जिस वर्ष देश ने गुलामी की जंजीरें उतार कर आजादी के कंगन पहने और सुहाग का सेज सजाया, उस वर्ष उत्तर प्रदेश के गोंडा के ग्राम परसपुर मेंं 22 अक्टूबर की आंखें खोली रामनाथ सिंह ने। तरुणाई तक आते-आते यही रामनाथ सिंह हो गए अदम गोंडवी। अदम ने अपनी रचनाओं को किसी महबूबा की जुल्फों के पेच-ओ-खम से आजाद रक्खा क्योंकि उनकी तबीयत में ही बगावत छुपी थी। उनकी रचनाओं में गंगा-जमुनी संस्कृति की पक्षधरता, अव्यवस्था पर प्रहार, आम आदमी की बदहाली और साम्प्रदायिकता का विरोध कूट-कूट कर भरी हुई थी। हिंदी साहित्य में अदम गोंडवी एक ऐसे अक्खड़ की आवाज थी, जिसने आशिक मिजाज वाली गजल को आमजन की पीड़ा, स्वप्न और आक्रोश की आवाज बनाया। आलोचक एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि अदम ने कविता और गजलों में भाषा की वर्जनाओं और परंपराओं को तोड़ते हुए उसे समाज के बंद और अंधेरे कोनों की तड़प से जोड़ दिया। काफी समय पहले लिखी गईं गजलें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। यही कारण है कि उनके तेवरों और लोगों की फ्रिक ने जीते जी जनकवि बना दिया।
अदम गोंडवी का जन्म 22 अक्तूबर 1947 को गोंडा जनपद के परसपुर आटा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री देवी कलि सिंह और माता का नाम मांडवी सिंह था। उनका असल नाम रामनाथ सिंह था, लेकिन उन्होेंने लेखन के लिए अपना नाम अदम गोंडवी रख लिया। अदम कबीर परंपरा के कवि थे और उनकी लिखाई पढ़ाई उतनी ही हुई थी, जितनी किसी किसान ठाकुर के लिए जरूरी थी। उन्होंने लिखा कि ‘‘देखना, सुनना और सच कहना जिन्हें भाता नहीं, कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आए गए। कल तलक जो हाशिये पर भी न आते नजर, आजकल बाजार में उनके कलेंडर में आ गए’’। जीवन काल में उनकी दो कृतियां ‘धरती की सतह पर’ और ‘समय से मुठभेड़’ प्रकाशित हुईं।
घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा कुर्ता और गले में सफेद गमछा डाले ठेठ देहाती रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी की गजलों का निपट गवईं अंदाज आज की महानगरीय और चमकीली कविता को नए सिरे से सोचने का विकल्प देता है। आलोचक मानते हैं कि अदम ने अपने काव्य के जरिये उस परंपरा के सूत्रों को पकड़ने या उसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो कबीर, निराला या दुष्यंत कुमार में देखने को मिलती है। आज के हालात पर अदम का अंदाज कुछ ऐसा है़़़‘‘काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में। उतरा है रामराज विधायक निवास में। पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत। इतना असर है खादी के उजले लिबास में’’। दुष्यंत ने अपने गजलों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरुआत की थी, अदम गोंडवी ने उसे उस मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की थी, जहां से एक-एक चीज बगैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी ने अदम से संबंधित अपने संस्मरण साक्षा करते हुए कहा कि इमरजेंसी के बाद सक्रिय और उम्मीद भरे वर्षों में हमारे दौर के अनेक युवा, सौ में सत्तर आदमी और ले मशालें चल पड़े जैसे गीतों को सुनकर वाम आंदोलन में कूद पड़े। उत्तराखंड में चलने वाले जनांदोलनों में अदम के गीत गाए जाते थे। 1984-85 के बाद जब गिर्दा ने संस्था बनाकर सांस्कतिक और आंदोलनकारी जनगीतों की छोटी पुस्तिकाएं और कैसेट निकाले तो उसमें अदम के कई गीतों को शामिल किया गया।
जन आंदोलन और विरोध प्रतिरोध के जुलूस में अदम की शायरी नारे की तरह गाई जाती है। हालांकि अदम को नयी पीढ़ी पर पूरा भरोसा है और अपनी रचनाओं के माध्यम से युवाओं से देश को संभालने का आहवान करते हैं। उन्होंने कहा कि ‘‘सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए, मुल्क क्या आजाद है। ये नयी पीढ़ी पे निर्भर है, वही जजमेंट दे, फलसफा गांधी का मौजूं है, कि नक्सलवाद में’’।
