Wednesday, October 14, 2015

पश्चिम बंगाल का लोकनाट्य जात्रा एक ऐसा रंगमंचीय साधन है जो चमक-दमक से परिपूर्ण नाटकों से परे अपनी विशिष्ट शैली में लोक संस्कति की अभिव्यक्ति के साथ जनमानस को संयुक्त होने की सीख देते हैं।
        हिन्दी नाटकों के प्रतिरूप में पश्चिम बंगाल में जात्रा के मंचन की पुरानी पंरपरा रही है। आज भी करीब हर छोटे बडे़ शहरों में पारंपरिक रूप से इसका आयोजन किया जाता है। संगीत, अभिनय, गायन और नाटकीय वाद-विवाद जात्रा का प्रमुख हिस्सा होता है। जात्रा के कलाकार लोगों के बीच अपनी कला, ज्ञान एवं अनुभव को कथा, गीत और प्रहसन के जरिये अभिव्यक्त करते हैं तथा अपनी संस़्कति का परिचय कराते हैं। बंगाली समुदाय के लोग जात्रा की इसी सांस्कृतिक विशिष्टता को ध्यान में रखकर आज भी जात्रा के मंचन को देखना पसंद करते हैं। लोग जात्रा के गीत एवं हास परिहास के माहौल के बीच जीवन की जटिलता और बोझिलता को सहजता से भुलाने की कोशिश करते हैं।

जात्रा में नहीं होता है आडंबर


जात्रा के लिए किसी विशेष रंगमंच या साज-सज्जा की जरूरत नहीं पड़ती। जात्रा के मंच पर कोई आडंबर नहीं होता। सामूहिक गीतों का गायन करने वाले और इन गीतों को संगीत की लय देने वाले कलाकार मंच पर अपने स्थान पर बैठते हैं। नाटकों के अनुरूप जात्रा की शुरुआत में भी प्रारंभिक रस्मों का निर्वहन किया जाता है। इसके बाद गायन मंडली में शामिल लोग संगीत देने वालों के साजों की लय पर गाते हैं। गीत-संगीत के कार्यक्रम की समाप्ति के बाद नर्तकों का समूह सामूहिक नृत्य की शुरूआत करते हैं। सामूहिक नृत्य के बाद एकल नृत्य भी किए जाते हैं।


कलाकार बोलते हैं उत्‍तेजित शैली में 

जात्रा में शामिल कलाकार अत्यंत उत्तेजित शैली में बोलते हैं और उनके हावभाव भी इसी तरह के होते हैं। कलाकारों की वेशभूषा आकर्षक होती है। मंचन के दौरान  शीघ्र ही उनके बीच शाब्दिक संघर्ष शुरू हो जाता है। किरदार के अनुरूप ये कलाकार प्रेम, दुख सुख एवं हासपरिहास की भावनात्मक दशा की अभिव्यक्ति करते हैं, लेकिन इसमें भी उत्तेजन का पुट होता है। बदलते परिवेश में जात्रा की नाट्य शैली में काफी बदलाव हुए हैं। जात्रा में धार्मिक, ऐतिहासिक एवं काल्पनिक विषयों में विस्तार देते हुए आधुनिक अभिरुचि के अनुरूप सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयवस्तु का भी समावेश किया गया है।

नहीं उमड़ता दर्शकों का समूह     

 हालांकि यह भी भी निर्विवाद है कि आधुनिकता के माहौल में जात्रा की पारंपरिक लोककला के प्रति जनमानस का रुझान घटा है। अब जात्रा के कार्यक्रम में लोगों का जनसमूह नहीं उमड़ता। कला एवं संस्कृति से जुड़ाव रखने वाले लोग ही दर्शकदीर्घा में नजर आते हैं। उदारीकरण के दौर में पली बढ़ी नयी पीढ़ी के विचारों एवं जीवनशैली में पश्चिमी मूल्यों के असर से इस कदर विभिन्नताएं आ गई है कि वे अपनी पुरानी परंपराओं को बिना उसके गुण दोषों का विवेचन किए अप्रांसगिक मानने लगे हैं।


जात्रा में आया है काफी बदलाव


बंगला समुदाय से ताल्लुक रखने वाली एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिउली भट्टाचार्य का कहना है कि बदलते आधुनिक परिदृश्य में जात्रा में काफी बदलाव आया है। पुराने समय में जात्रा में सभी पुरुष कलाकार ही शामिल होते थे और यही लोग महिला पात्रों की भूमिका प्रदर्शित करते थे, लेकिन जनमानस की सोच में बदलाव के बाद इसमें महिलाएं भी कलाकार के रूप में हिस्सा लेने लगी हैं। जात्रा की महत्ता के संबंध में उन्होंने बताया कि बंगला सिनेमा के प्रारंभिक दौर में फिल्म बनाने वाले जात्रा के कलाकारों को उनके अनुभव के आधार पर प्राथमिकता देते थे। वर्तमान में जात्रा का चलन कम हुआ है, लेकिन कहीं-कहीं इसका चलन अब भी है।


नाट्यशैली में समावेश की जरूरत


पेशे से अंग्रेजी विषय शिक्षिका एवं बंगला भाषा साहित्य में गहन रुचि रखने वाली शुभमिता कहती हैं कि बंगला समाज की अपनी पुरातन कला संस्कृति एवं परंपराएं हैं। जात्रा की परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिये सामाजिक और सांस्कृतिक विरासतों को उनके मौलिक कथा एवं नाट्य रूपों के साथ इसमें ऐसी नाट्यशैली के समावेश की जरूरत है, जिसके जरिये नई पीढ़ी को मनोरंजन के साथ ही इन सांस्कृतिक मूल्यों की झलक मिल सके।


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