बिना साधनों के अकेले हबीब तनवीर ने एक निर्देशक और रंगकर्मी के रूप में जो महत्वपूर्ण काम किया, वह बेजोड़ है। छत्तीसगढ़ से ही स्थानीय कलाकारों को लेकर उन्हीं की भाषा, संगीत और परिवेश को रचकर उन्होंने नई रंग सृष्टि की। ‘चरणदास चोर’ हो या ‘गांव वा नांव ससुराल’ ‘मोर नांव दामाद’ या फिर ब्रेख्त के रुपांतर के माध्यम से उन्होंने हिंदी रंगमंच को आंचलिकता से जोड़ कर नई अर्थवत्ता प्रदान की। उन्होंने नाटकों का इस्तेमाल सामाजिक बदलाव के लिए एक हथियार के रूप में किया। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य विधा नाचा को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
नाचा छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य विधा है, जिसकी जड़ें यहां के कृषि प्रधान ग्रामीण समाज से जुड़ी हुईं हैं। उसमें कई परंपरागत विधाओं ने सम्मलित होकर समृद्ध किया है। नाचा मूलत: एक हास्य प्रधान नाट्य विधा है, जिसमें ग्रामीण कलाकार अपनी तत्कालीन समस्याओं, सामाजिक बुराइयों एवं सामाजिक विसंगतियों पर अपनी प्रतिभा के माध्यम से कटाक्षपूर्ण टिप्पणियां कर उनके खोखलेपन को उजागर करते हैं। नाचा कलाकारों में जबरदस्त हास्यवृत्ति पाई जाती है और वे जीवन की कटुतम विसंगतियों एवं अनुभवों पर बिना किसी कटुता के सहज ही विनोदपूर्ण टिप्पणी के प्रस्तुत करते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी कें आरंभ में मराठों और महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों की एक बड़ी संख्या छत्तीसगढ़ में आकर बस गई। आक्रमणकारी मराठा सेना के साथ उनके मनोरंजन करने वाले विभिन्न समुदाय भी थे, जिसमें नाचने-गाने वाले कलाकार एवं हास्य, गम्मत, प्रहसन आदि प्रस्तुत करने वाले लोग भी थे। गम्मत शब्द का प्रयोग मराठी भाषा में हास्य-विनोद के अर्थ में किया जाता है। गम्मत में स्त्री पात्र की प्रस्तुति भी पुरुष कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की जाती थी। गम्मत का वह यह पात्र ‘नाच्या’ कहलाता था। छत्तीसगढ़ नाचा लोक नाट्य का विकास भी गम्मत से ही शुरू हुआ और गम्मत के इस नाच्या पात्र के आधार पर ही छत्तीस गढ़ी गम्मत के विकसित नाट्य स्वरूप का नामकरण नाचा के रूप में पड़ा।
कर्मकांडों पर विनोदपूण व्यंग
उन्नीसवीं शताब्दी कें आरंभ में मराठों और महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों की एक बड़ी संख्या छत्तीसगढ़ में आकर बस गई। आक्रमणकारी मराठा सेना के साथ उनके मनोरंजन करने वाले विभिन्न समुदाय भी थे, जिसमें नाचने-गाने वाले कलाकार एवं हास्य, गम्मत, प्रहसन आदि प्रस्तुत करने वाले लोग भी थे। गम्मत शब्द का प्रयोग मराठी भाषा में हास्य-विनोद के अर्थ में किया जाता है। गम्मत में स्त्री पात्र की प्रस्तुति भी पुरुष कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की जाती थी। गम्मत का वह यह पात्र ‘नाच्या’ कहलाता था। छत्तीसगढ़ नाचा लोक नाट्य का विकास भी गम्मत से ही शुरू हुआ और गम्मत के इस नाच्या पात्र के आधार पर ही छत्तीस गढ़ी गम्मत के विकसित नाट्य स्वरूप का नामकरण नाचा के रूप में पड़ा।
कर्मकांडों पर विनोदपूण व्यंग
हबीब तनवीर द्वारा निर्देशित नाटक ‘पोंगा पंडित’ में कर्मकांडों पर विनोदपूण व्यंग किया जाता है। इस नाटक में एक अपढ़ ब्राह्मण पुरोहित और एक किसान के बुद्धु बेटा प्रमुख पात्र हैं। किसान की मृत्यु होने पर उसकी विधवा अपने भोले-भाले बेटे से किसी ब्राह्मण को बुलाकर सत्यनारायण की कथा करवाने को कहती है। लड़का उस अपढ़ ब्राह्मण को बुला लाता है, जिसे कथा का कोई ज्ञान नहीं है, परंतु वह कर्मकांड को ढोंग करता है। वह लड़का भी पूजा-पाठ से पूर्णत: अनभिज्ञ है। दोनों ही पात्र अपने-अपने अज्ञान एवं सरल ग्रामीण भोलेपन की प्रस्तुति कर हास्य का सृजन करते हैं। इस नाटक का 90 के दशक में आरएसएस व अन्य हिन्दू संगठनों ने जमकर विरोध किया। ‘गांव के नाम सुसराल मोर नाम दामाद’ नामक नाचा भी हास्य से ओत प्रोत है। इस नाचा को भी हबीब तनवीर ने अपने नया थियेटर के माध्यम से प्रस्तुत किया। हबीब ने संस्कृत के कुछ नाटकों का प्रस्तुतिकरण नाचा शैली में किया, जिसमें शूद्रक का नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ का रुपांतर मिट्टी का गाड़ी सफल रहा। उन्होंने ब्रेख्त का नाटक ‘शांजापुर की शांतिबाई’ के नाम से और बैकेट का नाटक ‘गोडोला अगौत हौं’ के नाम से भी नाटक नाचा शैली में प्रस्तुत किए।
नाटकों में कलाकारों ने दिखाई प्रतिभा गत पचास वर्षों में जिन प्रमुख कलाकारों ने अपनी प्रतिभा और कौशल से नाचा का संबंर्धन किया, उनमें ठाकुर राम, लालू राम, मदन निषाद, राम लाल, द्वारका, भुलवाराम, अमर सिंह, फिदा बाई, किस्मत बाई, माला बाई, गोविंद राम, न्यायिक दास, झुमक दास आदि सैकड़ों ग्रामीण एवं निरक्षर परंतु श्रेष्ठ कलाकारों के नाम लिए जा सकते हैं। कुछ नाचा कलाकार नाचा शैली से बाहर जाकर बड़े एवं समर्थ कलाकारों के रूप में अपनी प्रतिभा को प्रतिष्ठित कर सके हैं, उनमें द्वारका, अमर सिंह, फिदा सिंह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इन सभी को हबीब तनवीर ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। नाचा लोकनाट्य स्वरूप का इतिहास यद्यपि लगभग एक शताब्दी का ही है किंतु उसने बीसवीं शताब्दी के एक सक्षम एवं पूर्ण विकसित नाट्य स्वरूप के रूप में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में गहरी जड़ें जमा ली है।

No comments:
Post a Comment