Sunday, August 19, 2018

द्रविड़ अस्मिता का पाठ पढ़कर करुणानिधि ने लिखी तमिलनाडु की 'पटकथा'


तमिलनाडु में करुणानिधि को कलाईनार कहा जाता था, इसका अर्थ होता है कला का जादूगर। करुणानिधि को दक्षिण भारत में एंटी-ब्राह्मणवादी राजनीति का प्रतीक माना जाता था। डीएमके संस्थापक अन्नादुराई और उनके आदर्श पेरियार की तरह करुणानिधि सालों से दक्ष‍िण भारत के दिग्गज नेता थे। 

करुणानिधि की पैदाइश 1924 में थिरुक्कुवालाई गांव में हुई। करुणानिधि का परिवार आर्थिक रूप से कमज़ोर था, लेकिन वे उत्साही बालक थे। पढ़ने और आगे बढ़ने को तैयार, जिस समुदाय से वे आते हैं, वो पारंपरिक रूप से संगीत वाद्ययंत्र ‘नादस्वरम’ बजाने का काम किया करता था। बचपन में करुणानिधि गांव के मंदिर में संगीत सीखने जाते थे।  वादन तो जाने कितना सीख पाए, पता नहीं लेकिन यहीं गुरु ने बालक को जातिगत भेदभाव का पहला पाठ पढ़ाया। तथाकथित निचली जाति के बालक करुणानिधि को मंदिर में कमर के ऊपर कोई कपड़ा पहनकर प्रवेश नहीं मिलता था। उन्हें धुनें भी कुछ ही सिखाई जाती थीं। बच्‍चे ने देखा कि जातिगत भेद संगीत में भी पसरा हुआ था। ऐसे में संगीत से उसका मन उचट गया लेकिन राजनीतिक प्रतिरोध का दरवाजा खुल गया

किशोरावस्‍था में ही वे विचारक ई वी रामास्वामी ‘पेरियार’ के विचारों से प्रभावित हुए और उनके खड़े किए ‘आत्मसम्मान’ के आन्दोलन से जुड़ गए। यह आन्दोलन गैर-ब्राह्मणवादी भावों से ओतप्रोत था। द्राविड़ जन को ‘आर्यन’ ब्राह्मणवाद के खिलाफ उठ खड़े होने को आंदोलित कर रहा था।


कलम को बनाया हथियार
करुणानिधि 14 साल की उम्र में ही राजनीतिक प्रतिरोध की दुनिया में प्रवेश कर गए थे। जब 1937 में हिन्दी भाषा को स्कूलों में अनिवार्य भाषा की तरह लाया गया, पेरियार की विचारधारा से प्रभावित तरुण युवा विरोध में सड़कों पर उतर आए। करुणानिधि भी इन्ही में से एक थे। उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया। लिखना शुरू कर दिया था और नाटक, पर्चे, अखबार, भाषण उनके हथियार बन गए। 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने तमिल फिल्म उद्योग की कंपनी 'ज्यूपिटर पिक्चर्स' में पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू किया था।  अपनी पहली फिल्म 'राजकुमारी' से ही वे लोकप्रिय हो गए। उनकी लिखीं 75 से अधिक पटकथाएं काफी लोकप्रिय हुईं। 

ओजस्वी भाषण कला और लेखन शैली का कमाल 
वे कोयम्बटूर में रहकर व्यावसायिक नाटकों के लिए स्क्रिप्ट्स लिखने का काम कर रहे थे, जब पेरियार और अन्नादुराई की उन पर नज़र पड़ी।  उनकी ओजस्वी भाषण कला और लेखन शैली को देखकर उन्हें पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया गया। यह 1947 में पेरियार और उनके सिपहसालार अन्नादुराई के बीच उभरे मतभेदों और 1949 में नई पार्टी ‘द्रविड़ मुनेत्र कझगम’ की स्थापना के पहले की बात है। देश की आजादी के साथ ही पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए। अन्नादुराई ने मुख्यधारा  राजनीति का हाथ थामा।

