यह उपन्यास पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष वर्चस्व को कायम रखने और उससे स्त्री के जुझने की कवायद की कहानी है। इसके माध्यम से कथाकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि पितृसत्तात्मक समाज में आए बदलावों के बावजूद पुरुष स्त्री को बराबरी के अधिकार किसी कीमत पर देने को तैयार नहीं है। इसके लिए वह किसी भी हद तक गुजरने को तैयार है। इसके लिए वह विभिन्न किस्म के षड्यंत्र रचता है। पुरुष भले ही कई स्त्रियों के साथ हमबिस्तर हो, लेकिन स्त्री दूसरे के साथ कहीं जाने तक में उसे आपत्ति है। यानी पुरुषों का बड़ा वर्ग भले ही आधुनिक होने का दावा करता हो, लेकिन वह अपनी सामंती खोल से नहीं बाहर निकला है। पुरुष आधुनिक वहीं तक होता है, जहां तक उसे सुविधा है, नहीं तो उसे सामंती खोल में वापस जाने में गुरेज नहीं है। उपन्यास के माध्यम से नासिरा शर्मा ने विवाह नामक पारिवारिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। इस संस्था के माध्यम से किस प्रकार घरेलू हिंसा को प्रोत्साहन दिया जाता है, उसको दर्शाया गया है।
यही कारण सभी महिला कथाकारों ने इस संस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं और उसे बदलने की मांग की है। जैसे उपन्यास में शाल्मली का पति उससे कहता है कि ‘‘ तुम जानती चाहोगी पुरुष की दृष्टि में औरत क्या है ? भोगने की वस्तु ...वही उसकी पहचान है। इसलिए तुम औरत की तरह रहो, इसी में तुम्हारा उद्धार है और इस घर का कल्याण और गृहस्थी का सुख।’’ (पेज-128 ) मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार आर्थिक स्थितियों में बदलाव के साथ अन्य स्थिातियों में बदलाव होता है, जबकि महिला लेखिकाएं इसे नहीं मानती हैं। उनका कहना है कि आर्थिक स्थितियां बदलने पर भी स्त्री की स्थिति में मामूली बदलाव ही आता है। इस उपन्यास के माध्यम से भी कथाकार ने यही दर्शाने का प्रयास किया है।
शाल्मली को अफसर ग्रेड की नौकरी मिलती है। पहले तो उसका पति नरेश उसे नौकरी नहीं करने देना चाहता है, बहुत मशकक्त के बाद जब तैयार होता है तो वह बार-बार पति होने का हक दर्शाता रहता है। वह कहता है कि ‘‘अब तुम मेरी नकल मत करो। मैं मर्द हूं, कहीं भी आ जा सकता हूं। तुम औरत हो और अपनी मर्यादा पहचानो।’’ मूलत: उपन्यास के माध्यम से समाज की स्थिति को दर्शाने का प्रयास किया गया है। अगर पुरुष महिला से ऊंची पोस्ट नौकरी करता है तो कोई परेशानी नहीं होती है। लेकिन अगर महिला ऊंची पोस्ट पर नौकरी करती है तो अहम का टकराव शुरू हो जाता है और पुरुष इसे टकराव का विषय बना लेता है।
इसके साथ ही जब पुरुष गांव से शहर आता है तो उसके रहने सहन में तो बदलाव आता है, लेकिन उसकी मानसिकता का बड़ा हिस्सा ग्रामीण परिवेश पर ही आधारित होता है। नरेश के साथ भी कुछ ऐसा है। उसका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिस प्रकार महिलाएं घरों में रहकर पति की सेवा कर और बच्चें को पैदा कर उन्हें बड़ा करने में अपनी सारी जिंदगी गुजार देती हैं, उनकी व्यक्तिगत अस्मिता कुछ भी नहीं होती है, उसी तरह शाल्मली को भी अपनी पूरी जिन्दगी इन्हीं कार्यों में होम कर देनी चाहिए। जबकि शाल्मली के साथ ऐसा नहीं है। वह दिल्ली जैसे शहर में पली-बढी़ थी। शहरीकरण शाल्मली की आकांक्षाओं को नई उड़ान देता है। शाल्मली अपनी मेहनत से अफसर ग्रेड की नौकरी प्राप्त करती है। पास में रहने रहने वाले अपने माता-पिता के प्रति भी जिम्मेदारी निभाते हुए उनके सुख-दुख में शामिल होती है। जबकि नरेश के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहां तक कि वह घर की जिम्मेदारियों तक को ठीक तरीके से नहीं निभाता है, वहीं शाल्मली के माता-पिता के प्रति भी लापरवाह है। वह बार-बार शाल्मली को ताना देता है कि तुम पुरुष बनने की कोशिश कर रही हो। जब शाल्मली गांव से नरेश की मां को लाकर रखती है तो यह बात भी नरेश को अखरने लगती है। वह कहता है कि मर्द बन रही हो तो उठाओ सारा बोझ( पेज-106) शाल्मली के विदेश जाने के दौरान तो उसके अन्य स्त्री से संबंध बन जाते हैं। इसका पता शाल्मली को अपनी नौकरानी से पता चलता है। पूछने पर नरेश कहता है कि ‘‘नियम और धर्म केवल कागज पर लिखने के लिए होते हैं या फिर तुम औरतों के लिए बनाए जाते हैं। इनसे हटकर एक और कानून होता है, जो हम मर्दों के बीच प्रचलित होता है। उसका अपना संविधान, अपना नियम, अपना धर्म होता है। मैं जो कुछ कर रहा हूं, उसी प्रचलित संविधान के नियमों के अनुसार कर रहा हूं।’’ (पेज-144) यही बात है कि तलाक जैसे लगातार बढ़ रहे हैं। पुरुष द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाना इसका मूल कारण है। पुरुष चाहता है कि मेरी पत्नी को सती सावित्री बनी रहे और मैं भौंरा बना रहूं, जिस पर किसी प्रकार कोई अंकुश न हो। यह तभी तक संभव था जब तक स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम थी। आर्थिक स्वतंत्रता मिलते ही पुरुष के हाथ से यह डोर छूटने लगी।
पर शाल्मली अपनी मित्र सरोज से कहती है कि ‘‘ मेरी दृष्टि में स्वावलंबी होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वह परिवार को तोड़ डाले और उन सारी भावनाओं से मुकर जाए जो उसकी पहचान ही नहीं, उसकी जरूरत भी है। यह सही है कि रोटी पहली और सेक्स दूसरी जरूरत है इंसान की, जिससे मुकरना मुश्किल है।... जहां उसकी स्थिति बदली है, वहीं उसकी रुचि और अरुचि भी बढ़ी है। अब वह अपनी पसंद की नौरी और जीवन-साथी चाहती है। अपने पेश और प्रेमी का स्वयं चयन करना चाहती है, क्योंकि आज उसकी मानसिक आवश्यकता भी रोटी और सेक्स की तरह महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि पहली दो चीजें अब उन्हें प्राप्त हो गई हैं और वह किसी हद तक स्वतंत्र हो गई है।’’ (पेज-166) वह आगे कहती है कि ‘‘औरत के पास दो ही अभिव्यक्तियां हैं या सर झुका देना या समस्या को अधूरा छोड़, सर कटा लेना। मेरा विश्वास न घर छोड़ने पर है, न तोड़ने पर, न आत्महत्या पर है, न अपने को किसी एक के लिए स्वाहा करने में है। मैं तो घर के साथ औरत के अधिकार की कल्पना भी करती हूं और विश्वास भी। अधिकार पाना यानी ‘घर निकाला’ नहीं और घर बना देने का अर्थ ‘सम्मान’ को कुचल फेंकना नहीं है। यह जो हमारे मन-मस्तिष्क में अति का भूत सवा हो गया है, वहीं जीवन के विष समान है।’’ (पेज-166)
समझौतापरस्त उपन्यास
समझौतापरस्त उपन्यास
इस उपन्यास में तमाम कमियां भी हैं। तमाम उत्पीड़न के बाद भी शाल्मली नरेश के साथ रहती है। दिल्ली जैसे शहर में रहने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद वह अलग होने का फैसला नहीं करती है, जबकि दिल्ली जैसे महानगर में काफी औरतें अलग रहतीं हैं। वह भाषण तो लंबे-लंबे देती है, लेकिन नरेश को बर्दाश्त को अभिशप्त है। यही कारण है कि यह उपन्यास अंतत: समझौतापरस्त ही सिद्ध होता है, इसलिए यह दूर तक छाप छोड़ने में अक्षम साबित होता है। यही कारण है कि इस उपन्यास की कथा जगत मेंं व्यापक चर्चा नहीं हुई।
ठीकरे की मंगनी और शाल्मली उपन्यासों की स्थितियों पर चर्चा करें तो दोनों उपन्यास दो स्थितियों के शिकार हैं। ठीकरे की मंगनी में नायिका को उसके शौहर द्वारा ठुकरा देने पर वह गांव के लोगों में अकेले जीने को अभिशप्त होती है, जबकि वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ अपनी जिंदगी शुरू कर सकती थी। वहीं दूसरी ओर शाल्मली उपन्यास में घरेलू उत्पीड़न को सहती रहती है। उसके खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाती है।
यह स्पष्ट है कि इस दुनिया में स्त्री और पुरुष को साथ-साथ रहना है और इसी दुनिया में तमाम उत्पीड़न के खिलाफ आवाज भी उठानी है। पुरुष से एकदम अलग हटकर एकाकी तरीके से जीने का तरीका भी ठीक नहीं है। इस दुनिया में ही उसे अपने लिए जगह बनानी है। यह सही बात है कि सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। लोगों के मानसिक ढांचे को तुरंत बदल पाना कठिन है। इसमें पितृसत्तात्मक सत्ता का भी मुख्य हाथ है, जो ढांचे को परिवर्तित होने से रोके हुए है।
यह स्पष्ट है कि इस दुनिया में स्त्री और पुरुष को साथ-साथ रहना है और इसी दुनिया में तमाम उत्पीड़न के खिलाफ आवाज भी उठानी है। पुरुष से एकदम अलग हटकर एकाकी तरीके से जीने का तरीका भी ठीक नहीं है। इस दुनिया में ही उसे अपने लिए जगह बनानी है। यह सही बात है कि सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। लोगों के मानसिक ढांचे को तुरंत बदल पाना कठिन है। इसमें पितृसत्तात्मक सत्ता का भी मुख्य हाथ है, जो ढांचे को परिवर्तित होने से रोके हुए है।

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