते हैं। कोई-कोई इन्हें त्रिपोलिया दरवाजा भी कहता है।
सिकंदरबाग चौराहे के पास सिकंदरबाग गेट नाम से एक शाही दरवाजा है, जिसका पुरातत्व विभाग द्वारा जीर्णोद्धार किया गया है। बड़े-बडे़ होर्डिगों से घिरा होने के कारण इसकी भव्यता तथा शान इन्हीं में छुप जाती है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम का केंद्र बनी रेजीडेंसी के फाटक को वाटरगेट नाम दिया गया था। इससे भी स्वतंत्रता संग्राम से गहरा ताल्लुक रखने वाले कई किस्से जुडे़ हैं।
पुरातत्व विभाग इन दरवाजों को बचाये रखने के लिए प्रयास कर रहा है। महत्वपूर्ण दरवाजों के पास सूचना पट लगाए गए हैं जिन पर कई तरह के निर्देश लिखे हैं। हालांकि उनका कितना पालन हो रहा है यह वहां थोडी देर रुककर आकंलन करने पर ही पता लग जाता है।

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