फिल्‍म 'परासाक्षी' के बाद गठित हुई डीएमके
बंटवारे के बाद करुणानिधि अन्नादुराई के साथ गए। पार्टी के पहले खजांची बने। नई पार्टी के लिए पैसा जुटाने की ज़िम्मेदारी अकेले उठाई। लेकिन इस बीच वे सिनेमा की ओर निकल गए थे, विचारधारा की खेती फिल्‍म के परदे पर हो रही थी। 1952 में उनकी लिखी ‘परासाक्षी’ आई। मेलोड्रामा से भरपूर ब्‍लॉकबस्टर रही। गरीब तमिल नायक, जिसे आततायी उत्तर-भारतीय साहूकारों, ब्राह्मण नेताओं और असंवेदनशील सरकार का अत्याचार सहना पड़ता है। फिल्म के आखिर में द्रविड़ अस्मिता की आवाज बुलंद करती है, जिस विचार पर उनकी पार्टी की नींव रखी गई थी। सत्तावन में पार्टी पहला विधानसभा चुनाव लड़ी और करुणानिधि चुने गए 13 विधायकों में शामिल थे। 

दस साल लगे राजनीति को पलटने में
1967 में यही तेरह विधायकों वाली पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और अन्नादुराई राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। दक्षिण भारत में उबल रहा भाषाई विवाद और ‘हिंदी विरोधी’ भावनाओं ने अपना खेल कर गया था। सड़सठ में कांग्रेस का तमिलनाडु में ऐसा सूरज अस्त हुआ कि आज तक वो अन्य द्रविड़ पार्टियों की ‘सहयोगी’ ही बनी हुई है। 

राजनीति में हार गया लेखक
लेकिन सत्ता संभालने के दो ही साल बाद 69 में अन्नादुराई की कैंसर में मौत हो गई। इसका मतलब था करुणानिधि का सीधे सत्ता में आना। वे नए मुख्यमंत्री बने और 71 में दोबारा अपने दम पर जीतकर आए, यहां सिनेमाई हीरो एमजी रामचंद्रन उनके नए साथी बने, लेकिन यह साथ ज्यादा नहीं चला। एमजीआर ने नई पार्टी बना ली, नाम रखा एआइएडीएमके। फिर 1977 में दोनों पहली बार आमने-सामने उतरे। यह सिनेमाई मुकाबला था। एक ओर लेखक, दूसरी ओर हीरो। हीरो अपनी लोकप्रियता की ताल ठोकता। लेखक को ये गौरव की उसकी कलम ने ही हीरो को बनाया है, लेकिन जनता तो परदे पर हीरो को ही देखती है 1977 में एमजीआर ने करुणानिधि और उनकी पार्टी को चुनावों में ऐसा हराया कि फिर वो एमजीआर के जीते जी दोबारा सतह पर नहीं आ पाए, डूब ही गए। पता चला कि सिनेमा के दर्शक ही चुनाव के वोटर थे। कलम वाले लेखक की परदे वाले हीरो के आगे हमेशा हार हुई। 

वापस हासिल की राजनीतिक ताकत
दस साल ऐसा ही चला। फिर 1987 में एमजीआर की मृत्यु के बाद एआइडीएमके में सत्ता की लड़ाई छिड़ गई। एक ओर थीं एमजीआर की पत्नी जानकी और दूसरी ओर पार्टी की युवा नेता जे जयललिता। इसी ने मौका दिया करुणानिधि को खोई हुई राजनैतिक ताकत वापस हासिल करने का। उधर जयललिता उनकी विरोधी पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत बना रही थीं, इधर करुणानिधि दावा कर रहे थे कि ‘द्रविड़ नाडु’ में उन्हें एक ब्राह्मण नेत्री कैसे चुनौती दे सकती हैं, लेकिन जयललिता को कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी समझना ही शायद करुणानिधि की सबसे बड़ी राजनैतिक भूल साबित हुई। जयललिता ने द्रविड़ अस्मिता के साथ स्त्री अस्मिता दोनों को अपनी ताकत बनाया। 

जब प्रतिरोध की मूरत बन गईं जयललिता
1989 में फिर डीएमके को सबसे बड़ा धक्का लगा, जब भरी विधानसभा में जयललिता की साड़ी खींची गई। राजनीति के अखाड़े को किसी मिथकीय मल्टीमीडिया सिनेमा की तरह जीने वाली तमिलनाडु के जनता ने इसमें ‘महाभारत’ के द्रौपदी चीरहरण प्रसंग का अक्स देखा और पुरुषों से भरी राजनीति में अचानक जयललिता प्रतिरोध की मूरत बन गईं। 1991 में हुए चुनावों में एआइडीएमके ने 224 सीटें जीतीं और DMK को एक अंक पर समेट दिया। इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति करुणानिधि और जयललिता के बीच सत्ता के अदल-बदल की राजनीति बन गई थी। हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता था और भरपूर होता था। अपने 60 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के सीएम बने। उनके नाम सबसे ज्यादा 13 बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी है। 

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