फिल्म ‘स्लॅमडाग मिलेयनियर’ में जय हो गीत पर आस्कर आवर्ड जीतने पर एआर रहमान के अलावा गुलजार का लोहा दुनिया ने मान लिया है। ऐसे में यह बात सोचने को मजबूर कर देती है कि गुलजार के गीतों में वह कैसा जादू है, जो लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है। वस्तुत: गुलजार मध्यवर्ग के ऐसे शायर हैं, जिन्होंने अपनी सृजनात्मक कल्पनाशीलता से शायरी और गीतों को नया आयाम दिया है। उन्होंने व्यापक स्रोताओं के आस्वाद को तो बदला ही, बल्कि उसे नई ऊंचाइयां भी दीं। फिल्मों की दुनिया में गुलजार ऐसे शायर है, जिसकी खामोशी भी बोलती है। उनके यहां बहते हुए आसुंओं से ज्यादा तकलीफ पलकों पर ठहरे मोती पैदा करते हैं। उनकी शायरी कम शब्दों में ज्यादा कहना चाहती है। उसकी ताकत और जड़ें बंगाली, पंजाबी और उर्दू की परंपरा से मिलती है, पर उसकी लिपि हिंदी है।
गुलजार की शायरी और गीतों में मानवीय रिश्ते, उसमें भी स्त्री-पुरुष संबंध और उनके बीच समय के साथ निर्मित होने वाली दरारें काफी अहमियत रखती है, बल्कि उसे फिर से जोड़ने का प्रयास भी करते हैं। जैसे ‘ मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता, लेकिन उसकी सारी गिरहें साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे।’ इस बारे में अमृता प्रीतम का कहना है कि गुलजार ने उसे रिश्ते के शक्ति कण भी झेले हैं, जो जाने कितनी सदियों की छाती में बसा हुआ है ... कह सकती हूं कि आज के हालत पर गुलजार ने जो लिखा, हालात के दर्द को अपने सीने में पनाह देते हुए और अपने खून के कतरे उसके बदन से उतारते हुए।’’ गुलजार को ये रिश्ते , दर्द और पहचान अपनी पैदाइश, परवरिश, विभाजन की त्रासदी और आगे चलकर उनके और राखी के संबंधों में जुड़ाव और फिर अलगाव से मिला है। यही कारण है कि उन्होंने धर्म, जाति और लैंगिक भेदभाव से परे आधुनिक मानवीय संबंधों को जगह दी है, बल्कि अपने तरीके से उसे निर्मित कर नया मुकाम दिया है। गुलजार की काव्यवस्तु संबंधों के जुड़ने, टूटने और उसे नया मोड़ देने से निर्मित होकर मानवीय सरहदों को ध्वस्त करती है।
गुलजार के यहां विभिन्न शारीरिक भंगिमाएं मिलती हैं, उस संवेदना को ढ़ूढ़ना और तराशकर निखारना ही उन्हें समकालीन शायरों में विशिष्ट और महत्वपूर्ण बनाता है। उसमें भी आंखों की भंगिमा विशेष रूप से। उनकी शायरी में आंखें अल्हण और चंचल न होकर उन्हीं की तरह खामोश और शाालीन है। उन्हीं के गीतों से कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं-‘आपकी आंखों में कुछ महके हुए से राज हैं’,‘आंखों में हमने आपके सपने सजाये हैं’, ‘जिया जले जां नैने तले धुआं चले’। और न जाने कितने और गीत। आंखों को लेकर इतने विविध आयामों में लिखने वाला शायद ही कोई शायर हो। इन आंखों में मध्यवर्गीय सपने, उम्मीद, प्रेम, टूटन, निराशा, लज्जाशीलता, मूकसंवाद जैसी विविध भावसंपदा को समेटे हुए है। गुलजार की शायरी में आंखें एक ख्वाब से जगाती है और दूसरे ख्वाब में आंखें खोलने को मजबूर करती है, बल्कि यह एक ऐसा ख्वाब है कि जिससे जगाने के बाद हर चीज ख्वाब ही मालूम होती है।
