परंपरागत विचारों को बदलना काफी मुश्किल होता है। लोग एक निश्चित ढर्रे पर सोचने के आदी हो चुके होते हैं, लेकिन एक निश्चित समय पर परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। इस परिवर्तन में सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में कोई न कोई व्यक्ति उन परिवर्तनों का संवाहक होता है। हिंदी भाषा और आलोचना के बदलावों में भारतेंदु और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसी ही युगांतकारी भूमिका अदा की, भले ही उसके लिए विद्वानों में काफी विवाद हुआ।
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में आलोचना का विकास विभिन्न वाद-विवाद के रूप में हुआ है। उन पर गहन चर्चाएं हुईं। ‘नवजागरण और हिंदी आलोचना’ पुस्तक में उन चर्चित विवादों पर बात की गई है, जिसने भारतेंदु और द्विवेदी युग में आलोचना और हिंदी भाषा के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई। यह पुस्तक मूलत: रमेश कुमार का शोध कार्य है, जिसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है। वस्तुत: जिन विवादों का उल्लेख साहित्य के विभिन्न इतिहास में उल्लेख किया गया है, उनके बारे में विस्तार से इस पुस्तक में चर्चा की गई है। इसमें भारतेंदु और द्विवेदी युगीन नाटक, कविता, उपन्यास और भाषा संबंधी विवाद शामिल हैं।
रमेश कुमार ने लिखा है कि ‘युगीन परिस्थितियों की मांग ने हिंदी आलोचना को राजमहल की चहारदीवारी से निकालकर नुक्कड़ पर ला खड़ा किया। एक बार साहित्य का परिवेश बदला तो दर्शक और श्रोता भी बदल गए। नयी दुनिया का पाठक और श्रोता तथा दर्शक कोई सामंती परिवेश का सह्दय नहीं बल्कि भारत के हिंदी प्रदेश की आम जनता थी।’ विवाद और आलोचना का संबंध पुराना है। विभिन्न किस्म के विवादों से आलोचना को समकालीन संदर्भों से जोड़कर उसे आधुनिक बनाते हैं। रमेश कुमार ने लिखा है कि ‘वस्तुत : आलोचना का मुख्य कार्य रचना के कलात्मक मूल्य का विश्लेषण और युग, समाज आदि के संदर्भों में इसके महत्व का प्रकाशन है। यह ऐसी प्रक्रिया है कि आलोचना विशेष में रचना अथवा रचनाकार विशेष के प्रति एक ऐसे रूख-सकारात्मक या नकारात्क की अभिव्यक्ति होती है, जिससे दूसरे आलोचना समुदाय की असहमति की गुंजाइश बनी रहती है। आलोचना की यही विशेषता स्वभावत: उसे विवादधर्मी बनाती है।’ हिंदी आलोचना की शुरुआत भारतेंदु के प्रसिद्ध निबंध नाटक (1881) से होती है। इसमें भारतेंदु ने नाटक की भारतीय, पाश्चात्य और लोक नाट्य की परंपरा का आधुनिक रूप देने का प्रयास किया गया है। वहीं पं. बालकृष्ण भट्ट और बदरी नारायण प्रेमघन ने संयोगिता स्वयंवर नाटक की आलोचना के माध्यम से व्यवहारिक (समीक्षा) की शुरुआत की।
नाटकों को लेकर भारतेंदु की भूमिका के बारे में रमेश कुमार ने लिखा है कि ‘भारतेंदु की सक्रिय चिंता केवल नाटक लिखने की ही नहीं, लिखवाने और उसे खेलने की भी है। यह भारतेंदु का ही प्रभाव था कि प्रताप नारायण मिश्र जैसे लोग जो प्रारंभ में नाटक के विरोधी थे, आगे चलकर नाटक लिखते हैं और अभिनय में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करते हैं।’ पुस्तक में उन कारणों पर भी चर्चा की गई है जिसके कारण द्विवेदी युग में नाटक का पराभव हो गया।
