Wednesday, October 7, 2015

आधुनिकता की चकाचौंध में गुम होती कजरी

भारतीय संस्कृति में लोकगीतों की विशेष परम्परा रही है। ये लोकगीत विभिन्न अवसरों, उत्सवों और ऋतुओं में गाए जाते हैं। ऐसे लोकगीतों में कजरी का विशेष महत्व है, जो सावन में गायी जाती है लेकिन आधुनिकता की दौड़ में बदलते जीवन मूल्यों के कारण कजरी गीत लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। 
      रिमझिम बरसात की फुहारों में कजरी गीत प्रेमीजनों के मन में मिलन की उत्कंठा राग उत्पन्न करते हैं तो वियोगीजनों को विरह की वेदना से भर देते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भाद्रपद में कृष्णपक्ष की तृतीया को ‘‘कजरी तीज’’ पर्व के दौरान कजरी के गीतों की धूम मच जाती है। कजरी लोक संस्कृति की जड़ है। इसने लोकजीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। इसमें ग्रामीण परिवेश, ऋतुओं और सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति होती है। अपनी मधुरता के कारण कजरी को लोकगीतों की रानी भी कहा जाता है।        
              कजरी लोकगीतों की उत्पत्ति कैसे हुई, इस बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता।  मेरठ के इस्माइल डिग्री कालेज के संगीत विभाग की अध्यक्ष डा. रेखा सेठ और समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डा. दीप्ति कौशिक ने इस बारे में बताया कि हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग के साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा है कि मध्य भारत में राजा दानो राव की मृत्यु के बाद वियोग में उनकी पत्नी नागमती ने आत्महत्या कर ली थी। इस दुख से पीड़ति जनता के रुदन से जो राग उत्पन्न हुआ, वही आगे चलकर कजरी लोकगीत कहलाया। 
       डॉ. रेखा ने कहा कि कजरी लोकगीतों की मिठास से कवि, शायर, और साहित्यकार भी अछूते नहीं रहे हैं। सन्त कवि लक्ष्मीसखी, रसिक किशोरी, अमीर खुसरो, बहादुरशाह जफर, सुप्रसिद्ध शायर सैयद अली मुहम्मद, हिन्दी कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बद्रीनारायण उपाध्याय ‘ प्रेमधन’ सूरदास और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इसके उदाहरण है, जिन्होंने बड़े ही सुंदर ढंग से कजरी गीतों की अभिव्यक्ति की है। 