पत्रकार एवं संपादक दयाशंकर राय ने बताया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि बनारस, लखनऊ और दिल्ली विश्वद्यालयों के छात्र जीवन में शहर के प्रमुख स्थानों में ब्रेख्त, नेरूदा, मुक्तिबोध, धूमिल, निराला और गोरख पांडेय के साथ अदम की कविताओं के पोस्टर भी लगाए जाते थे।
उन्होंने कहा कि माक्र्स ने दुनिया और समाज को समक्षने की सुसंगत दृष्टि दी, तो अदम जैसे कवियों और गजलकारों ने हाशिये पर पड़े समाज के सबसे वंचित और उपेक्षित व्यक्ति की पीड़ा से जुड़ने और उसे समक्षने की संवेदना विकसित की। आमजन की पीड़ा को उन्होंने कुछ ऐसे लिखा ‘‘घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं, धूप फाल्गुन की नशीली है’’। या दूसरी कविता ‘‘आंख पर पट्टी और अक्ल पर ताला रहे। अपने शाहे वक्त का यू मर्तबा आला रहे। तालिबे शोहरत है, कैसे भी मिले मिलती रहे। आए दिन अखबार में प्रतिभूति घोटाला रहे।’’ऐसा कहकर उन्होंने सहजता से हमें काव्याभिव्यक्ति के नए आयाम समझाए।
आज के समाज में फैले भ्रष्टाचार पर अदम की कविता ‘‘जो उलक्ष कर रह गयी, फाइलों के जाल मेंं। गांव तक वह रोशनी आएगी कितने साल में।
बूढ़ा बरगद साक्षी है, किस तरह से खो गयी रामसुध की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में।’’ दयाशंकर राय ने कहा कि अदम का ग्रामीण और खुरदुरा जीवन हमारे मध्यवर्गीय सौंदर्यबोध के खांचे में फिट नहीं बैठता, अदम को समक्षने के लिए हमें प्याज की गांठ सरीखे व्यक्तित्व से मुक्त होना होगा। आदम की शायरी में आज जनता की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा का सौंदर्य मिसरे-मिसरे में मौजूद है, ऐसा धार लगा व्यंग है कि पाठक का कलेजा चीर कर रख देता है। उनकी रचनाओं में आम लोगों की बात कहने को मजबूर किया।
प्रख्यात समीक्षक विश्वनाथ त्रिपाठी आजादी के बाद हिंदी-उर्दू गजलों की परंपरा में अदम के योगदान को रेखांकित करते हैं। त्रिपाठी ने कहा कि समकालीन समय में अदम शब्द की परंपरा को पहचानने वाले विरले कवि थे। उनकी गजलों में शेर को पूरा करने के लिए घाल-मेलकर ठूंसे गए शब्दों की जगह उर्दू की जातीय परंपरा से उपजी लय, नाद, ध्वनि और शब्द-मैत्री का साक्षा संधान है। उन्होंने कहा कि अदम उर्दू गजल को बीहड़ रास्ते में ले गए और उसे आमजन की पीड़ा, स्वप्न और आकोश की व्यंजना की आवाज बनाया। 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उन्होंने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो लंबे समय तक याद रखी गई। आंदोलनों और जुलूसों के दौरान गाई गईं। साम्प्रदायिकता के विषय में अदम की कविता आज भी मौजूं है ‘‘हममे कोई शक, कोई हूण कोई मंगोल है। दफ्न है जो बात उस बात को मत छेड़िए। गर गलतियां बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जला, ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए। हैं कहां हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खां। मिट गये सब, कौम की औकात को मत छेड़िए।’’
वे साम्प्रदायिक दंगों के पीछे की सियायत को बसूबी पहचानते थे। उन्होंने लिखा है कि ‘‘शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले, कोठियों के लॉन के मंजूर सलोना हो गया’’ कहकर उन्होंने इस सियासत की असलियत उघाड़ दी। वे सरकारी नीतियों को पहले जनाब कोई शिगूफा उछाल दो, फिर कर को बोझ कौम की गर्दन पर डाल दो’’ जैसी बातें कहकर पूरी तरह नंगा कर देने वाले थे। घूसखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति के बारे में उन्होंने ‘‘रिश्वत को हक समझ के जहां ले रहे हों लोग, है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो’’ कहकर चिंता जताई।