विवादों से नाता सिर्फ हिंदी आलोचना का ही नहीं रहा है बल्कि संस्कृत युग में भी विभिन्न किस्म के विवाद हुए। भरत से लेकर अभिनवगुप्त तक लगभग 700 से 800 वर्षों का अंतराल है। इस दौरान भरत के रस सूत्र की व्याख्या के न जाने प्रयास किए गए। इनमें आठ मतों का उल्लेख अभिनव गुप्त ने ‘अभिनव भारती’ ने किया है। इन आठ मतों में से स्पष्ट रूप से भट्ट लोल्लट, श्री शंकुक, भट्ट नायक और अभिनव गुप्त के मत ही ज्यादा स्पष्ट और सही रूप में सामने आते हैं। इस विवाद से ही साधारणीकरण जैसी सिद्धांत सामने आया जो संस्कृत साहित्य की प्रमुख अवधारणा के रूप में सामने आया। महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत साहित्य शास्त्र में व्यवहारिक समीक्षा की कोई परंपरा नहीं मिलती है। रमेश कुमार ने लिखा है कि ‘संस्कृत साहित्य शास्त्र के आचार्य अवधारणाओं के व्याख्याता और नई अवधारणा की प्रस्तुति करने वाले हुए हैं। ये आचार्य क्रमश : एक के बाद एक होते गए हैं जिनमें खंडन-मंडन की परंपरा आगे बढ़ती चली है। इसके विपरीत हिंदी साहित्य शास्त्र में विवाद रू-ब-रू होकर हुए हैं। माध्यम पत्र-पत्रिकाएं बनी हैं, जिससे पाठकों को भी इसमें शामिल होने का अवसर मिला। अपनी पूर्ववर्ती अवधारणाओं की भी आलोचना विद्वानों ने की है किंतु सबसे महत्वपूर्ण विवाद समकालीनों के बीच हुए हैं।’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘वस्तुत: संस्कृत साहित्यशास्त्र में विवादों की दो प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं। प्रथम तो यह है कि यहां टीकाकार या व्याख्याकार जितने हुए क्रमश: एक के बाद एक होते गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि समकालीन होते हुए भी आचार्यों ने अपनी अवधारणाओं पर उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दिया है। इनका चिंतन अपने पूववर्ती की परवर्तियों की व्याख्या के रूप में मिलता है। इन आचार्यों ने रससूत्र की व्याख्या की, अपनी सहमति जाहिर की और अपनी नयी व्याख्या जाहिर की।’
भारतेंदु और द्विवेदी युग आलोचना और हिंदी भाषा के निर्मित होने का युग है। उन्होंने इस दौरान बहुत सारे कार्य किए गए। जैसे इस युग में खड़ी बोली जो बोली थी वह भाषा के रूप में तब्दील हो गई, वहीं ब्रजभाषा जो भाषा थी, वह बोली के रूप में तब्दील हो गई। यह तत्कालीन जरूरतों की मांग थी। ब्रजभाषा में गद्य की मुक्कमल परंपरा नहीं थी। जबकि खड़ी बोली आधुनिक विचारों को संवहन करने में सक्षम थी। उन्होंने लिखा है कि ‘भारतेंदु युग में हिंदी गद्य के लिए खड़ी बोली को स्वीकार कर लिया गया, किंतु कविता के क्षेत्र में अब भी ब्रजमाधुरी की मधुर तान का ही बोलबाला था। खड़ी बोली और ब्रजभाषा के अंतरों के बारे में उन्होंने लिखा है कि ‘आधुनिक काल तक आते-आते ब्रजभाषा को च्युत करने की शक्ति लेकर प्रचलित खड़ी बोली उससे रू-ब-रू हो टकराने लगी। खड़ी बोली ब्रजभाषा की काव्य भाषा और शिष्ट समाज की भाषा होने की गरिमा को चुनौती देते हुई धीरे-धीरे विकसित होने लगी। खड़ी इस अर्थ में ब्रजभाषा से विशिष्ट थी कि उसमें खंडन-मंडन, तर्क-वितर्क, विचार-विनिमय की क्षमता का विकास हुआ था, जिसे गद्य के रूप में पहचान मिली थी।’ ऐसे समय में बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली का गद्य नाम लेख 1887 में दो भागों में लिखा। इस लेख के प्रकाशित होते ही ब्रजभाषा के साहित्य प्रेमियों में हलचल मच गई। इसका कारण खत्री जी की साहित्य संबंधी मान्यताएं थी, जिसमें ब्रजभाषा को हिंदी नहीं मानना और हिंदी और उर्दू में केवल शैलीगत भिन्नता मानते हुए दोनों को एक मान लेना रहा। आगे चलकर महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी बोली के बारे में एक स्टैंड लेते हुए लेखकों को ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली में ही लिखने का प्रोत्साहित किया।
