Sunday, August 26, 2018

इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने रातों-रात चुराया ईरान का परमाणु कार्यक्रम

इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के दस्तावेज रात के अंधेर में छह घंटे से ज्यादा समय तक चले ऑपरेशन के बाद गायब कर दिेए थे। एक साल तक गोदाम की निगरानी करने के बाद इजरायल को यह पता लग गया था कि ईरानी गार्ड सुबह की शिफ्ट में 7 बजे आते हैं। ऐसे में एजेंटों को स्पष्ट आदेश दिए गए थे कि वे सुबह 5 बजे तक किसी भी कीमत पर गोदाम से निकल जाएं ताकि उनके पास भागने के लिए पर्याप्त समय रहे, क्योंकि एक बार ईरानी अधिकारियों के गोदाम में पहुंचने के बाद यह पता लग जाएगा कि किसी ने देश के गुप्त न्यूक्लियर आर्काइव को चुरा लिया है, जिसमें परमाणु हथियारों पर किए गए काम, उसके डिजाइन और प्रॉडक्शन प्लान के बारे में सालों का लेखा-जोखा है।

पहले ही लिखी जा चुकी थी स्क्रिप्ट
मोसाद को पता था कि तेहरान में मौजूद गोदाम में घुसने से पहले अलार्म को निष्क्रिय करने, दो दरवाजों को पार करने और दर्जन भर तिजोरियों के ताले तोड़कर उनमें मौजूद खुफिया दस्तावेज निकालने में उन्हें कितना समय लगेगा। यह सब करने में उन्हें कुल 6 घंटे 29 मिनट का समय लगा। हर कदम की स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी।

तोड़नी थी 32 तिजोरियां
इस साल 31 जनवरी की रात इजरायली एजेंट टॉर्च के साथ गोदाम में पहुंचे। ये टॉर्च 3600 डिग्री पर जल रहे थे। ऑपरेशन की प्लानिंग के दौरान ही एजेंटों को पता था कि उन्हें 32 ईरानी तिजोरियां तोड़नी हैं लेकिन उन्होंने कई को छुआ तक नहीं और सबसे पहले उस तिजोरी को तोड़ा जिसमें सबसे महत्वपूर्ण डिजाइन थे। समय पूरा होते ही ये एजेंट सीमा की तरफ भागे और अपने साथ 50 हजार पन्ने, 163 मेमोज वाली कॉम्पैक्ट डिस्क, वीडियो और प्लान ले गए।

ट्रंप को अप्रैल में दी गई जानकारी
अप्रैल के आखिर में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने व्हाइट हाऊस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जानकारी देने के बाद इस चोरी से हासिल दस्तावेजों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह एक और कारण है जिसकी वजह से ट्रंप को साल 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से बाहर हो जाना चाहिए। दस्तावेजों से ईरान की धोखाधड़ी और उसके दोबारा बम बनाने का इरादा साफतौर पर दुनिया के सामने है। कुछ दिन बाद, ट्रंप ने ईरान समझौते से अलग होने का ऐलान कर दिया। यह एक ऐसा कदम था जिसके बाद अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों में भी तनाव आ गया। 

परमाणु बम बना रहा ईरान
बीते हफ्ते, इजरायली सरकार के न्यौते पर तीन रिपोर्टरों ने यह दस्तावेज देखे, इनमें से एक न्यू यॉर्क टाइम्स का रिपोर्टर भी था। इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि भले ही ईरान यह कहता आया हो कि वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है लेकिन यह देश काफी समय से परमाणु बम बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

पंद्रह साल पुराने हैं दस्तावेज
न्यूक्लियर इंजिनियर और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के पूर्व इंस्पेक्टर रॉबर्ट केली ने कुछ दस्तावेजों को देखने के बाद कहा, 'इन दस्तावेजों से यह साफ पता लगता है कि ये लोग परमाणु बम बनाने के लिए काम कर रहे हैं।' अभी तक इन दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकी है। इनमें से कई दस्तावेज तो 15 साल तक पुराने हैं। इजरायलियों ने यह दस्तावेज रिपोर्टरों को दिखाते समय यह भी कहा कि कुछ पन्ने इसलिए सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं ताकि किसी और के पास परमाणु हथियार बनाने से संबंधित जानकारी न पहुंचे।

ईरान ने चोरी की कहानी को फर्जी बताया 
उधर, ईरान का कहना है कि यह पूरी कहानी फर्जी है। कुछ ईरानियों के मुताबिक, यह सबकुछ इजरायल जानबूझकर कर रहा है जिससे उनके देश पर दोबारा प्रतिबंध लगा दिए जाए। हालांकि अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों ने इन दस्तावेजों को देखने और कुछ पुराने दस्तावेजों से तुलना करने के बाद माना है कि ये असली डॉक्युमेंट्स हैं।


इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के बारे में जानें   
दुनिया की सबसे खूंखार और चतुर खुफिया एजेंसी के रूप में इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद को जाना जाता है, जिसके नाम पर पूरी दुनिया में कहानियां चलती हैं। मोसाद को इजराइल की किलिंग मशीन कहा जाता है। ये लोग इजराइल के दुश्मनों को पूरी दुनिया में खोज के मारते हैं। मारने का मकसद सिर्फ मारना ही नहीं होता बल्कि डर पैदा करना होता है कि इजराइल से किसी प्रकार का पंगा ना लो।

सबसे मशहूर ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड 
1972 में म्यूनिख ओलंपिक के लिये दुनिया भर से खिलाड़ी इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान इजराइल ओलंपिक टीम के 11 खिलाड़ियों को उनके होटल में मार दिया गया। इसका आरोप दो आतंकवादी संगठनों पर ब्‍लैक सेपटेंबर और फिलिस्‍तीन लिबरेशन आर्गेनाइजेशन लगा। 
इसके बाद इजराइली सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद भड़क गई। बदले के लिये प्लान किया जाने लगा। 11 लोग हिट लिस्ट में थे। फिर मोसाद ने जो काम किया वो फिल्मों की तरह था। फोन बम, नकली

पासपोर्ट, उड़ती हुई कारें, जहर की सुई का इस्तेमाल हुआ। मोसाद एजेंटों ने कई देशों का प्रोटोकॉल तोड़ा। एजेंट मध्‍य पूर्व के कई देशों की सुरक्षा एजेंसियों में घुस गये थे। अपराधियों को चुन-चुन के मारा गया। अपने लक्ष्‍य को निपटाने के पहले मोसाद टारगेट की गई फेमिली को बुके भेजता था. जिस पर लिखा होता था- ये याद दिलाने के लिये कि हम ना तो भूलते हैं, ना ही माफ करते हैं। मोसाद के एजेंटों ने हर टारगेट को 11 बार गोली मारी। हर मरे हुये 11 इजराइली खिलाड़ियों की तरफ एक-एक गोली मारी। ये ऑपरेशन बीस साल तक चला। पूरे यूरोप में दुश्‍मनों को घूम-घूमकर मारा गया। इसी क्रम में नॉर्वे में एक वेटर गलती से मार दिया गया। इंटरनेशनल मीडिया में इसकी कड़ी निंदा हुई। मोसाद ने निंदा के बाद कई और मर्डर किये।

Wednesday, August 22, 2018

पहलवान महावीर फोगाट ने कहा 2020 के टोक्‍यो ओलंपिक में पदक जीतेंगी बेटियां


हरियाणा में भिवानी का बलाली गांव देश का ऐसा चर्चित गांव है जिसने कर्इ खेल प्रतिभाएं पैदा की। कुश्‍ती के कोच महावीर फोगाट का इसमें प्रमुख योगदान है। उन्‍होंने न सिर्फ लड़कियों को घर से बाहर निकला बल्कि अखाड़ों में लड़कों के साथ उनकी कुश्‍ती लड़वार्इ। सोमवार को जब एशियाई खेलों में महिला पहलवान विनेश फोगाट स्‍वर्ण पदक जीता तो लोगों को बरबस महावीर फोगाट का स्‍मरण आना स्‍वाभाविक है।  
खुद राष्‍ट्रीय स्‍तर के पहलवान रह चुके हैं महावीर फोगाट
राष्ट्रीय स्तर के पहलवान महावीर फोगाट की चार बेटियां हैं-गीता, बबीता, विनेश और रितु, जो खुद अपने पिता महावीर फोगाट की तरह शानदार पहलवान हैं और देश के लिए कई मेडल जीत चुकी हैं। महावीर  की चार बेटियां और एक बेटा हैं, जिन्हें उन्होंने पहलवान बनाया है। इसके अलावा महावीर ने अपने भाई की भी दो बेटियों विनेश और प्रियंका फोगाट को पहलवानी की शिक्षा दी है। विनेश जब छोटी थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया था। महावीर ने इस कमी को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके बाद विनेश उस परिवार का ही एक हिस्सा बनकर रहने लगीं। 
ट्रेनिंग में थे काफी सख्त  
विनेश पुरानी बातों को याद करते हुए कहती हैं कि मैं कुश्ती में काफी अच्छी थी लेकिन मुझे इसका कोई शौक नहीं था। लेकिन ताऊजी ट्रेनिंग में कोई कोताही नहीं बरतते थे। वह छड़ी लेकर हमसे ट्रेनिंग करवाते थे। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही होती।  
महावीर को ये गुण विरासत में मिला
महाबीर फोगाट के पिता मान सिंह गांवों में कुश्ती लड़ते थे। इसलिए महावीर को ये गुण विरासत में मिला। वो खुद 15 साल की उम्र से रेसलिंग कर रहे हैं। नेशनल लेवल पर कई कुश्ती लड़ चुके महावीर फोगाट की पत्नी का नाम दया कौर है, दोनों की पहली संतान का नाम गीता है, बेटी के जन्म होने के बाद ही दोनों पति-पत्‍नी ने ठान लिया था कि वो गीता को पहलवान बनाएंगे, लेकिन हरियाणा की एक लड़की मर्दों के साथ कुश्ती करे, ये सोचना भी शायद उस वक्त गलत था, जाहिर है मुश्किलें तो आनी ही थीं लेकिन महावीर और दया फैसले से टस से मस नहीं हुए।
बलाली, भिवानी (हरियाणा) में बातचीत करते हुए महावीर फोगाट ने कहा कि अभी सिर्फ 20 फीसदी लोग ही बेटियों को बराबरी का हक दे रहे हैं। फौगाट के मुताबिक जब गीता और बबिता को अखाड़े में लाना शुरू किया तो गांव के लोगों ने विरोध किया। वह लोग भी आलोचना करने लगे जो साथ उठते-बैठते थे। लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी।
वे लोग अब बहुत पछताते हैं
उन्‍होंने बताया कि मेरे गांव की कुछ लड़कियां कुश्‍ती लड़ने में मेरी बेटियों से भी अच्‍छी थीं लेकिन लोगों के तानों और विरोध के बाद उनके घर के लोगों ने उन्‍हें अखाड़े से बाहर कर दिया। जिन्‍होंने ऐसा किया था, आज वह पछता रहे हैं। मजबूरी में मैंने बेटियों को लड़कों के साथ कुश्‍ती की प्रैक्‍टिस कराई। अब अखाड़ा मेरे घर के अंदर हैं। यहां छोटी-छोटी लड़कियां अपनी उम्र के लड़कों के साथ कुश्‍ती लड़ती हैं। सुबह चार बजे से बेटियों को कुश्‍ती की ट्रेनिंग देता हूं। कुश्‍ती  पुरुषों की जागीर नहीं है यह इन बेटियों ने साबित किया है। आज हरियाणा में महिला कुश्‍ती के कम से कम 50 अखाड़े चल रहे हैं।
बेटियों  को मौका दीजिए, वे आसमान छू सकती हैं  
वर्ष 2020 में टोक्‍यो आलंपिक में उम्‍मीद है कि मेरी बेटियां ओलंपिक मेडल ले आएंगी। मैंने अपनी जिंदगी में यही सीखा है कि डटे रहो, लड़ते रहो और आलोचनाओं को अनसुना करते रहो। इसी मंत्र से मुझे और मेरी बेटियों को सफलता मिली है। दूर दृष्टि, पक्‍का इरादा रखिए और कड़ी मेहनत करिए तो मुकाम हासिल हो जाता है। बेटियों को सिर्फ मौका देने की जरूरत है, वह आसमान छू सकती हैं। 
कर्णम मल्लेश्‍वरी से मिली प्रेरणा
वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में जब मैंने वेट लिफ्टर कर्णम मल्लेश्‍वरी को कांस्‍य पदक जीतते देखा तो मुझे लगा कि मेरी बेटियां भी विश्‍व चैंपियन हो सकती हैं। फिर मैंने उन्‍हें सुबह-शाम कम से कम तीन-तीन घंटे अखाड़े में ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। मेरी लड़कियां स्‍कूल से लौटते ही अखाड़े में पहुंच जातीं। गांव वाले कहते थे कि कुश्‍ती लड़कियों का गेम नहीं है। यह पुरुषों का खेल है। लेकिन मैं हमेशा उनसे अलग सोचता और करता था।
रियो ओलंपिक में चोट के बाद भी विनेश ने हिम्‍मत नहीं हारी  
रियो ओलंपिक में चोट के बाहर बाहर हुई महिला पहलवान विनेश फोगाट ने एशियाई खेलों में भारत को दूसरा गोल्ड मेडल दिलाया। एशियन गेम्स के इतिहास में ये पहला मौका है जब भारत ने महिला रेसलिंग में गोल्ड मेडल जीता है। विनेश ने इससे पहले 2014 के राष्ट्रमण्डल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। 
चोट के बाद विनेश ने कहा था कि ओलंपिक पदक मेरा सपना था और यह घुटने की चोट से टूट गया। मैं फ्रीस्टाइल स्पर्धा के 48 किलोग्राम भार वर्ग में चीन की सुन यानान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मुकाबला लड़ रही थी और 1-0 से आगे भी थी लेकिन तभी सुन के दांव में मेरा घुटना चोटिल हो गया और मुझे स्ट्रेचर से बाहर लाया गया। ओलंपिक की याद को कभी भूल नहीं पाऊंगी। बहुत बुरा पल था। सपना अधूरा रह गया। जब सपने अधूरे रह जाते हैं तो सुकून नहीं देते हैं। सपना टूटता है तो बहुत तकलीफ होती है लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी है और मैं 2020 के टोक्यो ओलंपिक खेलों की तैयारियों में दोगुने उत्साह के साथ जुटी हुई हूं। रोजाना सात घंटे अभ्यास कर रही हूं।

