Sunday, October 18, 2015

दीवाना मंदिर की रामलीला भाईचारे की नजीर, मुस्लिम भी हिस्सा लेते हैं

 मंदिरों के शहर जम्मू की 125 वर्ष से भी पुरानी दीवाना मंदिर की प्रसिद्ध रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की बेमिसाल नजीर है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।
       श्री सनातन धर्म नाटक समाज की ओर से आयोजित रामलीला के निर्देशक सतपाल शर्मा ने बताया कि यह रामलीला एक खूबसूरत गुलदस्ते के समान है, जिसमें मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं ।  मुस्लिम फैजल पाल पिछले 21 वर्ष से इस रामलीला से जुडे़ थे। अब उनका 26वर्षीय बेटा वकार पाल इसमें काम करता है। वकार ने बताया कि वह रामलीला में विभिन्न भूमिकाएं निभाने के साथ शिवरात्रि में हनुमान बनते हैं। वह रामलीला के साथ ही पले -बढे़ हैं। उनका कहना था कि यदि सभी धर्माें के लोग एकदूसरे के पर्व -त्योहार मिलजुलकर मनाएं तो कोई सियासत हमें बांट नहीं सकती ।
        कच्छी छावनी स्थित इस मंदिर के प्रांगण में होने वाली रामलीला में पहले मोहल्ले की मुस्लिम लड़कियां अजमत खान और शमीम क्रमश :सीता और कैकेयी की भूमिका निभाती थीं। इतना ही नहीं, वे शाकाहारी भोजन और जमीन पर सोने जैसे नवरात्र के नियमों का भी पालन करतीं थीं । बाद में ब्याह कर पाकिस्तान जाने चले जाने पर नवरात्र में मायके आने पर वे रामलीला में भाग लेती थीं । सिख समुदाय के सरदार हरभजर्न ंसह संन्यासी का अभिनय करते हैं
बालीवुड के मशहूर कलाकार ओमप्रकाश मुंबई जाने से पहले इसमें सीता का अभिनय करते थे। उनके बाद से जो भी इसमें सीता बना उसे मुंबई में छोटे या बडे पर्दे पर अपने अभिनय का कौशल दिखाने का मौका मिला। जम्मू के सपूत बालीवुड के गायक एवं अभिनेता केएस सहगल ने इस रामलीला के लिए पाश्र्व संगीत दिया था। पृथ्वीराज कपूर ने 1962 में जम्मू आने पर यहां के मंच की मिट्टी को माथे पर लगाया था ।
   वर्ष 1982में तत्कालीन महाराजा की ओर से शुरू की गयी यह रामलीला 199० के दशक में आतंकवाद के दौर में भी जारी रही। इसकी लोकप्रियता के कारण कफ्र्यू के बावजूद इसके मंचन की अनुमति मिलती थी। रामलीला में 1961 में ही महिला कलाकारों ने भाग लेना शुरू कर दिया था। हालांकि शुरू में इसका विरोध हुआ, तभी से महिला चरित्रों का अभिनय महिला कलाकार ही करती हैं। यह एकमात्र ऐसी रामलीला है, जिसके संवाद पारसी शैली में हैं। इसर्में ंहदी के साथ उर्दू और फारसी के लफ्जों का बहुतायत से इस्तेमाल होता है ।
       श्री शर्मा का कहना था कि मंच सज्जा में जिन बांसों का इस्तेमाल किया जाता है, पुराने होने के कारण कई बार उनमें सांप लिपटे रहते हैं। इन सांपों को मारा नहीं जाता और आजतक सर्पदंश की कोई घटना भी नहीं हुई ।
     रामलीला के अधिकांश कलाकार 45 से 5० वर्षाें से इससे जुडे़ हैं। सभी लोग मुफ्त में अभिनय करते हैं। रामलीला उनकी आत्मा में रची-बसी है। आध्यात्मिक एवं धार्मिक भावना से ओत प्रोत ये लोग पूरे समर्पण एवं निष्ठा के साथ काम करते हैं । शर्मा ने नयी पीढ़ी की रामलीला में रुचि की कमी पर चिंता  व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2००2 में उन्होने बाल रामलीला करायी  थी, लेकिन बाद में ये बच्चे इंजीनिर्यंरग और एमबीए जैसी पढाई के लिए बाहर चले गए। अब वे नयी पीढ़ी को प्रशिक्षित करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

‘राम’बना रहे मुहर्रम के ताजिए

मध्यप्रदेश के गुना जिले में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हुए हर साल की तरह इन दिनों भी ‘राम’ मुहर्रम के ताजिए बनाने में मशगूल हैं।
   चौंकिए नहीं, यहां बात हो रही है, पिछले 35 साल से इस काम में तल्लीनता से जुटे पेशे से होमगार्ड सैनिक राम बाबू हल्दिया की, जिनका परिवार लगभग 6० साल से मुहर्रम के ताजियों को अपने हाथों से गढ़कर उन्हें जुलूस में शामिल कराता है। बकौल रामबाबू, उनके परिवार में यह परंपरा उनके पिता किशनलाल ने शुरू की थी, जिसे अब वे निभा रहे हैं। परिवार की इस परम्परा को श्रद्धा के साथ निर्वहन के लिए वह अपने बेटे हेमंत को भी ताजिया बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता कदीमी ताजिया निर्माण में सहयोग करते थे। इसी दौरान उन्होंने घर में पुत्र की मन्नत मांगी और सात बेटियों के बाद घर में बेटा होने के बाद घर में ताजिया बनाने की परम्परा शुरू की। अब रामबाबू नौकरी के बाद लगभग 1० घण्टे का समय ताजिया बनाने में देते हैं। परिवार के सदस्य भी इसमें उनकी मदद करते हैं। राम बाबू ने बताया कि गुना में करीब 15 हिन्दू परिवार ताजिये बनाते हैं। इसमें बांस, कागज और कांच का महीन उपयोग होता है। एक बड़ा ताजिया बनाने में लगभग एक महीना लगता है।


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