मध्यवर्ग के उदय के साथ भारतेंदु युग मेंं उपन्यास लिखे जाने लगे। इसको लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में खूब वाद-विवाद हुए। 1903 में बम्बई, काशी और जयपुर से निकलने वाली पत्रिकाएं क्रमश: श्री व्यंकटेश समाचार, सुदर्शन और समालोचक के संपादक मेहता लज्जा राम शर्मा, पं.माधव प्रसाद मिश्र और पं.चंद्रधर शर्मा गुलेरी के बहसों के बीच चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति का मूल्याकंन प्रारंभ हुआ। व्यंकटेश समाचार में चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति में घटने वाली घटना यथार्थ या पूर्णत: कल्पना प्रसूत? यह सवाल उठाया गया था। वहीं किशोरी लाल गोस्वामी के उपन्यासों में अश्लीलता पर गुलेरी ने खूब खबर ली।
बंगाल से अनुदित उपन्यास ‘चितौड़ चातकी’ का अनुवाद 1895 में बाबू रामकृष्ण वर्मा ने किया था। पुस्तक में जोधपुर और जयपुर के नरेशों का हाल अत्युक्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया था। समकालीन पाठक वर्ग के लिए यह पुस्तक राष्ट्रद्रोहिणी थी। इस पुस्तक के विरूद्ध जबर्दस्त आंदोलन हुआ। अंतत: बाबू रामकृष्ण वर्मा ने पुस्तक का गंगा को समर्पित कर दिया। प. माधव प्रसाद मिश्र ने माइकल मधुसूदन दत्त के ‘मेघनाथ वध काव्य’ व भारतेंदु के नीलदेवी का उदाहरण देते दिखलाया कि ‘साहित्य में वर्णित में तथ्य आलोच्य और आपत्तिजनक नहीं होते।’
कवि गोल्थ स्मिथ कृत डेजेर्टेड विलेज और हरिमट की कविताओं का अनुवाद श्रीधर पाठक ने किया, जिसकी आलोचना आलोचना प्रताप नारायण मित्र ने की है। उन्होंने लिखा है कि ‘इस ग्रंथ में हमारे मित्र श्रीधर पाठक ने बड़ी रसज्ञता से लिखा है। भाषा का माधुर्य, कविता का लावण्य, सह्दय मनोहारित्व इत्यादि गुणों के अतिरिक्त योरोपीय विचारों का एतद्देशीय लोगों को पूर्ण स्वाद देने की सच्ची दक्षता दिखाई है’। इस पुस्तक में बताया गया है कि द्विवेदी युग में रीति काल के कवियों की जो आलोचना विकसित हुई, उसकी परिणति कैसे हुई। उन्होंने लिखा है कि ‘प. पद्म सिंह शर्मा, लाला भगवानदीन, मिश्रबंधु जैसे आचार्य और प. कृष्ण बिहारी मिश्र जैसे सुधी आलोचकों को शास्त्रास्त्रों के साथ आलोचनों के मैदान में उतरना पड़ा था। शर्मा जी, भगवान दीन बिहारी के समर्थक थे तो मिश्रबंधु और कृष्ण बिहारी मिश्र देव के समर्थक। यह विवाद लंबे समय तक चला। इसमें आलोचना अपनी जगह रह गयी और कवियों को छोटा बड़ा और दोष दर्शन की अपेक्षा बात व्यक्तिगत निंदा प्रशंसा तक पहुंच गयी।‘ इस युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू बाल मुकुंद गुप्त के बीच भाषा अनस्थिरता लेख पर विवाद काफी लंबे समय तक चला। इस पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण और रोचक है। हालांकि पुस्तक में प्रूफ की गलतियां हैं। इसके बावजूद पुस्तक पठनीय है।
पुस्तक-नवजागरण और हिंदी आलोचना
लेखक-रमेश कुमार
मूल्य-250 रुपये
प्रकाशक-नेहा प्रकाशन, 295, बैंक इंक्लेव, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-92
No comments:
Post a Comment