अटल-मोदी ने भाषणों से दुनिया को बनाया मुरीद


भारत में लोकप्रिय नेता वही हो सकता है जिसकी हिंदी पर बेहतर पकड़ हो, जो लोगों के बीच उनके दुख दर्द उनकी बोली-बानी में प्रस्‍तुत करना जानता हो और उसकी बात लोगों के दिल को छू जाती हो। आजादी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता रहे जिन्‍होंने हिंदी को लोकप्रिय बनाया। इन्‍होंने हिंदी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि गैर हिंदी क्षेत्रों और विेदेश में भी लोगों को चाव से हिंदी को सुनने और पढ़ने के लिए विवश किया। यह अध्‍ययन का विषय हो सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की भाषण कला के कारण कितने गैर हिंदी भाषी लोगों ने हिंदी सीखी। यह अनायास नहीं है कि देश के पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खुद स्‍वीकार किया कि मैं प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बन सका क्‍योंकि मेरी पकड़ हिंदी पर नहीं थी।  

जनता की नब्‍ज को पहचानते थे वाजपेयी  
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व महज एक लोकप्रिय राजनेता का ही नहीं कवि हृदय वाले व्यक्ति का भी था। बताया जाता है कि जब ग्‍वालियर के गोरखी स्‍कूल में जब पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उन्‍होंने स्‍कूल में एक भाषण दिया वह लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। वह हिंदी प्रेमी ही नहीं हिंदी सेवी भी थे। उनकी विशिष्ट शैली की हिंदी ने उन्हें लोकप्रिय बनाया तो हिंदी को लोकप्रियता प्रदान करने का एक बड़ा श्रेय उन्हें जाता है। हर बात पर एक आशु कविता रच डालना अटल जी की आदत थी। वे इसी संवाद शैली में लोगों से रू-ब-रू होते थे। आजादी के बाद से पढ़े-लिखे सुसंस्कृत नेताओं की इस देश में एक लंबी परंपरा रही है, लेकिन वाजपेयी शायद इकलौते ऐसे नेता थे, जिन्होंने जनता को भाषाई संस्कार दिए। 

पत्रकारिता से करियर शुरू करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे तो इसीलिए कि वह देश की नब्ज पहचानते थे। साल 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री रहते हए अटल बिहारी वाजपेयी ने यूएन में अपना पहला भाषण हिन्दी में ही दिया था जो उस वक्त बेहद लोकप्रिय हुआ और पहली बार यूएन जैसे अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर भारत की राजभाषा गूंजी। यह पहला मौका था, जब संयुक्त राष्ट्र में भारत के किसी नेता ने हिंदी में भाषण दिया था और बाकी सदस्य देशों के लिए हिंदी से अन्य भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था की गई थी। इतना ही नहीं, भाषण खत्म होने के बाद यूएन में आए सभी देश के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर अटल बिहारी वाजपेयी का तालियों से स्वागत किया। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश देते अपने इस भाषण में उन्होंने बुनियादी मानवाधिकारों और रंगभेद जैसे तमाम गंभीर मुद्दों को उठाया था। बाद में एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने इसे अपने जीवन में सर्वाधिक प्रसन्नता का क्षण बताया। 


गंभीर राजनीतिक विमर्श के साथ गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर
संसदीय जीवन में उन्होंने यादगार भाषण ही नहीं दिए बल्कि अपने चुटीले अंदाज़ से विरोधियों तक को ठहाके लगाने को मजबूर कर दिया। भाषणों के दौरान सदस्यों की टोका-टाकी का वे कभी बुरा नहीं मानते थे बल्कि चुटीले अंदाज़ में कुछ ऐसा जवाब देते थे कि सामने वाला आदमी भी लाजवाब हो जाता था। उनके भाषणों में गंभीर राजनीतिक विमर्श के साथ गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर भी था।
इस बारे में वरिष्‍ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने बताया कि अटल जी के भाषण की अद्भुत कला थी। उन्हें यह कला अपने पिता से मिली थी। इसके लिए उन्हें कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी। वाजपेयी के भाषण में हास्य, विनोद और मुद्दे की बात हुआ करती थी। वाजपेयी बिना किसी पर्ची के बोलते थे और मुद्दों को सही समय पर सटीक तरीके से रखते थे, उनकी सभा में हर विचारधारा के लोग उन्हें सुनने आते थे। अटल बिहारी के व्यक्तित्व का प्रभाव ही था वो हारी हुई बाजी भी जीत लेते थे। उन्‍होंने बताया कि उनके भाषण का विषय कितना भी नीरस होता था, वो उन्हें रोचक बना देते थे और हंसते-हंसाते लोगों को समझा देते थे। विषय अगर पेचीदा होता तो वे मुहावरों और कहावतों के ज़रिए उसे सरल बना देते थे कि सुनने वाले को भी लगता था कि वो कोई नई बात कह रहे हैं। उनकी भाषण कला से प्रभावित होकर ही प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनका परिचय करवाते हुए कहा कि यह लड़का भविष्‍य में भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।   

मैं वाजपेयी जैसा भाषण कभी नहीं दे पाया : आडवाणी  
भाजपा के वरिष्‍ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी ने एक बार पत्रकार से बातचीत में बताया था कि जब अटल जी चार वर्ष तक भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके तो उन्होंने मुझसे अध्यक्ष बनने की पेशकश की। मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मुझे हज़ारों की भीड़ के सामने आपकी तरह भाषण देना नहीं आता। उन्होंने कहा संसद में तो तुम अच्छा बोलते हो। मैंने कहा संसद में बोलना एक बात है और हज़ारों लोगों के सामने बोलना दूसरी बात। बाद में मैं पार्टी अध्यक्ष बना, लेकिन मुझे ताउम्र कॉम्पलेक्स रहा कि मैं वाजपेयी जैसा भाषण कभी नहीं दे पाया।  

मोदी ने हिंदी को बनाया लोकप्रिय 
वाजपेयी की तरह ही वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने साथ संवाद करने वाले हर शख्स के साथ निजी और आत्मीय रिश्ता बना लेते हैं। उनकी यह क्षमता शायद उनकी सबसे अहम खूबियों में से एक है। वाजपेयी की तरह उन्‍होंने भी भारत ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी हिंदी को लोकप्रिय बनाया। देश-विेदेश में लोग उन्हें सुनते हैं, उनके साथ संवाद करते हैं, उनसे प्रेरित होते हैं और जोरदार तरीके से तमाम लोगों के बीच उनके संदेशों को साझा करते हैं। यहां तक कि कई लोग तो मोदी की तरह ही बनना चाहते हैं, साथ ही, कई अन्य उनसे सीखना चाहते हैं। यह बात न सिर्फ भारतीय संदर्भ में सच है, बल्कि ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भी इसकी पुष्टि हुई है। इसका नमूना 'द वर्ल्ड लीडर्स ऑन फेसबुक (फेसबुक पर दुनिया के नेता)' नामक स्टडी में भी देखने को मिला है। यह स्टडी बर्सन कोहन एंड वोल्फे ने की है और इसे 2 मई 2018 को ट्विटर और सोशल मीडिया से जुड़ी अन्य साइट्स पर जारी किया गया। 

चूंकि वाजपेयी कवि थे तो वे भाषण के दौरान अपनी को कहने के लिए कई तरीकों को इस्‍तेमाल करते थे। कई बार उनके भाषण अभिधा में न होकर लक्षण और व्‍यंजना में होते थे। उनके बनस्पित नरेंद्र मोदी अपनी बात को अभिधा में रखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि हिंदी भाषी तो उनकी भाषण कला के मुरीद हैं, मगर गैर हिंदी हिंदी प्रदेशों के लोग उनकी बातों को आसानी से समझ लेते हैं।                   
भाषणों में श्रोताओं से बना लेते हैं संबंध 
मोदी की सबसे बड़ी और असाधारण बात उनकी भाषण कला है। वे अपनी इस कला से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करना जानते हैं। विकास और अन्य मुद्दों पर वे जितनी स्पष्टता और प्रभावी तरीके से अपनी बात रखते हैं कि बिना किसी तैयारी के उनका आशु भाषण भी लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। देश के अन्य  नेताओं की तरह से लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते हैं। उनकी विशेषता है कि वे अपनी वाक शैली से किसी भी प्रकार के श्रोता वर्ग से अपना संबंध बना लेते हैं। 

अचानक से पैदा नहीं हुआ है मोदी से यह अटूट जुड़ाव
ऐसे में सवाल यह है कि वास्तविक जीवन और सोशल मीडिया दोनों स्तर पर आम लोगों से मोदी के इस जुड़ाव की क्या वजह है? इसका सीधा जवाब उनकी विश्वसनीयता है, जो उन्होंने पिछले कई दशकों में बनाई है। मोदी कुछ भी आधे-अधूरे मन से नहीं करते हैं और सिर्फ इसलिए कोई काम नहीं करते कि दूसरा ऐसा काम कर रहा है। इसके अलावा, वह इस कारण से भी कोई काम नहीं करते कि यह आसान काम है। मोदी के हर काम और प्रोजेक्ट में उनका दृढ़ विश्वास होता है।

सोशल मीडिया का बेहतर इस्‍तेमाल 
सोशल मीडिया का बेहतर इस्‍तेमाल और सार्वजनिक विमर्श को लोकतांत्रिक स्वरूप देने में इस माध्यम की क्षमता को पहचाने वाले नरेंद्र मोदी पहले भारतीय नेता हैं। अप्रसांगिक होने के डर से देश के बाकी नेताओं द्वारा सोशल मीडिया ज्‍वाइन करने के लिए मजबूर होने से काफी पहले मोदी ट्विटर और फेसबुक से जुड़े हुए थे। दरअसल, वे जनता और राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बीच सीधा संवाद करने में यकीन करते हैं। राष्ट्रीय नुमाइंदा और आवाज का दावेदार बनने से कई साल पहले मोदी ने ही सबसे पहले हर भारतीय को एक समान आवाज मुहैया कराने में तकनीक की ताकत की अहम भूमिका को पहचाना था। 

बचपन से ही वाद विवाद प्रतियोगिताओं में लेते थे हिस्‍सा  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शानदार भाषण कला का विकास उनमें अचानक नहीं हुआ बल्कि बचपन में ही इसका बीजारोपण हो गया था। प्रधानमंत्री के स्कूली दिनों के शिक्षक रहे डॉ. प्रह्लाद पटेल ने बताया कि स्कूल स्तर से वाद विवाद प्रतियोगिताओं, सामूहिक परिचर्चा और नाटक जैसी पाठ्येत्तर गतिविधियों में हिस्सा लेते हुए वे इस कला में निपुण हुए। डॉ. पटेल ने बातचीत में बताया कि मैंने नरेंद्र मोदी को गुजराती और संस्कृत पढ़ाई है। दसवीं कक्षा तक कुछ वर्ष उन्हें पढ़ाया। उन्होंने बताया कि स्कूली स्तर पर कोई भी पाठ्येत्तर गतिविधि होती तो ‘नरेन्द्र’का आग्रह रहता था कि उनका नाम पहले से ही इसमें लिख दिया जाए। खास तौर पर वाद विवाद प्रतियोगिता, सामूहिक परिचर्चा, नाटक के मंचन आदि में वे प्रारंभ से ही काफी सक्रियता से हिस्सा लेते थे। पटेल ने बताया ‘बच्चा आगे जाकर किस दिशा में जायेगा, इसका थोड़ा आभास बाल्यकाल में ही हो जाता है। बचपन के दिनों से ही नरेन्द्र में अच्छे वक्ता के गुण दिखने लगे थे। संस्कृत शिक्षक होने के नाते मैंने उन्हें संस्कृत पढ़ने और श्लोक याद करने की सलाह दी।’ संभवत: स्कूल के दिनों के इसी अभ्यास का परिणाम है कि नरेन्द्र मोदी के भाषणों में शब्दों का शानदार चयन और संस्कृत के श्लोकों एवं प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक दर्शन का समावेश मिलता है, जिसके कायल उनके समर्थक तो हैं हीं, विरोधी भी हैं।