डा. रेखा ने कहा कि भारतीय संस्कृति की लोकगीतों की परम्परा बदलते जीवन मूल्यों और परिवेश में दम तोड़ती जा रही है और कजरी भी इसका अपवाद नहीं है। हालांकि गांवों में अब भी कुछ महिलाएं कजरी गीतों की इस परम्परा को किसी तरह जीवित रखे हुए हैं लेकिन ‘‘ घिर घिर आयी बदरिया, सजन घर नाहीं रे रामा और धीमे धीमे बरसो रे बदरिया जैसे कजरी गीत पृष्ठभूमि में पहुंचते जा रहे हैं। नयी पीढ़ी के लिए इन लोकगीतों के कोई मायने नहीं रह गए हैं। इंटरनेट और मोबाइल फोन के इस जमाने में लोगों के पास अपनी लोकसंस्कृति को जानने-समझने की फुर्सत नहीं रह गयी है। बदलते परिवेश में लोगों ने लोकगीतों की तुलना में द्विअर्थी और फूहड़ता से भरे गानों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। लोकगीतों में रस प्रधान होता है जबकि आज के उपभोक्तावादी युग में रस नहीं, शोर प्रधान हो गया है।  
कुछ अंचलों की अब भी लोकगीत विधा          
                       डॉ़ रेखा ने कहा कि नगरीय सभ्यता में पले-बढ़े लोग भले ही अपनी समृद्ध धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय उपशास्त्रीय बन्दिशों में रची कजरी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की अब भी खास लोकगीत विधा है। सात समन्दर पार रह रहे प्रवासी भारतीयों को अभी भी कजरी के बोल सुहाने लगते हैं, तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन, सूरीनाम आदि देशों में अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी कजरी गीतों में जीवन के विभिन्न पहलुओं का समावेश है। संयोग, श्रृंगार, प्रेम, विरह आदि भावों की इन गीतों में बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कजरी में ननद-भौजाई की छेड़छाड़ की अभिव्यक्ति बड़े ही मनोहर ढंग से की गयी है।‘‘ कैसे खेले जाबू सावन में कजरिया बदरिया घेरे आवे ननदी’’। उन्होंने बताया कि कजरी में विरहिणी की विरह वेदना और प्रेम की अभिव्यक्ति इससे अच्छी नहीं हो सकती। ‘‘ रेलिया बैरन पिया को लिये जायो रे रेलिया बैरन’’। ‘‘अपने बलमा को जगावे सांवर गोरिया, चुड़यिा से मार मार के’’।                                           
                     डा. रेखा ने बताया कि कजरी के मूलत: तीन रूप हैं: मिर्जापुरी, बनारसी, और गोरखपुरी । बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का उपयोग होता है। ‘‘ बीरन भइया अइले अनवइया, सवनवा में न जइबे ननदी’’ जबकि अपनी अनूठी सांस्कृतिक परम्पराओं के लिए मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसंद करते है। इसमे सखी सहेलियों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है। 
       ‘‘ पिया सड़यिा लिया दा मिर्जापुरी पिया रंग रहे कपूरी पिया ना, जब से साड़ी न लिअइबा तब से जेवना न बनइबे, तोहरे जेवना पे लगिहें मजूरी पिया रंग रहे कपूरी पिया ना’’।
   डा. रेखा ने कजरी गीत का प्राचीन उदाहरण देते हुए बताया कि तेरहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो की प्रचलित रचना ‘‘ अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया’’ को गायक कलाकार प्रमुख स्थान देते हैं। भारत में अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की एक रचना भी प्रमुख है ‘‘ झूला किन डारो रे अमरैयां में ’’।              डा. कौशिक ने बताया कि लोकजीवन की ऊर्जा और रंगत बनाए रखने वाले कजरी लोकगीतों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान युवाओं में लोक चेतना का संचार किया था। आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेज हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए कजरी के गीतों ने ही सुप्त चेतनाओं में जान फूंकी थी। ‘‘ लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु, मरद से बनिके लुगइया रे हरि, पहिर के साड़ी, चूड़ी मुंहवा छिपाई लेहु रखि लेह तोहरी पगड़यिा रे हरि’’। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकूमत को जिन लोगों से अधिक खतरा था, उन्हें उसने ’’कालापानी’’ की सजा दी। अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला ‘‘कजरी’’ के बोलों में गाती है-- रे रामा नागर नैया जाला काले पानी रे हारी, सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा, नागर नैया जाला काले पानी रे हरी। घरवा में रोवे नागर, माई और बहिनियां रामा, सेजिया पै रोवे बारी धनिया रे हरी’’।
                डा. कौशिक ने बताया कि कजरी ने गायक कलाकारों को ही नहीं, वादक को भी अपने मोहपाश में बांधा है। विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। हिन्दी फिल्मों में भी कजरी लोकगीतों पर आधारित सुमधुर गीतों की रचना हुई है। वर्ष 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘‘ बिदेसिया’’ में इस शैली का अत्यन्त मौलिक रूप में प्रयोग किया गया था।
               कजरी में सावन में पति से दूर पत्नी की विरह व्यथा वर्णन करने वाले अनेक गीत गीत हैं, यथा- ‘‘ घेरि घेरि आई सावन के बदरिया ना, पानी बरसै बड़ी जोर। सूझे नहीं चारों ओर, जब से गइले हो विदेश, भेजे न सन्देश, कोह लीन्ही नाहीं हमारी खबरिया ना। बोले दादुर वन मोर, सुनकै पपिहा का सोर, जिया ना ही लागै सूनी अटरिया ना जो न अइहों मोर संवरिया फीकी लागे मोहे कजरिया।



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