बढ़ती आर्थिक असमानता से चिंतित होकर उन्होंने ‘‘तुम्हारी मेज चांदी तुम्हारे जाम सोने के, यहां जुम्मन के घर में जा भी फूटी रकाबी है’’जैसी बेमिसाल पक्तियां लिखीं। वे नैतिकता में आ रही गिरावट का कारण गरीबी को ही मानते थे। ‘‘चोरी न करे, झूठ न बोलें तो क्या करें, चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को’’ भूख की तिलमिलाहट और रोट की जंग तो उनकी शायरी में जगह-जगह बिखरी पड़ी है। वे टीबी और अखबारों की घटिया सोच के प्रति दुखी थे।
उन्होंने लिखा कि ‘‘इनके कुत्सित संबंधों से पाठक को क्या लेना-देना, लेकिन ये जिद पे अड़े हैं अपना भेग विलास लिखेंगे।’’ उन्होंने साहित्यकारों के बीच पनप रही विकृत प्रवृत्तियों पर भी गहरा कटाक्ष किया। ‘जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम के मिजाज, उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए’ कहकर उन्होंने नौजवानों की चेतना को झकझोरा। ‘‘ये मैकाले के बेटे ख्ुाद को जाने क्या समझते हैं, इनके सामने हम लोग थारू हैं तराई के’’ कहकर उन्होंने अफसरशाही की अहंकारी मानसिकता को लताड़ने के साथ-साथ अपने पड़ोसी तराई क्षेत्र के थारू आदिवासियों के प्रति बरती जा रही सामाजिक अवहेलना को भी सामने ला दिया।
वे साम्प्रदायिक दंगों के पीछे की सियायत को बसूबी पहचानते थे। उन्होंने लिखा है कि ‘‘शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले, कोठियों के लॉन के मंजूर सलोना हो गया’’ कहकर उन्होंने इस सियासत की असलियत उघाड़ दी। वे सरकारी नीतियों को पहले जनाब कोई शिगूफा उछाल दो, फिर कर को बोझ कौम की गर्दन पर डाल दो’’ जैसी बातें कहकर पूरी तरह नंगा कर देने वाले थे। घूसखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति के बारे में उन्होंने ‘‘रिश्वत को हक समझ के जहां ले रहे हों लोग, है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो’’ कहकर चिंता जताई।
बढ़ती आर्थिक असमानता से चिंतित होकर उन्होंने ‘‘तुम्हारी मेज चांदी तुम्हारे जाम सोने के, यहां जुम्मन के घर में जा भी फूटी रकाबी है’’जैसी बेमिसाल पक्तियां लिखीं। वे नैतिकता में आ रही गिरावट का कारण गरीबी को ही मानते थे। ‘‘चोरी न करे, झूठ न बोलें तो क्या करें, चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को’’ भूख की तिलमिलाहट और रोट की जंग तो उनकी शायरी में जगह-जगह बिखरी पड़ी है। वे टीबी और अखबारों की घटिया सोच के प्रति दुखी थे।
उन्होंने लिखा कि ‘‘इनके कुत्सित संबंधों से पाठक को क्या लेना-देना, लेकिन ये जिद पे अड़े हैं अपना भेग विलास लिखेंगे।’’ उन्होंने साहित्यकारों के बीच पनप रही विकृत प्रवृत्तियों पर भी गहरा कटाक्ष किया। ‘जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम के मिजाज, उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए’ कहकर उन्होंने नौजवानों की चेतना को झकझोरा। ‘‘ये मैकाले के बेटे ख्ुाद को जाने क्या समझते हैं, इनके सामने हम लोग थारू हैं तराई के’’ कहकर उन्होंने अफसरशाही की अहंकारी मानसिकता को लताड़ने के साथ-साथ अपने पड़ोसी तराई क्षेत्र के थारू आदिवासियों के प्रति बरती जा रही सामाजिक अवहेलना को भी सामने ला दिया।
देश के आज के हालात पर अदम का कहना है ‘‘जो डलहौजी न कर पाया, वो ये हुक्काम कर देंगे। कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे। ये बंदे मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर, मगर बाजार में चीजों का दुगना दाम कर देंगे। सदन में घूस देकर बच गयी कुर्सी तो देखोगे, वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे।’’ उन्होंने दर्जनों किताबें नहीं लिखीं, ढेरों शायरी नहीं की, लेकिन जितना भी लिखा, उसी से अपने देश-काल की सारी विसंगतियों को उजागर कर रख दिया और लोगों में भूख एवं गरीबी से लड़ने और व्यवस्था से भिड़ने को उदम्य साहस भर दिया। 18 दिसंबर 2011 को लिवर सिरोसिस बीमारी के कारण वह अपना शब्द संसार की विरासत छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गए।

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