भाषणों पर एक टीम करती है काम 
नरेंद्र मोदी के भाषणों का अध्‍ययन करने वाले शिव विश्वनाथन ने बताया कि एक पूरी टीम पीएम के भाषणों पर काम करती है। भाषण से पहले कैबिनेट मंत्रियों के इनपुट लिए जाते है। जिस विषय पर भाषण है, वहां के विशेषज्ञों के इनपुट्स भी डाले जाते है और विदेशों में रहने वाले भारतीयों के भी इनपुट्स को शामिल किया जाता है। उन्होने बताया कि एक रिसर्च टीम नरेंद्र मोदी के लिए दिन रात काम करती है। और उनके रिसर्च पर अपनी भाषा की जादूगरी से मोदी चार चांद लगा देते है। ऐसा जरूरी नहीं है कि वो मिली रिपोर्ट्स के आधार पर ही भाषण दें। वो खुद भी अध्ययन करके जाते है और संभल कर भाषण देने में विश्वास करते हैं।  
नरेंद्र मोदी की जीवनी ‘मैचलेस मोदी’ पर काम कर रहे सुधीर बिष्ट मानते हैं कि वित्‍त और कानून संबंधी विषयों पर वह केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से इनपुट जरूर लेते हैं। मोदी जेटली पर बहुत भरोसा करते हैं। दोनों के बीच इमरजेंसी के दौर से संबंध हैं। अगर बात रक्षा और आतंरिक सुरक्षा जैसे मसलों की हो तो मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी बात जरूर करते हैं। आईटी और टेलिकॉम जैसे मसलों पर किसी अहम मंच से भाषण देने से पहले वह प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र से इनपुट लेना पसंद करते हैं। 
जहां तक चुनावी रैलियों में भाषण की बात है कि तो मोदी किसी भी रैली को संबोधित करने से पहले सिर्फ इनपुट लेते हैं। वह किसी का लिखा भाषण नहीं पढ़ते। उन्हें धाराप्रवाह बोलना पसंद है। वह देश के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं। पार्टी संगठन में काम करते हुए मोदी ने सारे देश को नापा हुआ है इसलिए वह अपने सुनने वालों से सीधा रिश्ता कायम करने में देर नहीं करते। वह रैली से ठीक 15 मिनट पहले अपनी टीम से ताजा अपडेट लेते हैं। उनकी कोशिश होती है कि वे भाषण में सबसे ताजा सूचना तक मिली जानकारी को भी शामिल करें। इसके साथ वह इन रैलियों में जाने से पहले सोशल मीडिया में पिछले तीन-चार दिन की तमाम सूचनाओं की जानकारी भी लेते हैं। इन सबको समेट कर वह राजनीतिक रैलियों का भाषण तैयार करते हैं। यही कारण है कि पीएम लोगों का दिल जीतने में सफल होते हैं और उन भाषणों की चर्चा लंबे समय तक होती है। 

पूरी दुनिया को बनाया मुरीद 
वाजपेयी की तरह ही संयुक्‍त राष्‍ट्र में हिंदी में भाषण देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया। यहां तक कि पाकिस्तानी समाचार पत्र ने मोदी की भाषण कला की प्रशंसा करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में उनके भाषण ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के संबोधन को फीका कर दिया।       





Monday, August 20, 2018

पोखरण विस्‍फोट के बाद किसी आगे नहीं झुका देश

देश को परमाणु शक्ति से संपन्‍न देश बनाने में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो किया, उसको देश कभी भुला नहीं सकता। तमाम अंतरराष्‍ट्रीय दबावों के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया एजेंसी के सेटेलाइट्स द्वारा रात दिन की निगरानी के बावजूद पूर्व पीएम अटल बिहारी ने पोखरण-2 परमाणु परीक्षण को सफल बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। हालांकि इस परमाणु परीक्षण के बाद देश को तमाम अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिबंध भी झेलने पड़े, लेकिन पूर्व पीएम अटल बिहारी के नेतृत्‍व में भारत उन प्रतिबंधों से भी पार पाकर प्रगति के पथ आगे बढ़ता रहा। इसके बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की धमक पूरी दुनिया में बढ़ गई। इस परीक्षण से ये भी पता चला कि भारत अब किसी के आगे किसी कीमत पर झुकने वाला नहीं है और अपनी सुरक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने से चूकने वाला नहीं है।         

11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में तीन बमों के सफल परीक्षण के साथ भारत परमाणु शक्ति से संपन्‍न देश बन गया। ये देश के लिए गर्व का पल था। हालांकि 19 मार्च 1998 को दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को कई क्षेत्रीय पार्टियों से समझौते करने पड़े थे इसलिए भारत को परमाणु राष्ट्र बनाना इतना आसान नहीं था। सत्‍ता में आने के दो महीने बाद ही 1998 में भारतीय जनता पार्टी ‘देश की परमाणु नीति का और परमाणु अस्त्रों को तैनात करने के विकल्प का पुनर्मूल्यांकन’ करने तक को तैयार हो गई थी, इसका असर देश और पार्टी दोनों की छवि पर भी पड़ा था। अप्रैल 1998 में रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (IDSA) के निदेशक जसजीत सिंह ने कहा था कि ‘उनकी (अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा) छवि तो ऐसी है कि वो मानो पहला काम ही परमाणु बम के परीक्षण का करेंगे, लेकिन उन्होंने काफी संयम दिखाया है।’ 
परमाणु टेस्‍ट का काम पर्दे के पीछे जारी 
सरकार बनने के बाद परमाणु टेस्‍ट का काम पर्दे के पीछे जारी था। वहीं 1998 में ही सेनाध्यक्ष वीपी मलिक ने सेना की मांग खुलकर सामने रखी थी। 21 अप्रैल 1998 को उन्होंने कहा था कि ‘परमाणु अस्त्रों और प्रक्षेपास्त्रों की बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार सेना की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता विकसित करे।’
केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई सदस्यों तक को पता नहीं था
सेना प्रमुख की तरफ से आई मांग के ठीक दो दिनों बाद रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक सलाहकार एपीजे अब्दुल कलाम ने रक्षामंत्री की समिति को न्यूक्लियर प्रोजेक्ट की जानकारी दी। इस समिति की अध्यक्षता उस समय के रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस कर रहे थे। अटल इसलिए भी परीक्षण जल्दी करना चाहते थे, क्योंकि उसी समय पाकिस्तान ने गौरी मिसाइल का सफलतापूर्वक टेस्ट कर लिया था। उस समय के पाकिस्तान के सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन गौरी के विकास को ‘दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का प्रयास’ बता रहे थे। गौरी के अलावा पाकिस्‍तान गज़नवी मिसाइल पर भी काम कर रहा था। वहीं चीन-पाकिस्तान की साठ-गांठ के अलावा अमेरिका और जापान समेत कई पश्चिमी देश भारत पर CTBT पर साइन करने के लिए दबाव डाल रहे थे। हालांकि इस अभियान को पूरी तरह से गोपनीय रखा गया था। यहां तक कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई सदस्यों तक को इसके बारे में पता नहीं था। पूरे अभियान की रणनीति में कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी व राजनेता ही शामिल थे। इस ऑपरेशन का नाम शक्ति रखा गया था।  
राव को अटल ने किया याद
 11 मई की उस गर्म दोपहर को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सरकारी घर 7 रेस कोर्स में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। इसी प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने परमाणु योजना की जानकारी दी। हालांकि अटल बिहारी परमाणु टेस्‍ट का श्रेय पूर्व पीएम पीवी नरसिम्‍हा राव के देते हैं। राव को श्रद्धांजलि  देते हुए अटल ने कहा था कि ‘मई 1996 में जब मैंने राव के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली तो उन्होंने मुझे बताया  गया था कि बम तैयार है। मैंने तो सिर्फ विस्फोट किया है।’ 
दरअसल, साल 1995 में एक अमरीकी जासूसी सेटेलाइट ने राजस्‍थान के पोखरण में होने जा रहे परमाणु परीक्षण की तैयारी भांप ली थी। यह पता चलते हही तुरंत वॉशिंगटन ने भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्‍हा राव से संपर्क किया। अमरीका ने इस परीक्षण को रुकवाने के लिए पीएम पर दबाव बनाया और वो उसमें सफल रहा। परमाणु कार्यक्रम को हरी झंडी
एक रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि बहुत ही कम लोग इस बात को जानते हैं कि 1996 की अपनी 13 दिनों की सरकार में अटल ने जो इकलौता फैसला किया था, वो परमाणु कार्यक्रम को हरी झंडी देने का था लेकिन जब उन्हें लगा कि उनकी सरकार स्थिर नहीं है तो उन्होंने ये फैसला रद्द कर दिया। इन सारी घटनाओं से एक बात तो तय है कि राव और अटल, दोनों ही परमाणु कार्यक्रम को लेकर गंभीर थे और हर हाल में परीक्षण करना चाहते थे। वाजपेयी ने अपने कई भाषणों में इस परमाणु टेस्‍ट का श्रेय परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष आर.चिदंबरम और दूसरे रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान के प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम को भी दिया। इसके बाद देश अपनी सरकार के ‘दुस्साहस’ का जश्न मनाने में मशगूल हो गया। 
उधर, दो दिन बाद अमेरिका के तत्‍कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत पर कई सारे प्रतिबंध थोप दिए, लेकिन भारत इसके बाद भी नहीं माना। 13 मई को पोखरण की रेत एक बार फिर थर्राई और ये भूकंप की वजह से नहीं था। भारत ने दो और परीक्षण किए थे। एक बार फिर सरकारी बयान जारी किया गया, जिसमें कहा गया, ‘इससे भूमिगत परीक्षणों का ये तयशुदा दौरा पूरा हो गया।’ पोखरण 2 के दौरान भारत ने एक के बाद एक कुल 5 परीक्षण किए थे। 

स्‍टीव जॉब्‍स की बेटी बोली, महानता वाली कहानी के साथ फिट नहीं हुई


मशहूर आइ-फोन कंपनी ऐपल के संस्‍थापक रहे स्टीव जॉब्स का अपनी बेटी लीजा ब्रेनन के साथ रिश्ते बेहद खराब थे। यहां तक कि उन्‍होंने कई सालों तक उसे अपनी बेटी नहीं माना। अब उनकी बेटी ने पिता के साथ रिश्तों पर किताब लिखी है।   

'तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा' 
एक घटना को याद करते हुए लीजा ने बताया है कि कैसे एक बार उन्होंने अपने पिता की पुरानी पोर्शे कार मांगी थी जिसके जवाब में स्टीव ने उनसे कहा था कि तुम्हे कुछ भी नहीं मिलेगा। समझी तुम? कुछ भी नहीं, तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।' 

वर्षों तक उन्‍होंने बेटी ही नहीं माना  

लीजा ब्रेनन ने 'स्मॉल फ्राइ' नाम की किताब लिखी है। लीजा स्टीव जॉब्स की पहली बेटी हैं। लीजा ने बताया कि कैसे उनके पिता ने कई सालों तक उन्हें अपनी बेटी माना ही नहीं। जब आखिरकार स्टीव ने स्वीकार किया तो भी अपने आखिरी पलों तक बेटी से एक फासला बनाए रखा। 

पिता ने कहा, टॉयलट सी बदबू आ रही है 
पिता को याद करते हुए लीजा ने लिखा है कि स्टीव जॉब्स जब कैंसर से जूझ रहे थे और बिस्तर से उठ-बैठ भी नहीं पाते थे, तब वह उनसे मिलने गई। वह खुद पर गुलाब की खूशबू वाला सेंट छिड़क कर गई थीं लेकिन स्टीव ने उनसे कहा कि उनमें से टॉयलट सी बदबू आ रही है। ब्रेनन जॉब्स मानती हैं कि उनके जन्म पर शर्मिंदगी होना ही पिता संग खराब रिश्ते की सबसे बड़ी वजह थी।

बेटी मानने के लिए कोर्ट में चला था केस 
लीजा ब्रेनन स्‍टीव जॉब्‍स और क्रिसन ब्रेनन की बेटी हैं। उनका जन्म 1978 में हुआ था। क्रिसन और स्टीव ने एक दूसरे को करीब 5 साल तक डेट किया लेकिन क्रिसन के गर्भवती होने पर दोनों अलग हो गए थे। स्टीव ने बच्चे को अपना मानने से इनकार कर दिया जिसके बाद कोर्ट ने पुरुषत्‍व का टेस्ट करने का आदेश दिया। इसके बाद पुष्टि हुई कि बच्ची के पिता स्टीव जॉब्स ही हैं। 2011 में स्टीव जॉब्स का निधन हुआ था। बेटी के 9 साल की हो जाने तक स्टीव जॉब्स यही दावा करते थे कि वह अशक्‍त हैं, इसलिए वह पिता नहीं बन सकते। बाद में स्टीव जॉब्स के पत्नी लॉरेन पॉवेल के साथ तीन बच्चे हुए। 