गुलजार की शायरी में प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की भंगिमाएं एक दूसरे में प्रवेश कर शाब्दिक करतब में प्रकट होते रहते हैं और शब्दों को नया अर्थ देते हैं। उनके यहां कुछ शब्दों बार-बार आते हैं जैसे-रात, शाम, चांद, खामोशी, जिंदगी, मुस्कुराहट, ख्याल, ख्वाब, कर्ज, दर्द, सपना, साहिल, समुंदर, किनारा, मांझी, दबी हंसी, बेकरार आदि। ये शब्द उनकी शायरी में अन्योक्ति के रूप में आते हैं। कुछ शब्द प्रकृति के हैं तो कुछ मनुष्य के आंतरिक भाव हैं। दोनों एक-दूसरे में समाहित होकर परस्पर अन्य अर्थ देते हैं। गुलजार के यहां शायरी और गीतों में समय के कुछ अजीब संबंध है। समय के साथ शायरी अनेक कलाएं दिखाती है। कभी वर्षों को समेटकर एक क्षण में बांध देती है, कभी क्षण को खोल वर्षों में फैला देती है। कभी समय के दायरे को तोड़ती है तो कभी टुकड़ों को जोड़कर एक दायरा बनाती है। जैसे फिल्म गोलमाल का यह गीत ‘एक बार यूं कभी वक्त से लम्हा गिरा कहीं, वहां दासता मिली, लम्हा कहीं नहीं’। गुलजार के गीत और शायरी बेपर उड़ती है और इसी कारण मध्यवर्गीय मन का सुकून देती है। वहीं गुलजार ने लोकगीतों को भी अपने गीतों में पिरोया है। फिल्म ओमकारा के गीत बीड़ी जलाई ले और नमक इश्क का ठुमरी से लिए गए हैं।
गुलजार पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे शब्दों के साथ खिलवाड़ में माहिर हैं। अच्छी धुनों का सहारा देकर ही उनकी बहुत सी अर्थहीन रचनाएं सम्प्रेषण की दृष्टि से दुरुह शायरी भी फिल्मों में जगह पा लेती है जैसे यह गीत-‘जब तारे जमीं पर चलते हैं, आकाश जमीं हो जाता है।’ शायरी और कविता से केवल केवल यथार्थवाद की मांग करना गलत है। पाब्लो नेरूदा जैसा यथार्थवादी कवि भी कहता है कि ‘कविताएं शुद्ध यथार्थवादी नहीं हो सकती हैं।’ वस्तुत: विरोधाभास और अत्युक्ति उर्दू शायरी की देन है।
समय और परिस्थितियों के अनुरूप गुलजार के गीतों और शायरी में भी बदलाव आया है। 70 के दशक में जहां बेरोजगारी और उससे उत्पन्न अकेलापन, घुटन, संबंधों का तनाव आदि उनकी काव्यवस्तु होती थी, लेकिन उदारीकरण के दौर का प्रभाव और दबाव के कारण यह उनके यहां धीरे-धीरे नदारद होती गयी। यह मध्यवर्ग पर व्यक्तिवाद के हावी होते जाने का परिणाम है। गुलजार के गीतों और शायरी ने आंतरिक भावों को व्यक्त करने के लिए नया शब्द संसार, नई ध्वनियां और नए संकेत दिए। इससे फिल्मी गीतों और शायरी को नयी मुखरता मिली। सिनेमा और साहित्य ने एक दूसरे को चुनौती देते हुए बदला भी। उनके गीतों की संवेदना, बिंब, ध्वनि, रंग, लय सब दर्शकों के मानस को छूते हैं। आज के उपभोक्तावादी दौर में जब मध्यवर्ग दुनियावी मृग मरिाचका के पीछे भटककर अपने अंदर और रिश्तों में खालीपन सा महसूस कर रहा है, ऐसे में गुलजार की शायरी और गीत मानवीय संबंधों और रिश्तों में मरहम लगाते हुए सुकून दिलाती है।

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