Sunday, October 18, 2015

किसी से नहीं डरना और काम करने का अद्भुत जज्बा था पिता में

                        पिता से जुड़े संस्मरण

मेरे पिता के दोस्त डॉ. विष्णु शंकर सिंह के अनुसार पीएन सिंह की बीएचयू में पांच साल की पढ़ाई के दौरान सिर पर कभी बाल नहीं रहते थे। क्योंकि उनके कमरे में हमेशा क्षेत्र के मरीज आते रहते थे। पहले उनका बीएचयू में इलाज कराते थे। नहीं तो उनकी मौत होने पर उनका काशी में अंतिम संस्कार कर देते थे। उनके कमरे में हमेशा कोई न कोई मरीज रहता था। पिता जी के दोस्त सरकारी नौकरी में गए जबकि उन्होंने प्राइवेट में काम करने का संकल्प किया। उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि अपने क्षेत्र के लोगों के लिए काम करना है। वे अपने दोस्तों से कहा करते थे कि देखना मैं तुम लोगों से ज्यादा लोग और रुपये दोनों कमाऊंगा। ऐसा उन्होंने जीते जी कर दिखाया।

  एक बार पिता को लेकर 2005-6 में दिल्ली के विमहेंस अस्पताल में लेकर गया। उनको यह नहीं बताया कि डॉक्टर की फीस पांच सौ रुपये है। डॉक्टर की प्रतीक्षा के दौरान जब उनको डाक्टर की फीस पांच सौ रुपये बताई तो उन्होंने डॉक्टर से इलाज करने से इनकार कर दिया। उन्होंने ये डॉक्टर नहीं बल्कि लुटेरे हैं। यहां मैं इलाज नहीं करा सकता। आखिरकार हम लोग डॉक्टर को बिना दिखाए वापस आ गए।

पिता जी में किसी से नहीं डरना और काम करने का जज्बा अद्भुत था। ऐसी ही एक घटना मुझे अच्छी तरह से याद है। हम लोग जिस मोहल्ले में रहते थे, वहां एक युवती जलकर मर गई थी। वह लड़की वीभत्स तरीके से जली थी। इस कारण काफी दिनों तक लोगों में दहशत व्याप्त थी। इस कारण लोग शाम के बाद घरों से बाहर तक निकलते थे। मुझे याद है कि इस घटना के कारण हमारा पूरा परिवार एक कमरे में सोता था। मेरे भैया जिन्होंने उस लड़की के पोस्टमार्टम के लिए उसे उठाने में मदद की थी, वे कई महीनों तक घर पर नहीं आए। वह दिन में घर पर आते थे, शाम ढलने से पहले घर से निकल जाते थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि पिता जी इस घटना के बाद भी बिल्कुल नहीं डरे, बल्कि शाम होते ही लोगों के घरों में जाते थे और उनको दिलासा देते थे। ऐसा कई महीनों तक चला।

2004 में उनके बीमार होने से पहले उनको 20 घंटे तक काम करते हुए देखा। इस दौरान उनसे बात करने के लिए भी तरस जाते थे। उनको डॉक्टरी पेशे के साथ राजनीति का शौक था। जब चुनाव करीब आते थे तो वे दो तीन दिन तक घर नहीं आते थे बल्कि चुनाव प्रचार में व्यस्त रहते थे। उन्हें चुनाव खुद नहीं बल्कि दूसरों को लड़ाने का शौक था। उनको एक बार लोकसभा चुनाव में लड़ने का भी मौका मिला, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पिता जी के विपरीत माता जी को चुनाव लड़ने का शौक था। हम लोगों से बातचीत में इस बात की अक्सर चर्चा करती रहती थीं।            
   

1 comment:

SWDESH INDIA said...

अरुन भाई, बाबूजी और माताजी का कभी न भूलने वाला संस्‍मरण दिए हैं