'महानता और गुणों वाली कहानी के साथ मैं फिट नहीं हुई
हालांकि, बाद में स्टीव जॉब्स ने माफी मांगी लेकिन लीजा ने किताब में लिखा कि उनके पिता संग रिश्ते हमेशा तनावपूर्ण रहे। उन्होंने बताया,  कभी-कभी वह पिता के घर जाया करती थीं लेकिन उनकी बातचीत के बीच भी लंबी चुप्पी रहा करती थी। लीजा ने जीवनी में लिखा है कि उनके लिए मैं उनकी तरक्की पर एक दाग की तरह थी क्योंकि हमारी कहानी उस महानता और गुणों वाली कहानी के साथ फिट नहीं हुई जो वह अपने लिए चाहते थे। मेरे लिए ठीक इसका उलट था। मैं उनके जितना करीब होती, उतना कम शर्मिंदगी महसूस करती। 

Sunday, August 19, 2018

देवानंद ने नीरज को दिया था फिल्‍मों में ब्रेक

देवानंद ने नीरज को पहली बार मुंबई में एक कवि सम्मेलन में सुना था। उन्होंने नीरज से कहा कि मुझे आपकी भाषा पसंद आई। किसी दिन हम साथ मे काम करेंगे। फिर कभी 60 के दशक के अंत में जब नीरज को पता चला कि देवानंद 'प्रेम पुजारी' नाम की एक फिल्म बनाने जा रहे हैं तो नीरज ने उन्हें एक खत लिखा और उनके वादे की याद दिलाई। देवानंद ने उन्हें मुंबई बुलाया। उनके आने पर, देवानंद ने उन्हें 1000 रुपये दिए और उनसे कहा कि मैं कल आपको अपने संगीत निर्देशक एसडी बर्मन के पास ले चलूंगा।

अगले दिन जब वे एसडी बर्मन के पास पहुंचे, तो बर्मन ने नीरज को बताया कि वे एक गाना चाहते हैं जो 'रंगीला' शब्द से शुरू हो. इस तरह से 'रंगीला रे तेरे रंग में...' का जन्म हुआ। बर्मन, जिन्हें लोग प्यार से 'दादा' कहा करते थे, उन्हें नीरज के गीत की दिल छू लेने वाली पंक्तियां बहुत पसंद आई थीं।

बर्मन और नीरज की जोड़ी का कमाल 
70 का दशक बर्मन और नीरज की इस जोड़ी के दिये अनेक बेहतरीन गीतों का गवाह बना, जिसमें 'शर्मीली', 'गैम्बलर' और 'तेरे मेरे सपने के' गीत शामिल थे। नीरज बताते हैं कि रोज सवेरे 9 बजे वे बर्मन के ऑफिस पहुंच जाते थे। नीरज कहते हैं कि उनके साथ काम करते हुये वे वक्त को भूल ही जाते थे। वे अपने काम को लेकर बेहद समर्पित थे।
 नीरज बताते हैं कि एसडी बर्मन ने नीरज से शमा, परवाना, शराब, तमन्ना, जानेमन, जान और इश्क जैसे शब्दों का प्रयोग बंद करने को कहा। ऐसे में नीरज ने उन्हें अपने गीतों में बगिया, मधुर, गीतांजलि, माला, धागा जैसे शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया। नीरज बताते हैं कि कि बर्मन प्रयोग करने में बेहतरीन थे। जैसे वे अंतरा पहले कर देते थे और मुखड़ा बाद में। साथ ही कई सारे वाद्ययंत्रों का उन्होंने पहली बार हिंदी गानों में प्रयोग किया। एक इंटरव्यू में नीरज यह भी कहते हैं कि सोचिये बिना उनके हमारा संगीत कितना गरीब होता?


जब नीरज ने ही बताई अपने गाने की धुन
नीरज ने प्रसिद्ध संगीत निर्देशक शंकर-जयकिशन के साथ भी काम किया है। 'लिखे जो खत तुझे...' और 'आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं...' जैसे बेहतरीन गाने दिए। जब नीरज ने शंकर-जयकिशन के लिये फिल्म 'मेरा नाम जोकर' (1970) में 'ए भाई जरा देख के चलो...' गाना लिखा तो उन्होंने नीरज से कहा कि इसका म्यूजिक देना तो नामुमकिन है. क्योंकि इसमें कोई मुखड़ा नहीं है। ऐसे में नीरज ने खुद अपनी धुन संगीत निर्देशकों को सुझाई।

आखिरी तक देवानंद नीरज के संपर्क में रहे
पिछली उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जा भी दिया था। नीरज बताते हैं कि देवानंद भी आखिरी वक्त तक उनके संपर्क में थे। हालांकि नीरज ने एसडी बर्मन के गुजरने और शंकर-जयकिशन के दौर के खत्म होने के बाद फिल्मों के लिये गीत लिखने बंद कर दिए थे। कारण था कि नए संगीतकार नीरज के साथ वैसा सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे थे।

राम तेरी गंगा मैली हुई पाप धोते-धोते

गंगा नदी भारतीय जन-मानस की आस्था का जीवन्त प्रतीक है। धार्मिक महत्‍व के साथ गंगा भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह नदी भारत के 11 राज्यों में भारत की आबादी के 40 प्रतिशत लोगों को पानी उपलब्ध कराती है। दूसरे शब्दों में गंगा भारत की जीवनरेखा है। गंगोत्री से अवतरित पावन गंगा आज दिन-प्रतिदिन मैली होती जा रही है। आज यह दुनिया की छठी सबसे प्रदूषित नदी मानी जाती है। गंगा को लेकर एनजीटी की टिप्‍पणी ने चिंता बढ़ा दी है। एनजीटी ने कहा है कि अगर सिगरेट के पैकेट पर 'स्वास्थ्य के लिए हानिकारक' चेतावनी लिख सकते हैं तो प्रदूषित गंगा के पानी को लेकर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है। प्रदूषण को लेकर ट्रिब्यूनल ने नाराजगी जताते हुए यह भी कहा कि हरिद्वार और उन्नाव के बीच गंगा नदी का पानी पीने और स्नान करने के लिए उपयुक्त नहीं है। एनजीटी ने कहा कि लोग गंगा का पानी पीते और उसमें स्नान करते हैं, बिना यह जानते हुए कि यह उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।


हरिद्वार में भी गंगा हुई मैली  
हरिद्वार में गंगा की हालत इतनी बुरी है कि तमाम गंदे नाले सीधे गंगा में जा रहे हैं। राज्य में त्रिवेंद्र सरकार आने के बाद गंगा को तवज्जो देते हुए जल्द प्रभावी कदम उठाने के दावे किए। सरकार ने उसके लिए कदम भी उठाए। इसके बावजूद हरिद्वार में अब भी शवों को गंगा के किनारे बहते देखा जा सकता है। हरिद्वार के चंडी घाट पर 10 नंबर ठोकर पर साधु संतों के शरीर को जल समाधि दिए जाने की लंबे समय से प्रथा रही है। ठोकर नंबर 10 पर अगर हरिद्वार में कोई भी संत मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसके शरीर को इसी जगह पर जल समाधि दी जाती है। यहां पर शवों को पड़े देखा जा सकता है। जिन हालात में शव पड़े होते हैं, उससे यह जाहिर होता है कि यह सब किसी साधु संत के नहीं बल्कि कोई यहां पर इन्हें फेंककर गया है। गंगा में कई बार पालतू और जंगली जानवरों के शवों को भी बहते देखा जा सकता है। इसके बाद तो गंगा का पानी की हालत और भी खराब होती जाती है। 


प्रदूषण के कारण 
गंगा में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण इसके तट पर निवास करने वाले लोगों द्वारा नहाने, कपड़े धोने, सार्वजनिक शौच की तरह उपयोग करने की वजह है। अनगिनत टैनरीज, रसायन संयंत्र, कपड़ा मिलों, डिस्टिलरी, बूचड़खानों और अस्पतालों का अपशिष्ट गंगा के प्रदूषण के स्तर को और बढ़ा रहा है। औद्योगिक अपशिष्टों का गंगा में प्रवाहित होना बढ़ते प्रदूषण का कारण है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगाजल को प्रदूषित किया है। जांच में पाया गया कि गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह चिन्ताजनक है कि गंगाजल न पीने के योग्य रहा, न स्नान के योग्य और न ही सिंचाई के योग्य रहा है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार गंगा के जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड एवं क्रोमियम जैसे जहरीले तत्व बड़ी मात्रा में मिलने लगे हैं। 

नदी में ऑक्सीजन की मात्रा में आर्इ् कमी 
केन्द्रीय जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा का पानी तो प्रदूषित हो ही रहा है, साथ ही बहाव भी कम होता जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो गंगा में पानी की मात्रा बहुत कम व प्रदूषित हो जाएगी। गंगा के घटते जलस्तर से सभी परेशान हैं। गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा भी सामान्य से कम हो गई है। वैज्ञानिक मानते हैं कि गंगा जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को समाप्त कर देते हैं किन्तु प्रदूषण के चलते इन लाभदायक विषाणुओं की संख्या में भी काफी कमी आई है। इसके अतिरिक्त गंगा को निर्मल व स्वच्छ बनाने में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे कछुए, मछलियाँ एवं अन्य जल-जीव समाप्ति की कगार पर हैं। गंगा के जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड एवं क्रोमियम जैसे जहरीले तत्व बड़ी मात्रा में मिलने लगे हैं, जोकि चिंता का विषय है। पर्यावरणविदों एवं वैज्ञानिकों के अनुसार जब तक गन्दे नालों का पानी, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा, सीवेज, घरेलू कूड़ा-करकट पदार्थ आदि गंगा में गिरते रहेंगे, तब तक गंगा का साफ रहना मुश्किल है।

गंगा के प्रदूषण के कारण 
-गंगा अपनी धारा के साथ मिट्टी ढोने वाली विश्‍व की दूसरी सबसे बड़ी नदी है। गंगा मिट्टी के साथ-साथ औद्योगिक कचरा और सीवेज भी अपनी धारा में समेटने को बाध्‍य है।
- गंगा के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण कल-कारखानों के जहरीले रसायनों को नदी में बिना रोक-टोक के गिराया जाना है। कानून बनने के बाद भी हजारों प्रदूषणकारी औद्योगिक इकाइयों का गंदगी और जहरीला रसायन भी आज भी गंगा में मिल रहा है। 
-जब कारखानों या थर्मल पावर स्‍टेशनों का गर्म पानी तथा रसायन या काला या रंगीन नदी में मिल जाता है तो नदी के पानी को जहरीला बनाने के साथ नदी के खुद के शुद्धिकरण की क्षमता को नष्‍ट कर देता है। नदी में मौजूद बहुत से सूक्ष्‍म वनस्‍पतियां और जीव जंतु भी सफाई में मदद करते हैं, उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा, कहीं एक तो कहीं दो किलोमीटर के डेडजोन मिलते हैं। यहां से गुजरने वाला कोई भी जीव जंतु या वनस्‍पति जीवित नहीं बचता। 
-खेती में प्रयोग होने वाले रासायनिेक खादों और जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग भी खतरनाक है। ये रसायन बरसात के समय बहकर नदी में पहुंच जाते हैं और नदी की पारिस्थितिकी को बिगाड़ देते हैं। 
-गंगा में प्रदूषण का एक बड़ा कारण भारतीयों की जीवनशैली की धार्मिक मान्‍यताओं से जुड़ा है। गंगा में केवल वाराणसी में 33 हजार से अधिक शवों के दाह के बाद 700 टन से अधिक राख और अधजले शव या कंकाल बहा दिये जाते हैं। इसके अलावा गंगा में बड़ी संख्‍या में शव बिना जलाए प्रवाहित किए जाते हैं। कुछ समय पहले काफी संख्‍या में गंगा में प्रवाहित शव ऊपर आ गए थे। इनमें काफी संख्‍या में कर्इ बीमारियों से ग्रसित होते हैं। इस कारण भी गंगा जल प्रदूषित होता है। 
- गंगा प्रदूषण का एक प्रमुख कारण रेत खनन भी है।
-गंगा पर शुरू में ही टिहरी तथा अन्‍य स्‍थानों पर बांध और बैराज बना दिए गए। इससे गंगा के जलप्रवाह में भारी कमी आई है। गंगा के प्रदूषण का यह भी एक कारण है। बांधों और बैराजों के कारण नदी की स्‍वाभाविक प्रक्रिया भी रुकती है। यही कारण है कि गंगा शुरूआत से प्रदूषित हो रही है। 
-गंगा में कई स्‍थानों पर राफ्टिंग और अन्‍य व्‍यवसायिक कार्य हो रहे हैं। इस कारण भी गंगा प्रदूषित हो रही है। 


द्रविड़ अस्मिता का पाठ पढ़कर करुणानिधि ने लिखी तमिलनाडु की 'पटकथा'


तमिलनाडु में करुणानिधि को कलाईनार कहा जाता था, इसका अर्थ होता है कला का जादूगर। करुणानिधि को दक्षिण भारत में एंटी-ब्राह्मणवादी राजनीति का प्रतीक माना जाता था। डीएमके संस्थापक अन्नादुराई और उनके आदर्श पेरियार की तरह करुणानिधि सालों से दक्ष‍िण भारत के दिग्गज नेता थे। 

