Monday, October 12, 2015

अभद्र भाषा के खिलाफ अनूठी मुहिम रास आ रही है लोगों को

जीवन के लिए आवश्यक निर्मल जल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की मुहिम से हम सब वाकिफ है मगर सभ्य समाज के बीच नासूर की तरह पनप रही अभद्र और अश्लील भाषा के बढते प्रचलन के खिलाफ अब समाज के एक तबके ने कमर कसी है।
यूपी के उन्नाव जिले के सृजन साहित्यतिक एवं सामाजिक सेवा संस्थान ने इस अनूठी मुहिम को शब्द गंगा प्रदूषण मुक्ति अभियान का नाम दिया है। अभियान के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को पत्र लिखकर सरकारी विभागों में अभद्र भाषा के इस्तेमाल की रोकथाम की गुहार लगायी गयी है। 
संस्था के संस्थापक विनय शंकर दीक्षित ने कहा कि देश की पहचान उसकी संस्कृति और सभ्य समाज से होती है। संस्कृति के तौर पर हम इतने धनवान है कि इस देश की संस्कृति कई पश्चिमी देश अपना रहे है, मगर विविधता से भरे इस देश में पिछले कुछ दशकों से बोलचाल की भाषा में अभद्र और अश्लील जुमलों के प्रचलन की बाढ़ से सांस्कृतिक धरोहर खतरे में दिखायी देती है।
  दीक्षित ने कहा कि अभद्र भाषा के इस्तेमाल के खिलाफ इस मुहिम में साहित्यकार, समाजासेवी के अलावा पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी भागीदार बनाया गया है। सरकारी कार्यालयों में अभद्र भाषा की रोकथाम के सिलसिले में प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे पत्र का जबाब अभी नही मिला है। हालांकि कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके इस प्रयास को न/न केवल सराहा है बल्कि इसे अमल में ला
ने का वादा भी किया है।
  उन्होंनें कहा कि वैज्ञानिक शोध से यह साबित हो चुका है कि मुंह से निकले शब्द कभी नष्ट नही होते अपितु ब्रहमांड में मौजूद ईथर नामक तत्व की मदद से काफी तेज गति से विचरण करते रहते हैं। चुंबकीय प्रभाव से इन शब्दों को फिर से संयोजित किया जा सकता है। अभद्र भाषा की व्याख्या करते हुये उन्होने कहा कि अश्लील और अभद्र शब्दों की बाढ से ब्रहमांड प्रदूषित हो रहा है। साथ ही हमारी सोच और संस्कृति भी प्रदूषित हो रही है। यदि इसके इस्तेमाल पर लगाम नहीं कसी गई तो वह दिन दूर नही जब हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर से हाथ धो बैंठेगे। पेशे से वकील विनय दीक्षित कहते हैं कि आम बोलचाल में गाली गलौच इस कदर घुलमिल गयी है कि कई दफा गाली देने वाले व्यक्ति को खुद पता नही होता कि वह अपने मित्र अथवा सगे संबधी से अभद्र भाषा के रूप में बात कर रहा है। अभद्र भाषा के इस्तेमाल की यह प्रवृत्ति बच्चों में काफी देखी जाती है क्योंकि बाल्यकाल से ही अपने से बड़ों को गाली देते देख रहे होते है और शायद इसलिये उन्हे गाली देना अथवा सुनना कतई अटपटा नही लगता। 
 उन्होने बताया कि करीब चार साल पहले उनके मन में अभद्र भाषा की रोकथाम का विचार आया। उन्होंने इसे अमली जामा पहनाने के लिए अपने कुछ करीबी और साहित्य से जुडे़ लोगों से बात की और उनके सहयोग से संस्था का गठन किया।  श्री दीक्षित ने कहा कि उनकी संस्था अभद्र भाषा की रोकथाम के लिये लोगों के बीच जाकर जागरूकता अभियान चलाती रहती है। साप्ताहिक अवकाश वाले रोज नुक्कड़ सभा एवं संगोष्ठियों के माध्यम से लोगों को गाली गलौच से परहेज करने की नसीहत दी जाती है।


No comments: