Wednesday, October 14, 2015

गरीबी पर डिएटन के शोध से भारत को मदद मिलेगी

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री एंगस डिएटन को उपभोग पर व्यापक काम के लिए इस साल अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार दिया जाएगा। डिएटन के इस शोध कार्य से विशेषकर भारत सहित दुनिया भर में गरीबी को अांकने के तरीके को नए सिरे से तय करने में मदद मिली।
    पुरस्कार देने वाली संस्था रायल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने यह घोषणा की। एकेडमी ने कहा है कि उनका काम मानव कल्याण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
    पुरस्कार समिति के सचिव तोरस्टेन परसॉन ने कहा कि डिएटन के अनुसंधान ने अन्य अनुसंधानकर्ताओं व विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को बताया कि मूल बुनियादी स्तर पर गरीबी को किस तरह से समक्षा जाए। यह संभवत: उनका सबसे अच्छा व सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। परसॉन के अनुसार डिएटन का काम यह दिखाता है कि व्यक्तिगत व्यवहार किस तरह से व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। डिएटन ने उपभोग और कर प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए ताकि गरीब लोगों तक आवश्यक वस्तुओं और स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सेवाओं की कमी न हो। अपनी पहली प्रतिक्रिया में डिएटन ने कहा कि  अभी भी लाखों-करोड़ों लोग दुनिया में गरीबी में जी रहे हैं। उनके लिए दुनिया अभी भी नहीं बदली है। 
   डिएटन ने अपने लेखन के जरिये बताया कि कैसे उपभोक्ता विभिन्न वस्तुओं पर खर्च करते हैं, कितनी बचत करते हैं और कैसे जनकल्याण कार्यों को सही ढंग से लागू कर गरीबी और असमानता दूर की जा सकती है। इसी आधार पर उन्होंने विभिन्न आय वर्ग वालों के लोगों में उपभोग कर लगाने का सुझाव दिया। 
उन्होंने 1980 के दशक में आइडियल फॉर डिमांड सिस्टम के जरिये बताया कि कैसे हर वस्तु की मांग उसकी कीमत और व्यक्तिगत आय पर निर्भर करती है। उनके सिद्धांतों को बाद में आवश्यक वस्तुओं की कीमत स्थिर रखने और जनकल्याणकारी सुधारों को लागू करने में इस्तेमाल किया गया।
    डिएटन का जन्म एडिनबरा, स्कॉटलैंड में हुआ। उनके पास अमेरिका और ब्रिटेन की दोहरी नागरिकता है। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि पुरस्कार समिति ने दुनिया में गरीबों की चिंता करने वाले काम को सम्मानित करने का फैसला किया है।
    डिएटन ने उम्मीद जताई कि दुनिया में मौजूद अति निर्धनता या गरीबी में कमी आती रहेगी, हालांकि वे अवांछित रूप आशान्वित नहीं है। डिएटन ने कहा कि भारत में वयस्कों और बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, जहां बहुत प्रगति हुई है। देश में आधे बच्चे अब भी कुपोषित हैं। दुनिया में अनेक लोगों के लिए हालात अब भी बहुत खराब हैं। अकादमी का कहना है कि डिएटन का काम तीन केंद्रीय प्रश्नों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिनमें उपभोक्ता अपने खर्च को अलग अलग समानों पर किस तरह बांटते हैं, समाज अपनी आय का कितना खर्च करता है और कितना बचाता है तथा हम कल्याण और गरीबी का श्रेष्ठ आकलन व विश्लेषण कैसे करेंगे।    
डिएटन ने कहा, हम जो आज देख रहे हैं, वह अमीर देशों में असमान विकास का नतीजा है, जिसने गहरी खाई पैदा कर दी है। उन्होंने कहा कि गरीब देशों में गरीबी कम होने से समस्या का समाधान निकलेगा लेकिन यह दीर्घकालिक नहीं होगा, क्योंकि व्यवस्था असमानता को बढ़ावा देने वाली है। युद्धग्रस्त देशों में राजनीतिक स्थिरता भी जरूरी है। वयस्कों और बच्चों को स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से घेर रही हैं। शरणार्थी संकट पर उन्होंने कहा कि यह समस्या ऐतिहासिक है। 


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