करुणानिधि की पैदाइश 1924 में थिरुक्कुवालाई गांव में हुई। करुणानिधि का परिवार आर्थिक रूप से कमज़ोर था, लेकिन वे उत्साही बालक थे। पढ़ने और आगे बढ़ने को तैयार, जिस समुदाय से वे आते हैं, वो पारंपरिक रूप से संगीत वाद्ययंत्र ‘नादस्वरम’ बजाने का काम किया करता था। बचपन में करुणानिधि गांव के मंदिर में संगीत सीखने जाते थे।  वादन तो जाने कितना सीख पाए, पता नहीं लेकिन यहीं गुरु ने बालक को जातिगत भेदभाव का पहला पाठ पढ़ाया। तथाकथित निचली जाति के बालक करुणानिधि को मंदिर में कमर के ऊपर कोई कपड़ा पहनकर प्रवेश नहीं मिलता था। उन्हें धुनें भी कुछ ही सिखाई जाती थीं। बच्‍चे ने देखा कि जातिगत भेद संगीत में भी पसरा हुआ था। ऐसे में संगीत से उसका मन उचट गया लेकिन राजनीतिक प्रतिरोध का दरवाजा खुल गया

किशोरावस्‍था में ही वे विचारक ई वी रामास्वामी ‘पेरियार’ के विचारों से प्रभावित हुए और उनके खड़े किए ‘आत्मसम्मान’ के आन्दोलन से जुड़ गए। यह आन्दोलन गैर-ब्राह्मणवादी भावों से ओतप्रोत था। द्राविड़ जन को ‘आर्यन’ ब्राह्मणवाद के खिलाफ उठ खड़े होने को आंदोलित कर रहा था।


कलम को बनाया हथियार
करुणानिधि 14 साल की उम्र में ही राजनीतिक प्रतिरोध की दुनिया में प्रवेश कर गए थे। जब 1937 में हिन्दी भाषा को स्कूलों में अनिवार्य भाषा की तरह लाया गया, पेरियार की विचारधारा से प्रभावित तरुण युवा विरोध में सड़कों पर उतर आए। करुणानिधि भी इन्ही में से एक थे। उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया। लिखना शुरू कर दिया था और नाटक, पर्चे, अखबार, भाषण उनके हथियार बन गए। 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने तमिल फिल्म उद्योग की कंपनी 'ज्यूपिटर पिक्चर्स' में पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू किया था।  अपनी पहली फिल्म 'राजकुमारी' से ही वे लोकप्रिय हो गए। उनकी लिखीं 75 से अधिक पटकथाएं काफी लोकप्रिय हुईं। 

ओजस्वी भाषण कला और लेखन शैली का कमाल 
वे कोयम्बटूर में रहकर व्यावसायिक नाटकों के लिए स्क्रिप्ट्स लिखने का काम कर रहे थे, जब पेरियार और अन्नादुराई की उन पर नज़र पड़ी।  उनकी ओजस्वी भाषण कला और लेखन शैली को देखकर उन्हें पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया गया। यह 1947 में पेरियार और उनके सिपहसालार अन्नादुराई के बीच उभरे मतभेदों और 1949 में नई पार्टी ‘द्रविड़ मुनेत्र कझगम’ की स्थापना के पहले की बात है। देश की आजादी के साथ ही पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए। अन्नादुराई ने मुख्यधारा  राजनीति का हाथ थामा।

फिल्‍म 'परासाक्षी' के बाद गठित हुई डीएमके
बंटवारे के बाद करुणानिधि अन्नादुराई के साथ गए। पार्टी के पहले खजांची बने। नई पार्टी के लिए पैसा जुटाने की ज़िम्मेदारी अकेले उठाई। लेकिन इस बीच वे सिनेमा की ओर निकल गए थे, विचारधारा की खेती फिल्‍म के परदे पर हो रही थी। 1952 में उनकी लिखी ‘परासाक्षी’ आई। मेलोड्रामा से भरपूर ब्‍लॉकबस्टर रही। गरीब तमिल नायक, जिसे आततायी उत्तर-भारतीय साहूकारों, ब्राह्मण नेताओं और असंवेदनशील सरकार का अत्याचार सहना पड़ता है। फिल्म के आखिर में द्रविड़ अस्मिता की आवाज बुलंद करती है, जिस विचार पर उनकी पार्टी की नींव रखी गई थी। सत्तावन में पार्टी पहला विधानसभा चुनाव लड़ी और करुणानिधि चुने गए 13 विधायकों में शामिल थे। 

दस साल लगे राजनीति को पलटने में
1967 में यही तेरह विधायकों वाली पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और अन्नादुराई राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। दक्षिण भारत में उबल रहा भाषाई विवाद और ‘हिंदी विरोधी’ भावनाओं ने अपना खेल कर गया था। सड़सठ में कांग्रेस का तमिलनाडु में ऐसा सूरज अस्त हुआ कि आज तक वो अन्य द्रविड़ पार्टियों की ‘सहयोगी’ ही बनी हुई है। 

राजनीति में हार गया लेखक
लेकिन सत्ता संभालने के दो ही साल बाद 69 में अन्नादुराई की कैंसर में मौत हो गई। इसका मतलब था करुणानिधि का सीधे सत्ता में आना। वे नए मुख्यमंत्री बने और 71 में दोबारा अपने दम पर जीतकर आए, यहां सिनेमाई हीरो एमजी रामचंद्रन उनके नए साथी बने, लेकिन यह साथ ज्यादा नहीं चला। एमजीआर ने नई पार्टी बना ली, नाम रखा एआइएडीएमके। फिर 1977 में दोनों पहली बार आमने-सामने उतरे। यह सिनेमाई मुकाबला था। एक ओर लेखक, दूसरी ओर हीरो। हीरो अपनी लोकप्रियता की ताल ठोकता। लेखक को ये गौरव की उसकी कलम ने ही हीरो को बनाया है, लेकिन जनता तो परदे पर हीरो को ही देखती है 1977 में एमजीआर ने करुणानिधि और उनकी पार्टी को चुनावों में ऐसा हराया कि फिर वो एमजीआर के जीते जी दोबारा सतह पर नहीं आ पाए, डूब ही गए। पता चला कि सिनेमा के दर्शक ही चुनाव के वोटर थे। कलम वाले लेखक की परदे वाले हीरो के आगे हमेशा हार हुई। 

वापस हासिल की राजनीतिक ताकत
दस साल ऐसा ही चला। फिर 1987 में एमजीआर की मृत्यु के बाद एआइडीएमके में सत्ता की लड़ाई छिड़ गई। एक ओर थीं एमजीआर की पत्नी जानकी और दूसरी ओर पार्टी की युवा नेता जे जयललिता। इसी ने मौका दिया करुणानिधि को खोई हुई राजनैतिक ताकत वापस हासिल करने का। उधर जयललिता उनकी विरोधी पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत बना रही थीं, इधर करुणानिधि दावा कर रहे थे कि ‘द्रविड़ नाडु’ में उन्हें एक ब्राह्मण नेत्री कैसे चुनौती दे सकती हैं, लेकिन जयललिता को कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी समझना ही शायद करुणानिधि की सबसे बड़ी राजनैतिक भूल साबित हुई। जयललिता ने द्रविड़ अस्मिता के साथ स्त्री अस्मिता दोनों को अपनी ताकत बनाया। 

जब प्रतिरोध की मूरत बन गईं जयललिता
1989 में फिर डीएमके को सबसे बड़ा धक्का लगा, जब भरी विधानसभा में जयललिता की साड़ी खींची गई। राजनीति के अखाड़े को किसी मिथकीय मल्टीमीडिया सिनेमा की तरह जीने वाली तमिलनाडु के जनता ने इसमें ‘महाभारत’ के द्रौपदी चीरहरण प्रसंग का अक्स देखा और पुरुषों से भरी राजनीति में अचानक जयललिता प्रतिरोध की मूरत बन गईं। 1991 में हुए चुनावों में एआइडीएमके ने 224 सीटें जीतीं और DMK को एक अंक पर समेट दिया। इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति करुणानिधि और जयललिता के बीच सत्ता के अदल-बदल की राजनीति बन गई थी। हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता था और भरपूर होता था। अपने 60 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के सीएम बने। उनके नाम सबसे ज्यादा 13 बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी है। 

Saturday, March 10, 2018

बनारस है बनारस के मानस से

   
                 

बनारस रोज़ देखा जाने वाला, कहा जाने वाला, सुना जाने वाला लिखा जाने वाला और इन सबसे ऊपर जीया जाने वाला शहर है। इसकी इतनी परिभाषाएं और व्यंजनाएं हैं कि यह शहर हर लफ़्ज़ के साथ कुछ और हो जाता है। लिखनेवाले की गिरफ़्त से निकल जाता है। मैं बनारस के ख़िलाफ़ किसी बनारस को खोजने निकला था मगर हर जगह मिला उसी बनारस से जिसे मीडिया ने एक टूरिस्ट गाइड की तरह एकरेखीय वृतांत में बदल दिया था। वृतांतों का रस है बनारस।

दरअसल, बनारस कोई शहर ही नहीं है। यह कभी था न कभी है और कभी रहेगा। शहर होता तो किसी पेरिस जैसा होता, किसी लुधियाना-सा होता या किसी दिल्ली-सा। सड़कों दीवारों से बनारस नहीं है। बनारस है बनारस के मानस से। आचरण, विचरण और धारण से। जो भी मिला बनारस को धारण किए मिला। बनारसीपन। इसके बिना तो कोई बाबा विश्वनाथ को देख सकता है न बनारस को। यह बनारस का होकर बनारस को जीने का शहर है। यह न मेरा है न तेरा है न उसका है, जो बनारस का है।

बहुत कम हुआ जब लौट आने के बाद किसी शहर की याद आई। किसी शहर में जागने-सा अहसास हुआ। सोचता रहा कि क्या लिखूं बनारस पर। क्या नहीं लिखा जा चुका है। इस शहर के लोग किसी दास्तान की तरह मिलते हैं। क़िस्सों से इतने भरे हैं कि सुनाते-सुनाते ख़ुद किसी किस्से में बदल जाते हैं। मिलने और बोलने का ऐसा रोमांच कहीं और महसूस नहीं हुआ। जो भी मिला उसे जितना मिलना चाहिए उससे ज़्यादा मिला। कम तो कोई मिला ही नहीं। कम तो हम दिल्ली वाले मिले। सोचते रह गए कि कितना मिले और सामने वाला पूरा मिलकर चला गया। बनारस को खोजना नहीं पड़ता है। कहीं भी मिल जाता है।

हम बाबा ठंडई की दुकान पर थे। उनकी शान में क़सीदे पढ़ते रहे कि हर साल आपकी ठंडई एक मित्र से बुज़ुर्ग के हवाले से दिल्ली पहुंच जाती है। पिछले कई सालों से आपकी ठंडई पी रहा हूं। कोई चालीस-पचास साल से ठंडई बना रहे जनाब ने ऊपर देखा तक नहीं कि कौन है क्या बोल रहा है। बस किसी साधना की तरह ठंडई बनाने में लगे रहे। साधना ज़रूरी है। चाहे आप देश चलाएं या ठंडई बनाए। मगर वहीं खड़े किसी शख़्स ने किसी को भेजकर पान मंगवा दिया।

लस्सी की दुकान का पता बता दिया। कार से गुज़रते वक्त पान और चाय की दुकानों पर लोगों को जमा देखा। रुककर खाकर बतियाते देखा । लगा कि इस शहर में लोग दफ़्तर दुकान जाने के अलावा भी घर से निकलते हैं। सुबह-सुबह चाय पीने गया था। बस किसी ने किसी को कह दिया कि बाइक से इन्हें पार्क तक छोड़ आओ। बिना देखे बिना जाने उसने चाय छोड़ी और पार्क तक छोड़ आया। जिन्हें भी जीवन में बात करने की समस्या है। लगता है कि वो तर्क नहीं कर पाते। वो बनारस चले जाएं। बोलने लग जाएंगे। ख़ासकर टीवी के ये बौराये और झुंझलाये एंकरों को हर साल बनारस जाना चाहिए।

रेडियो मिर्ची के दफ़्तर गया था। नौजवान जौकियों के संसार में। बात करने की ऐसी शैली कि मेरा बस चले तो हर जौकी बनारस की सड़कों से उठा लाऊं। सबके पास कुछ न कुछ अतिरिक्त था, मुझे देने के लिए। आज के इस दौर में उनके पास बहुत-सी गर्मजोशियां बची हुई हैं। जल्दी समझ गया कि यह टीवी में दिखने के कारण नहीं है। जो प्यार बह रहा है वो बनारस के कारण है। मिर्ची के इन मिठ्ठुओं से मेरा भी दिल लग गया। तोते की तरह बोलता था वो मोटू! तो शांत संभलकर अमान और रह रहकर सोनी। एक से एक किस्सागो। बात-बात में मैं विशाल के साथ लाइव हो गया। उनके कुछ और दोस्तों से मुलाक़ात हुई। हर मुलाक़ात में मैं बस इस शहर के लोगों में मिलने की फ़ितरत देख रहा था। कितना मिलते हैं भाई। भाइयों ने मेरी शान में दफ़्तर के भीतर चाट का एक स्टाल ही लगा दिया। टमाटर की चाट। वाह। दिल्ली वालों को पता चल गया तो हर नुक्कड़ और बारात में बेचकर खटारा बना देंगे।

