सोशल मीडिया ने सभी प्रकार के परंपरागत मीडिया के एकाधिकार को पीछे छोडते हुए अपनी एक अलग पहचान बनायी है। प्राचीन काल से ही सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कई अनेक रोचक एवं अनोखे तरीके अपनाए जाते रहे हैं। तेजी से बदलती तकनीक ने पत्रकारिता का पारंपरिक चेहरा बदल दिया है। ‘सोशल मीडिया’ लोगों की पहली पसंद बन गया है ।
तीन करोड़ तीस लाख से अधिक सोशल मीडिया के यूजर
एक रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या तीन करोड़ तीस लाख से अधिक हैं। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार पिछले कुछ वर्षो मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारत मे ‘गेम-चेंजर’ की तरह काम किया है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन की क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के एक अधिवेशन में राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत का उल्लेख किया। बाद में तत्कालीन सरकार ने इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया था। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत मे सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है।
लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया का प्रभाव
‘अबकी बार, मोदी सरकार’ ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ जैसे नारे भी सोशल मीडिया के ही हिस्से थे। लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन करने पर कई चौकाने वाले तथ्य एवं आंकड़े सामने आए है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर दो करोड़ नब्बे लाख लोगों ने दो करोड़ 27 लाख बार चुनाव से संबंधित पोस्ट को लाइक, कमेंट, शेयर आदि की। इसके अतिरिक्त एक करोड़ तीस लाख लोगों ने केवल नरेंद्र मोदी के बारे में बातचीत की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 81 करोड़ 14 लाख योग्य मतदाताओं वाले देश में सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान व्यापक था।
सोशल मीडिया ने केजरीवाल को बनाया ब्रांड
लोकपाल आंदोलन के नायक अन्ना हजारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अराविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। देश-दुनिया में जुनून पैदा करने वाले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था कि छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश में तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव
में आ गयी थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था।
सरकार तक आवाज़ पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय
लोगों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का एक प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल कांड़ा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है।
निर्भया कांड में सोशल मीडिया से असर
दिल्ली का दिल दहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे उक्त घटना के बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। देश-विदेश से ऐसी घटनाओं के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय भी इसी माध्यम को जाता है जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है, उससे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ जाहिर तौर पर अन्य मीडिया माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। इसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर मीडिया हाउसों के रणनीतिकार अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव को मजबूर हुए हैं।
सभी को दे रहा विचार रखने का मौका
वेबसाइट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स जैसे माइ स्पेस, आरकुट,फेसबुक और माइक्रो ब्लांगिंग साइट ट्विटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं। यही एक ऐसा मीडिया है जिसने अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग के अंतर को समाप्त किया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा अब बढ़ गया है। निश्चित तौर पर वैकल्पिक मीडिया में अपार संभावनाएं है। दूसरी ओर, यह सच उजागर करने का क्षमता भी रखता है।
तीन करोड़ तीस लाख से अधिक सोशल मीडिया के यूजर
एक रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या तीन करोड़ तीस लाख से अधिक हैं। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार पिछले कुछ वर्षो मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारत मे ‘गेम-चेंजर’ की तरह काम किया है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन की क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के एक अधिवेशन में राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत का उल्लेख किया। बाद में तत्कालीन सरकार ने इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया था। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत मे सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है।
लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया का प्रभाव
‘अबकी बार, मोदी सरकार’ ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ जैसे नारे भी सोशल मीडिया के ही हिस्से थे। लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन करने पर कई चौकाने वाले तथ्य एवं आंकड़े सामने आए है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर दो करोड़ नब्बे लाख लोगों ने दो करोड़ 27 लाख बार चुनाव से संबंधित पोस्ट को लाइक, कमेंट, शेयर आदि की। इसके अतिरिक्त एक करोड़ तीस लाख लोगों ने केवल नरेंद्र मोदी के बारे में बातचीत की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 81 करोड़ 14 लाख योग्य मतदाताओं वाले देश में सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान व्यापक था।
सोशल मीडिया ने केजरीवाल को बनाया ब्रांड
लोकपाल आंदोलन के नायक अन्ना हजारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अराविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। देश-दुनिया में जुनून पैदा करने वाले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था कि छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश में तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव
में आ गयी थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था।
सरकार तक आवाज़ पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय
लोगों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का एक प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल कांड़ा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है।
निर्भया कांड में सोशल मीडिया से असर
दिल्ली का दिल दहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे उक्त घटना के बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। देश-विदेश से ऐसी घटनाओं के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय भी इसी माध्यम को जाता है जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है, उससे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ जाहिर तौर पर अन्य मीडिया माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। इसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर मीडिया हाउसों के रणनीतिकार अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव को मजबूर हुए हैं।
सभी को दे रहा विचार रखने का मौका
वेबसाइट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स जैसे माइ स्पेस, आरकुट,फेसबुक और माइक्रो ब्लांगिंग साइट ट्विटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं। यही एक ऐसा मीडिया है जिसने अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग के अंतर को समाप्त किया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा अब बढ़ गया है। निश्चित तौर पर वैकल्पिक मीडिया में अपार संभावनाएं है। दूसरी ओर, यह सच उजागर करने का क्षमता भी रखता है।
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