मुझे पता है कि जितना मिल जाता है उतना लायक नहीं हूं। वैसे भी क्या करना है हिसाब कर। टीवी के फ़रेब के नाम पर प्यार ही तो मिल रहा है। मैं माया में यक़ीन करता हूं। सब माया है। माया मिलाती है, माया रुलाती है और माया हंसाती है। घड़ी की दुकान में स्ट्रैप बदलवाने गया था। जनाब ने कोई स्पेशल जूस मंगवा दी। कहा कि पीते जाइये। ज़ोर देकर कहा कि मैं चाहता हूं कि आप पीयें। ये बनारस का असली है। मैंने तो कहा भी नहीं था पर वो यह जूस पिलाकर काफी ख़ुश दिखे। इतने ख़ुश कि लाज के मारे शुक्रिया कहते न बना।


वो पता नहीं कौन लड़का था। लंका चौक पर जहां बीजेपी का धरना चल रहा था। भयानक गर्मी थी। वो पहले जूस लाया फिर पार्कर पेन ख़रीद लाया खुद ही पैकेट से निकाल कर जेब में रख गया। किसी चैनल के फ़्रेम में देखकर वो महिला अपने पति और बेटी के साथ दौड़ी चली आई। हांफ रही थी। वो घर ले जाकर खाना खिलाना चाहती थी। काश मैं चला गया होता। और वो कौन था जो मिर्ची दफ़्तर के बाहर हम सबकी चाय के पैसे देकर चला गया। आठ दस लोगों की चाय के पैसे। मैं सोचता रह गया कि हमने कब किसी अजनबी के लिए ऐसा किया है। उफ्फ!

अजीब शहर है कोई ख़ाली हाथ मिलता ही नहीं है। ऐसा नहीं कि मैं टीवी वाला हूं इसलिए लोग मिल रहे थे। मुझसे मिलने के बाद वहां मौजूद किसी से वैसे ही मिल रहे थे। हम दिल्ली वाले मिलना भूल गए हैं। काम से तो मिलते हैं, मगर मिलने के लिए नहीं मिलते हैं। रोज़ दफ़्तर से लौटते वक्त ख़ाली-सा लगता हूं। अब तो मेरा एकांत ही मेरी भीड़ है। मैं भी तो कहीं नहीं जाता। जाने कब से अकेला रहना अच्छा लग गया। ग़नीमत है कि फेसबुक ट्वीटर है।
जो भी अकेले में बड़बड़ाता हूं, लिख देता हूं। अकेले बैठे बैठाए दुनिया से मिल आता हूं। काम और शहर के अनुशासन की क़ीमत पर मुलाक़ात का बंद होना ठीक नहीं। हम मिलते तो यहीं बनारस बना देते। बनारस एक-दूसरे से मिलता है इसलिए बनारस है। दिल्ली के नाम में तो दिल है मगर दिल है कहां। दिल्लगी है कहां और कहां है दीवानगी। बनारस में है। वहां के लोगों में है। आप सबने मुझे बेहतरीन यादें दी हैं। मैं बनारस को याद कर रहा हूं।

नाचा को हबीब ने दिया अंतरराष्ट्रीय मंच

बिना साधनों के अकेले हबीब तनवीर ने एक निर्देशक और रंगकर्मी के रूप में जो महत्वपूर्ण काम किया, वह बेजोड़ है। छत्तीसगढ़ से ही स्थानीय कलाकारों को लेकर उन्हीं की भाषा, संगीत और परिवेश को रचकर उन्होंने नई रंग सृष्टि की। ‘चरणदास चोर’ हो या ‘गांव वा नांव ससुराल’ ‘मोर नांव दामाद’ या फिर ब्रेख्त के रुपांतर के माध्यम से उन्होंने हिंदी रंगमंच को आंचलिकता से जोड़ कर नई अर्थवत्ता प्रदान की। उन्होंने नाटकों का इस्तेमाल सामाजिक बदलाव के लिए एक हथियार के रूप में किया। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य विधा नाचा को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया।   

 नाचा छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य विधा है, जिसकी जड़ें यहां के कृषि प्रधान ग्रामीण समाज से जुड़ी हुईं हैं। उसमें कई परंपरागत विधाओं ने सम्मलित होकर समृद्ध किया है। नाचा मूलत: एक हास्य प्रधान नाट्य विधा है, जिसमें ग्रामीण कलाकार अपनी तत्कालीन समस्याओं, सामाजिक बुराइयों एवं सामाजिक विसंगतियों पर अपनी प्रतिभा के माध्यम से कटाक्षपूर्ण टिप्पणियां कर उनके खोखलेपन को उजागर करते हैं। नाचा कलाकारों में जबरदस्त हास्यवृत्ति पाई जाती है और वे जीवन की कटुतम विसंगतियों एवं अनुभवों पर बिना किसी कटुता के सहज ही विनोदपूर्ण टिप्पणी के प्रस्तुत करते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी कें आरंभ में मराठों और महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों की एक बड़ी संख्या छत्तीसगढ़ में आकर बस गई। आक्रमणकारी मराठा सेना के साथ उनके मनोरंजन करने वाले विभिन्न समुदाय भी थे, जिसमें नाचने-गाने वाले कलाकार एवं हास्य, गम्मत, प्रहसन आदि प्रस्तुत करने वाले लोग भी थे। गम्मत शब्द का प्रयोग मराठी भाषा में हास्य-विनोद के अर्थ में किया जाता है। गम्मत में स्त्री पात्र की प्रस्तुति भी पुरुष कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की जाती थी। गम्मत का वह यह पात्र ‘नाच्या’ कहलाता था। छत्तीसगढ़ नाचा लोक नाट्य का विकास भी गम्मत  से ही शुरू हुआ और गम्मत के इस नाच्या पात्र के आधार पर ही छत्तीस गढ़ी गम्मत के विकसित नाट्य स्वरूप का नामकरण नाचा के रूप में पड़ा।  

कर्मकांडों पर विनोदपूण व्यंग           
हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित नाटक ‘पोंगा पंडित’ में कर्मकांडों पर विनोदपूण व्यंग किया जाता है। इस नाटक में एक अपढ़ ब्राह्मण पुरोहित और एक किसान के बुद्धु बेटा प्रमुख पात्र हैं। किसान की मृत्यु होने पर उसकी विधवा अपने भोले-भाले बेटे से किसी ब्राह्मण को बुलाकर सत्यनारायण की कथा करवाने को कहती है। लड़का उस अपढ़ ब्राह्मण को बुला लाता है, जिसे कथा का कोई ज्ञान नहीं है, परंतु वह कर्मकांड को ढोंग करता है। वह लड़का भी पूजा-पाठ से पूर्णत: अनभिज्ञ है। दोनों ही पात्र अपने-अपने अज्ञान एवं सरल ग्रामीण भोलेपन की प्रस्तुति कर हास्य का सृजन करते हैं। इस नाटक का 90 के दशक में आरएसएस व अन्य हिन्दू संगठनों ने जमकर विरोध किया। ‘गांव के नाम सुसराल मोर नाम दामाद’ नामक नाचा भी हास्य से ओत प्रोत है। इस नाचा को भी हबीब तनवीर ने अपने नया थियेटर के माध्यम से प्रस्तुत किया। हबीब ने संस्कृत के कुछ नाटकों का प्रस्तुतिकरण नाचा शैली में किया, जिसमें शूद्रक का नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ का रुपांतर मिट्टी का गाड़ी सफल रहा। उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘शांजापुर की शांतिबाई’ के नाम से और बैकेट का नाटक ‘गोडोला अगौत हौं’ के नाम से भी नाटक नाचा शैली में प्रस्तुत किए।
नाटकों में कलाकारों ने दिखाई प्रतिभा गत पचास वर्षों में जिन प्रमुख कलाकारों ने अपनी प्रतिभा और कौशल से नाचा का संबंर्धन किया, उनमें ठाकुर राम, लालू राम, मदन निषाद, राम लाल, द्वारका, भुलवाराम, अमर सिंह, फिदा बाई, किस्मत बाई, माला बाई, गोविंद राम, न्यायिक दास, झुमक दास आदि सैकड़ों ग्रामीण एवं निरक्षर परंतु श्रेष्ठ कलाकारों के नाम लिए जा सकते हैं। कुछ नाचा कलाकार नाचा शैली से बाहर जाकर बड़े एवं समर्थ कलाकारों के रूप में अपनी प्रतिभा को प्रतिष्ठित कर सके हैं, उनमें द्वारका, अमर सिंह, फिदा सिंह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इन सभी को हबीब तनवीर ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। नाचा लोकनाट्य स्वरूप का इतिहास यद्यपि लगभग एक शताब्दी का ही है किंतु उसने बीसवीं शताब्दी के एक सक्षम एवं पूर्ण विकसित नाट्य स्वरूप के रूप में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में गहरी जड़ें जमा ली है।

                                                              

दिल ढूढ़ता है फिर वही फुरसत के रात-दिन...


फिल्म ‘स्लॅमडाग मिलेयनियर’ में जय हो गीत पर आस्कर आवर्ड जीतने पर एआर रहमान के अलावा गुलजार का लोहा दुनिया ने मान लिया है। ऐसे में यह बात सोचने को मजबूर कर देती है कि गुलजार के गीतों में वह कैसा जादू है, जो लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है। वस्तुत: गुलजार मध्यवर्ग के ऐसे शायर हैं, जिन्होंने अपनी सृजनात्मक कल्पनाशीलता से शायरी और गीतों को नया आयाम दिया है। उन्होंने व्यापक स्रोताओं के आस्वाद को तो बदला ही, बल्कि उसे नई ऊंचाइयां भी दीं। फिल्मों की दुनिया में गुलजार ऐसे शायर है, जिसकी खामोशी भी बोलती है। उनके यहां बहते हुए आसुंओं से ज्यादा तकलीफ पलकों पर ठहरे मोती पैदा करते हैं। उनकी शायरी कम शब्दों में ज्यादा कहना चाहती है। उसकी ताकत और जड़ें बंगाली, पंजाबी और उर्दू की परंपरा से मिलती है, पर उसकी लिपि हिंदी है। 

        गुलजार की शायरी और गीतों में मानवीय रिश्ते, उसमें भी स्त्री-पुरुष संबंध और उनके बीच समय के साथ निर्मित होने वाली दरारें काफी अहमियत रखती है, बल्कि उसे फिर से जोड़ने का प्रयास भी करते हैं। जैसे ‘ मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता, लेकिन उसकी सारी गिरहें साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे।’ इस बारे में अमृता प्रीतम का कहना है कि गुलजार ने उसे रिश्ते के शक्ति कण भी झेले हैं, जो जाने कितनी सदियों की छाती में बसा हुआ है ... कह सकती हूं कि आज के हालत पर गुलजार ने जो लिखा, हालात के दर्द को अपने सीने में पनाह देते हुए और अपने खून के कतरे उसके बदन से उतारते हुए।’’  गुलजार को ये रिश्ते , दर्द और पहचान अपनी पैदाइश, परवरिश, विभाजन की त्रासदी और आगे चलकर उनके और राखी के संबंधों में जुड़ाव और फिर अलगाव से मिला है। यही कारण है कि उन्होंने धर्म, जाति और लैंगिक भेदभाव से परे आधुनिक मानवीय संबंधों को जगह दी है, बल्कि अपने तरीके से उसे निर्मित कर नया मुकाम दिया है। गुलजार की काव्यवस्तु संबंधों के जुड़ने, टूटने और उसे नया मोड़ देने से निर्मित होकर मानवीय सरहदों को ध्वस्त करती है। 

  गुलजार के यहां विभिन्न शारीरिक भंगिमाएं मिलती हैं, उस संवेदना को ढ़ूढ़ना और तराशकर निखारना ही उन्हें समकालीन शायरों में विशिष्ट और महत्वपूर्ण बनाता है। उसमें भी आंखों की भंगिमा विशेष रूप से। उनकी शायरी में आंखें अल्हण और चंचल न होकर उन्हीं की तरह खामोश और शाालीन है। उन्हीं के गीतों से कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं-‘आपकी आंखों में कुछ महके हुए से राज हैं’,‘आंखों में हमने आपके सपने सजाये हैं’, ‘जिया जले जां नैने तले धुआं चले’। और न जाने कितने और गीत। आंखों को लेकर इतने विविध आयामों में लिखने वाला शायद ही कोई शायर हो। इन आंखों में मध्यवर्गीय सपने, उम्मीद, प्रेम, टूटन, निराशा, लज्जाशीलता, मूकसंवाद जैसी विविध भावसंपदा को समेटे हुए है। गुलजार की शायरी में आंखें एक ख्वाब से जगाती है और दूसरे ख्वाब में आंखें खोलने को मजबूर करती है, बल्कि यह एक ऐसा ख्वाब है कि जिससे जगाने के बाद हर चीज ख्वाब ही मालूम होती है।           

    गुलजार की शायरी में प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की भंगिमाएं एक दूसरे में प्रवेश कर शाब्दिक करतब में प्रकट होते रहते हैं और शब्दों को नया अर्थ देते हैं। उनके यहां कुछ शब्दों बार-बार आते हैं जैसे-रात, शाम, चांद, खामोशी, जिंदगी, मुस्कुराहट, ख्याल, ख्वाब, कर्ज, दर्द, सपना, साहिल, समुंदर, किनारा, मांझी, दबी हंसी, बेकरार आदि। ये शब्द उनकी शायरी में अन्योक्ति के रूप में आते हैं। कुछ शब्द प्रकृति के हैं तो कुछ मनुष्य के आंतरिक भाव हैं। दोनों एक-दूसरे में समाहित होकर परस्पर अन्य अर्थ देते हैं। गुलजार के यहां शायरी और गीतों में समय के कुछ अजीब संबंध है। समय के साथ शायरी अनेक कलाएं दिखाती है। कभी वर्षों को समेटकर एक क्षण में बांध देती है, कभी क्षण को खोल वर्षों में फैला देती है। कभी समय के दायरे को तोड़ती है तो कभी टुकड़ों को जोड़कर एक दायरा बनाती है। जैसे फिल्म गोलमाल का यह गीत ‘एक बार यूं कभी वक्त से लम्हा गिरा कहीं, वहां दासता मिली, लम्हा कहीं नहीं’। गुलजार के गीत और शायरी बेपर उड़ती है और इसी कारण मध्यवर्गीय मन का सुकून देती है। वहीं गुलजार ने लोकगीतों को भी अपने गीतों में पिरोया है। फिल्म ओमकारा के गीत बीड़ी जलाई ले और नमक इश्क का ठुमरी से लिए गए हैं।

   गुलजार पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे शब्दों के साथ खिलवाड़ में माहिर हैं। अच्छी धुनों का सहारा देकर ही उनकी बहुत सी अर्थहीन रचनाएं सम्प्रेषण की दृष्टि से दुरुह शायरी भी फिल्मों में जगह पा लेती है जैसे यह गीत-‘जब तारे जमीं पर चलते हैं, आकाश जमीं हो जाता है।’ शायरी और कविता से केवल केवल यथार्थवाद की मांग करना गलत है। पाब्लो नेरूदा जैसा यथार्थवादी कवि भी कहता है कि ‘कविताएं शुद्ध यथार्थवादी नहीं हो सकती हैं।’ वस्तुत: विरोधाभास और अत्युक्ति उर्दू शायरी की देन है। 

    समय और परिस्थितियों के अनुरूप गुलजार के गीतों और शायरी में भी बदलाव आया है। 70 के दशक में जहां बेरोजगारी और उससे उत्पन्न अकेलापन, घुटन, संबंधों का तनाव आदि उनकी काव्यवस्तु होती थी, लेकिन उदारीकरण के दौर का प्रभाव और दबाव के कारण यह उनके यहां धीरे-धीरे नदारद होती गयी। यह मध्यवर्ग पर व्यक्तिवाद के हावी होते जाने का परिणाम है।   गुलजार के गीतों और शायरी ने आंतरिक भावों को व्यक्त करने के लिए नया शब्द संसार, नई ध्वनियां और नए संकेत दिए। इससे फिल्मी गीतों और शायरी को नयी मुखरता मिली। सिनेमा और साहित्य ने एक दूसरे को चुनौती देते हुए बदला भी। उनके गीतों की संवेदना, बिंब, ध्वनि, रंग, लय सब दर्शकों के मानस को छूते हैं। आज के उपभोक्तावादी दौर में जब मध्यवर्ग दुनियावी मृग मरिाचका के पीछे भटककर अपने अंदर और रिश्तों में खालीपन सा महसूस कर रहा है, ऐसे में गुलजार की शायरी और गीत मानवीय संबंधों और रिश्तों में मरहम लगाते हुए सुकून दिलाती है।            

शाल्मली और स्त्री विमर्श


यह उपन्यास पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष वर्चस्व को कायम रखने और उससे स्त्री के जुझने की कवायद की कहानी है। इसके माध्यम से कथाकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि पितृसत्तात्मक समाज में आए बदलावों के बावजूद पुरुष स्त्री को बराबरी के अधिकार किसी कीमत पर देने को तैयार नहीं है। इसके लिए वह किसी भी हद तक गुजरने को तैयार है। इसके लिए वह विभिन्न किस्म के षड्यंत्र रचता है। पुरुष भले ही कई स्त्रियों के साथ हमबिस्तर हो, लेकिन स्त्री दूसरे के साथ कहीं जाने तक में उसे आपत्ति है। यानी पुरुषों का बड़ा वर्ग भले ही आधुनिक होने का दावा करता हो, लेकिन वह अपनी सामंती खोल से नहीं बाहर निकला है। पुरुष आधुनिक वहीं तक होता है, जहां तक उसे सुविधा है, नहीं तो उसे सामंती खोल में वापस जाने में गुरेज नहीं है। उपन्यास के माध्यम से नासिरा शर्मा ने विवाह नामक पारिवारिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। इस संस्था के माध्यम से किस प्रकार घरेलू हिंसा को प्रोत्साहन दिया जाता है, उसको दर्शाया गया है।
 यही कारण सभी महिला कथाकारों ने इस संस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं और उसे बदलने की मांग की है। जैसे उपन्यास में शाल्मली का पति उससे कहता है कि ‘‘ तुम जानती चाहोगी पुरुष की दृष्टि में औरत क्या है ? भोगने की वस्तु ...वही उसकी पहचान है। इसलिए तुम औरत की तरह रहो, इसी में तुम्हारा उद्धार है और इस घर का कल्याण और गृहस्थी का सुख।’’ (पेज-128 ) मार्क्‍सवादी विचारधारा के अनुसार आर्थिक स्थितियों में बदलाव के साथ अन्य स्थिातियों में बदलाव होता है, जबकि महिला लेखिकाएं इसे नहीं मानती हैं। उनका कहना है कि आर्थिक स्थितियां बदलने पर भी स्त्री की स्थिति में मामूली बदलाव ही आता है। इस उपन्यास के माध्यम से भी कथाकार ने यही दर्शाने का प्रयास किया है।
शाल्मली को अफसर ग्रेड की नौकरी मिलती है। पहले तो उसका पति नरेश उसे नौकरी नहीं करने देना चाहता है, बहुत मशकक्त के बाद जब तैयार होता है तो वह बार-बार पति होने का हक दर्शाता रहता है। वह कहता है कि ‘‘अब तुम मेरी नकल मत करो। मैं मर्द हूं, कहीं भी आ जा सकता हूं। तुम औरत हो और अपनी मर्यादा पहचानो।’’ मूलत: उपन्यास के माध्यम से समाज की स्थिति को दर्शाने का प्रयास किया गया है। अगर पुरुष महिला से ऊंची पोस्ट नौकरी करता है तो कोई परेशानी नहीं होती है। लेकिन अगर महिला ऊंची पोस्ट पर नौकरी करती है तो अहम का टकराव शुरू हो जाता है और पुरुष इसे टकराव का विषय बना लेता है।   
  इसके साथ ही जब पुरुष गांव से शहर आता है तो उसके रहने सहन में तो बदलाव आता है, लेकिन उसकी मानसिकता का बड़ा हिस्सा ग्रामीण परिवेश पर ही आधारित होता है। नरेश के साथ भी कुछ ऐसा है। उसका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिस प्रकार महिलाएं घरों में रहकर पति की सेवा कर और बच्चें को पैदा कर उन्हें बड़ा करने में अपनी सारी जिंदगी गुजार देती हैं, उनकी व्यक्तिगत अस्मिता कुछ भी नहीं होती है, उसी तरह शाल्मली को भी अपनी पूरी जिन्दगी इन्हीं कार्यों में होम कर देनी चाहिए। जबकि शाल्मली के साथ ऐसा नहीं है। वह दिल्ली जैसे शहर में पली-बढी़ थी। शहरीकरण शाल्मली की आकांक्षाओं को नई उड़ान देता है। शाल्मली अपनी मेहनत से अफसर ग्रेड की नौकरी प्राप्त करती है। पास में रहने रहने वाले अपने माता-पिता के प्रति भी जिम्मेदारी निभाते हुए उनके सुख-दुख में शामिल होती है। जबकि नरेश के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहां तक कि वह घर की जिम्मेदारियों तक को ठीक तरीके से नहीं निभाता है, वहीं शाल्मली के माता-पिता के प्रति भी लापरवाह है। वह बार-बार शाल्मली को ताना देता है कि तुम पुरुष बनने की  कोशिश कर रही हो। जब शाल्मली गांव से नरेश की मां को लाकर रखती है तो यह बात भी नरेश को अखरने लगती है। वह कहता है कि मर्द बन रही हो तो उठाओ सारा बोझ( पेज-106)  शाल्मली के विदेश जाने के दौरान तो उसके अन्य स्त्री से संबंध बन जाते हैं। इसका पता शाल्मली को अपनी नौकरानी से पता चलता है। पूछने पर नरेश कहता है कि ‘‘नियम और धर्म केवल कागज पर लिखने के लिए होते हैं या फिर तुम औरतों के लिए बनाए जाते हैं। इनसे हटकर एक और कानून होता है, जो हम मर्दों के बीच प्रचलित होता है। उसका अपना संविधान, अपना नियम, अपना धर्म होता है। मैं जो कुछ कर रहा हूं, उसी प्रचलित संविधान के नियमों के अनुसार कर रहा हूं।’’ (पेज-144) यही बात है कि तलाक जैसे लगातार बढ़ रहे हैं। पुरुष द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाना इसका मूल कारण है। पुरुष चाहता है कि मेरी पत्नी को सती सावित्री बनी रहे और मैं भौंरा बना रहूं, जिस पर किसी प्रकार कोई अंकुश न हो। यह तभी तक संभव था जब तक स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम थी। आर्थिक स्वतंत्रता मिलते ही पुरुष के हाथ से यह डोर छूटने लगी।   
    पर शाल्मली अपनी मित्र सरोज से कहती है कि ‘‘ मेरी दृष्टि में स्वावलंबी होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वह परिवार को तोड़ डाले और उन सारी भावनाओं से मुकर जाए जो उसकी पहचान ही नहीं, उसकी जरूरत भी है। यह सही है कि रोटी पहली और सेक्स दूसरी जरूरत है इंसान की, जिससे मुकरना मुश्किल है।... जहां उसकी स्थिति बदली है, वहीं उसकी रुचि और अरुचि भी बढ़ी है। अब वह अपनी पसंद की नौरी और जीवन-साथी चाहती है। अपने पेश और प्रेमी का स्वयं चयन करना चाहती है, क्योंकि आज उसकी मानसिक आवश्यकता भी रोटी और सेक्स की तरह महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि पहली दो चीजें अब उन्हें प्राप्त हो गई हैं और वह किसी हद तक स्वतंत्र हो गई है।’’ (पेज-166) वह आगे कहती है कि ‘‘औरत के पास दो ही अभिव्यक्तियां हैं या सर झुका देना या समस्या को अधूरा छोड़, सर कटा लेना। मेरा विश्वास न घर छोड़ने पर है, न तोड़ने पर, न आत्महत्या पर है, न अपने को किसी एक के लिए स्वाहा करने में है। मैं तो घर के साथ औरत के अधिकार की कल्पना भी करती हूं और विश्वास भी। अधिकार पाना यानी ‘घर निकाला’ नहीं और घर बना देने का अर्थ ‘सम्मान’ को कुचल फेंकना नहीं है। यह जो हमारे मन-मस्तिष्क में अति का भूत सवा हो गया है, वहीं जीवन के विष समान है।’’ (पेज-166)
समझौतापरस्त उपन्यास 
   इस उपन्यास में तमाम कमियां भी हैं। तमाम उत्पीड़न के बाद भी शाल्मली नरेश के साथ रहती है। दिल्ली जैसे शहर में रहने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद वह अलग होने का फैसला नहीं करती है, जबकि दिल्ली जैसे महानगर में काफी औरतें अलग रहतीं हैं। वह भाषण तो लंबे-लंबे देती है, लेकिन नरेश को बर्दाश्त को अभिशप्त है। यही कारण है कि यह उपन्यास अंतत: समझौतापरस्त ही सिद्ध होता है, इसलिए यह दूर तक छाप छोड़ने में अक्षम साबित होता है। यही कारण है कि इस उपन्यास की कथा जगत मेंं व्यापक चर्चा नहीं हुई।   
ठीकरे की मंगनी और शाल्मली उपन्यासों की स्थितियों पर चर्चा करें तो दोनों उपन्यास दो स्थितियों के शिकार हैं। ठीकरे की मंगनी में नायिका को उसके शौहर द्वारा ठुकरा देने पर वह गांव के लोगों में अकेले जीने को अभिशप्त होती है, जबकि वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ अपनी जिंदगी शुरू कर सकती थी। वहीं दूसरी ओर शाल्मली उपन्यास में घरेलू उत्पीड़न को सहती रहती है। उसके खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाती है।
यह स्पष्ट है कि इस दुनिया में स्त्री और पुरुष को साथ-साथ रहना है और इसी दुनिया में तमाम उत्पीड़न के खिलाफ आवाज भी उठानी है। पुरुष से एकदम अलग हटकर एकाकी तरीके से जीने का तरीका भी ठीक नहीं है। इस दुनिया में ही उसे अपने लिए जगह बनानी है। यह सही बात है कि सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। लोगों के मानसिक ढांचे को तुरंत बदल पाना कठिन है। इसमें पितृसत्तात्मक सत्ता का भी मुख्य हाथ है, जो ढांचे को परिवर्तित होने से रोके हुए है।                                         

Sunday, October 18, 2015

दीवाना मंदिर की रामलीला भाईचारे की नजीर, मुस्लिम भी हिस्सा लेते हैं

 मंदिरों के शहर जम्मू की 125 वर्ष से भी पुरानी दीवाना मंदिर की प्रसिद्ध रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की बेमिसाल नजीर है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।
       श्री सनातन धर्म नाटक समाज की ओर से आयोजित रामलीला के निर्देशक सतपाल शर्मा ने बताया कि यह रामलीला एक खूबसूरत गुलदस्ते के समान है, जिसमें मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं ।  मुस्लिम फैजल पाल पिछले 21 वर्ष से इस रामलीला से जुडे़ थे। अब उनका 26वर्षीय बेटा वकार पाल इसमें काम करता है। वकार ने बताया कि वह रामलीला में विभिन्न भूमिकाएं निभाने के साथ शिवरात्रि में हनुमान बनते हैं। वह रामलीला के साथ ही पले -बढे़ हैं। उनका कहना था कि यदि सभी धर्माें के लोग एकदूसरे के पर्व -त्योहार मिलजुलकर मनाएं तो कोई सियासत हमें बांट नहीं सकती ।
        कच्छी छावनी स्थित इस मंदिर के प्रांगण में होने वाली रामलीला में पहले मोहल्ले की मुस्लिम लड़कियां अजमत खान और शमीम क्रमश :सीता और कैकेयी की भूमिका निभाती थीं। इतना ही नहीं, वे शाकाहारी भोजन और जमीन पर सोने जैसे नवरात्र के नियमों का भी पालन करतीं थीं । बाद में ब्याह कर पाकिस्तान जाने चले जाने पर नवरात्र में मायके आने पर वे रामलीला में भाग लेती थीं । सिख समुदाय के सरदार हरभजर्न ंसह संन्यासी का अभिनय करते हैं
बालीवुड के मशहूर कलाकार ओमप्रकाश मुंबई जाने से पहले इसमें सीता का अभिनय करते थे। उनके बाद से जो भी इसमें सीता बना उसे मुंबई में छोटे या बडे पर्दे पर अपने अभिनय का कौशल दिखाने का मौका मिला। जम्मू के सपूत बालीवुड के गायक एवं अभिनेता केएस सहगल ने इस रामलीला के लिए पाश्र्व संगीत दिया था। पृथ्वीराज कपूर ने 1962 में जम्मू आने पर यहां के मंच की मिट्टी को माथे पर लगाया था ।
   वर्ष 1982में तत्कालीन महाराजा की ओर से शुरू की गयी यह रामलीला 199० के दशक में आतंकवाद के दौर में भी जारी रही। इसकी लोकप्रियता के कारण कफ्र्यू के बावजूद इसके मंचन की अनुमति मिलती थी। रामलीला में 1961 में ही महिला कलाकारों ने भाग लेना शुरू कर दिया था। हालांकि शुरू में इसका विरोध हुआ, तभी से महिला चरित्रों का अभिनय महिला कलाकार ही करती हैं। यह एकमात्र ऐसी रामलीला है, जिसके संवाद पारसी शैली में हैं। इसर्में ंहदी के साथ उर्दू और फारसी के लफ्जों का बहुतायत से इस्तेमाल होता है ।
       श्री शर्मा का कहना था कि मंच सज्जा में जिन बांसों का इस्तेमाल किया जाता है, पुराने होने के कारण कई बार उनमें सांप लिपटे रहते हैं। इन सांपों को मारा नहीं जाता और आजतक सर्पदंश की कोई घटना भी नहीं हुई ।
     रामलीला के अधिकांश कलाकार 45 से 5० वर्षाें से इससे जुडे़ हैं। सभी लोग मुफ्त में अभिनय करते हैं। रामलीला उनकी आत्मा में रची-बसी है। आध्यात्मिक एवं धार्मिक भावना से ओत प्रोत ये लोग पूरे समर्पण एवं निष्ठा के साथ काम करते हैं । शर्मा ने नयी पीढ़ी की रामलीला में रुचि की कमी पर चिंता  व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2००2 में उन्होने बाल रामलीला करायी  थी, लेकिन बाद में ये बच्चे इंजीनिर्यंरग और एमबीए जैसी पढाई के लिए बाहर चले गए। अब वे नयी पीढ़ी को प्रशिक्षित करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

‘राम’बना रहे मुहर्रम के ताजिए

मध्यप्रदेश के गुना जिले में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हुए हर साल की तरह इन दिनों भी ‘राम’ मुहर्रम के ताजिए बनाने में मशगूल हैं।
   चौंकिए नहीं, यहां बात हो रही है, पिछले 35 साल से इस काम में तल्लीनता से जुटे पेशे से होमगार्ड सैनिक राम बाबू हल्दिया की, जिनका परिवार लगभग 6० साल से मुहर्रम के ताजियों को अपने हाथों से गढ़कर उन्हें जुलूस में शामिल कराता है। बकौल रामबाबू, उनके परिवार में यह परंपरा उनके पिता किशनलाल ने शुरू की थी, जिसे अब वे निभा रहे हैं। परिवार की इस परम्परा को श्रद्धा के साथ निर्वहन के लिए वह अपने बेटे हेमंत को भी ताजिया बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता कदीमी ताजिया निर्माण में सहयोग करते थे। इसी दौरान उन्होंने घर में पुत्र की मन्नत मांगी और सात बेटियों के बाद घर में बेटा होने के बाद घर में ताजिया बनाने की परम्परा शुरू की। अब रामबाबू नौकरी के बाद लगभग 1० घण्टे का समय ताजिया बनाने में देते हैं। परिवार के सदस्य भी इसमें उनकी मदद करते हैं। राम बाबू ने बताया कि गुना में करीब 15 हिन्दू परिवार ताजिये बनाते हैं। इसमें बांस, कागज और कांच का महीन उपयोग होता है। एक बड़ा ताजिया बनाने में लगभग एक महीना लगता है।


किसी से नहीं डरना और काम करने का अद्भुत जज्बा था पिता में

                        पिता से जुड़े संस्मरण

मेरे पिता के दोस्त डॉ. विष्णु शंकर सिंह के अनुसार पीएन सिंह की बीएचयू में पांच साल की पढ़ाई के दौरान सिर पर कभी बाल नहीं रहते थे। क्योंकि उनके कमरे में हमेशा क्षेत्र के मरीज आते रहते थे। पहले उनका बीएचयू में इलाज कराते थे। नहीं तो उनकी मौत होने पर उनका काशी में अंतिम संस्कार कर देते थे। उनके कमरे में हमेशा कोई न कोई मरीज रहता था। पिता जी के दोस्त सरकारी नौकरी में गए जबकि उन्होंने प्राइवेट में काम करने का संकल्प किया। उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि अपने क्षेत्र के लोगों के लिए काम करना है। वे अपने दोस्तों से कहा करते थे कि देखना मैं तुम लोगों से ज्यादा लोग और रुपये दोनों कमाऊंगा। ऐसा उन्होंने जीते जी कर दिखाया।

  एक बार पिता को लेकर 2005-6 में दिल्ली के विमहेंस अस्पताल में लेकर गया। उनको यह नहीं बताया कि डॉक्टर की फीस पांच सौ रुपये है। डॉक्टर की प्रतीक्षा के दौरान जब उनको डाक्टर की फीस पांच सौ रुपये बताई तो उन्होंने डॉक्टर से इलाज करने से इनकार कर दिया। उन्होंने ये डॉक्टर नहीं बल्कि लुटेरे हैं। यहां मैं इलाज नहीं करा सकता। आखिरकार हम लोग डॉक्टर को बिना दिखाए वापस आ गए।

पिता जी में किसी से नहीं डरना और काम करने का जज्बा अद्भुत था। ऐसी ही एक घटना मुझे अच्छी तरह से याद है। हम लोग जिस मोहल्ले में रहते थे, वहां एक युवती जलकर मर गई थी। वह लड़की वीभत्स तरीके से जली थी। इस कारण काफी दिनों तक लोगों में दहशत व्याप्त थी। इस कारण लोग शाम के बाद घरों से बाहर तक निकलते थे। मुझे याद है कि इस घटना के कारण हमारा पूरा परिवार एक कमरे में सोता था। मेरे भैया जिन्होंने उस लड़की के पोस्टमार्टम के लिए उसे उठाने में मदद की थी, वे कई महीनों तक घर पर नहीं आए। वह दिन में घर पर आते थे, शाम ढलने से पहले घर से निकल जाते थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि पिता जी इस घटना के बाद भी बिल्कुल नहीं डरे, बल्कि शाम होते ही लोगों के घरों में जाते थे और उनको दिलासा देते थे। ऐसा कई महीनों तक चला।

2004 में उनके बीमार होने से पहले उनको 20 घंटे तक काम करते हुए देखा। इस दौरान उनसे बात करने के लिए भी तरस जाते थे। उनको डॉक्टरी पेशे के साथ राजनीति का शौक था। जब चुनाव करीब आते थे तो वे दो तीन दिन तक घर नहीं आते थे बल्कि चुनाव प्रचार में व्यस्त रहते थे। उन्हें चुनाव खुद नहीं बल्कि दूसरों को लड़ाने का शौक था। उनको एक बार लोकसभा चुनाव में लड़ने का भी मौका मिला, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पिता जी के विपरीत माता जी को चुनाव लड़ने का शौक था। हम लोगों से बातचीत में इस बात की अक्सर चर्चा करती रहती थीं।            
   

Wednesday, October 14, 2015

सोशल मीडिया : सरकार तक आवाज पहुंचाने का सशक्‍त माध्‍यम

सोशल मीडिया ने सभी प्रकार के परंपरागत मीडिया के एकाधिकार को पीछे छोडते हुए अपनी एक अलग पहचान बनायी है। प्राचीन काल से ही सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कई अनेक रोचक एवं अनोखे तरीके अपनाए जाते रहे हैं। तेजी से बदलती तकनीक ने पत्रकारिता का पारंपरिक चेहरा बदल दिया  है। ‘सोशल मीडिया’ लोगों की पहली पसंद बन गया है ।
तीन करोड़ तीस लाख से अधिक सोशल मीडिया के यूजर 
एक रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या तीन करोड़ तीस लाख से अधिक हैं। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार पिछले कुछ वर्षो मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारत मे ‘गेम-चेंजर’ की तरह काम किया है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन की क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी  अलग छाप छोड़ी है।
       लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के एक अधिवेशन में राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत का उल्लेख किया। बाद में तत्कालीन सरकार ने इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया था। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत मे सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है।
लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया का प्रभाव
‘अबकी बार, मोदी सरकार’ ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ जैसे नारे भी सोशल मीडिया के ही हिस्से थे। लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन करने पर कई चौकाने वाले तथ्य एवं आंकड़े सामने आए है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर दो करोड़ नब्बे लाख लोगों ने दो करोड़ 27 लाख  बार चुनाव से संबंधित पोस्ट को लाइक, कमेंट, शेयर आदि की। इसके अतिरिक्त एक करोड़ तीस लाख लोगों ने केवल नरेंद्र मोदी के बारे में बातचीत की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 81 करोड़ 14 लाख योग्य मतदाताओं वाले देश में सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान व्यापक था।
सोशल मीडिया ने केजरीवाल को बनाया ब्रांड 
लोकपाल आंदोलन के नायक अन्ना हजारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अराविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। देश-दुनिया में जुनून पैदा करने वाले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था कि छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश में तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव
में आ गयी थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था।
सरकार तक आवाज़ पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय
लोगों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का एक प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल कांड़ा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है।
निर्भया कांड में सोशल मीडिया से असर   
 दिल्ली का दिल दहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे उक्त घटना के बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। देश-विदेश से ऐसी घटनाओं के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय भी इसी माध्यम को जाता है जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है, उससे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ जाहिर तौर पर अन्य मीडिया माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। इसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर मीडिया हाउसों के रणनीतिकार अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव को मजबूर हुए हैं।
सभी को दे रहा विचार रखने का मौका 
वेबसाइट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स जैसे माइ स्पेस, आरकुट,फेसबुक और माइक्रो ब्‍लांगिंग साइट ट्विटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं। यही एक ऐसा मीडिया है जिसने अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग के अंतर को समाप्त किया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा अब बढ़ गया है। निश्चित तौर पर वैकल्पिक मीडिया में अपार संभावनाएं है। दूसरी ओर, यह सच उजागर करने का क्षमता भी रखता है।