अवध की बेगम हजरत महल ने 1० मई 1857 की क्रान्ति में देश प्रेम का परिचय दिया है। बेगम हजरत महल 1857 की क्रांति की एक महान क्रांतिकारी महिला थीं। एक ब्रितानी इतिहासकार ने उन्हें नर्तकी बताया था। यह अवध के नवाब वाजिद अली शाह की बेगम बन गई। उनमें कई गुण विद्यमान थे। 1857 की क्रांति का व्यापक प्रभाव कानपुर, झांसी, अवध, लखनऊ, दिल्ली, बिहार आदि में था।
1857 की क्रांतिगाथा में 17 प्रमुख महिलाओं का नाम दर्ज है जिनमें रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हजरत महल, रानी द्रौपदी बाई, रानी ईश्वरी कुमारी, चौहान रानी, अवंतिका बाई लोधो, महारानी तपस्विनी, ऊदा देवी, बालिका मैना, वीरांगना झलकारी देवी, तोपखाने की कमांडर जूही, पराक्रमी मुंदर, रार्नी ंहडोरिया, रानी तेजबाई, जैतपुर की रानी, नर्तकी अजीजन तथा ईश्वरी पाण्डेय। इन रानियों के साथ अनगिनत अन्य महिलाएं भी हैं, जो क्रांति की मशाल लेकर समर में कूदी थी लेकिन उन वीरांगनाओं का नाम दर्ज नहीं हो सका।
सन् 1857 में डलहौजी भारत का वायसराय था। उसी साल वाजिद अली शाह भी लखनऊ के नवाब बने। अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर विलासी होने के आरोप में उन्हें हटाने की योजना बना ली गई थी। डलहौजी नवाब के विलासितापूर्ण जीवन से परिचित था। उन्होंने तुरंत अवध की रियासत को हड़पने की योजना बनाई। पत्र लेकर कंपनी का दूत नवाब के पास पहुंचा और उस पर हस्ताक्षर के लिए कहा। शर्त के अनुसार कंपनी का पूरा अधिकार अवध पर स्थापित हो जाना था। वाजिद अली ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया, फलस्वरूप उहें नजरबंद करके कलकत्ता भेज दिया गया। अब क्रांति का बीज बोया जा चुका था। लोग सरकार को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बना रहे थे। 1857 में मंगल पांडे के विद्रोह के बाद क्रांति मेरठ तक फैली। मेरठ के सैनिक दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह से मिले।
सन् 1857 में डलहौजी भारत का वायसराय था। उसी साल वाजिद अली शाह भी लखनऊ के नवाब बने। अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर विलासी होने के आरोप में उन्हें हटाने की योजना बना ली गई थी। डलहौजी नवाब के विलासितापूर्ण जीवन से परिचित था। उन्होंने तुरंत अवध की रियासत को हड़पने की योजना बनाई। पत्र लेकर कंपनी का दूत नवाब के पास पहुंचा और उस पर हस्ताक्षर के लिए कहा। शर्त के अनुसार कंपनी का पूरा अधिकार अवध पर स्थापित हो जाना था। वाजिद अली ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया, फलस्वरूप उहें नजरबंद करके कलकत्ता भेज दिया गया। अब क्रांति का बीज बोया जा चुका था। लोग सरकार को उखाड़ फेंकने की योजनाएं बना रहे थे। 1857 में मंगल पांडे के विद्रोह के बाद क्रांति मेरठ तक फैली। मेरठ के सैनिक दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह से मिले।
बहादुर शाह और जीनत महल ने उनका साथ दिया और आजादी की घोषणा की। इधर, क्रांति की लहर अवध, लखनऊ, रुहेलखंड आदि में फैली। वाजिद अली शाह के पुत्र को 11 साल की आयु में अवध के तख्त पर बैठाया गया। राज्य का कार्यभार उनकी मां बेगम हजरत महल देखती थीं क्योंकि वे नाबालिग थे। अवध में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने खुद संभाला। उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। बेगम हजरत महल में संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी इसलिए अवध के अधिकांश जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरान बेगम हजरत महल ने जांबाज सिपाहियों का भरपूर हौसला बढ़ाया। हाथी पर सवार होकर उन्होंने रात-दिन अंग्रेजों से मोर्चा लिया। ब्रिटिश आयुक्त सर हेनरी लॉरेंस ने वफादार 17०० सिपाहियों के साथ रेजीडेंसी में शरण ली।
बेगम हजरत महल ने हिंदू, मुसलमान सभी को समान भाव से देखा। अपने सिपाहियों का हौसला बढ़ाने के लिए युद्ध के मैदान में भी जाती थी। बेगम ने सेना को जौनपुर और आजमगढ़ पर धावा बोल देने का आदेश जारी किया, लेकिन ये सैनिक आपस में ही टकरा गए। ब्रितानियों ने सिखों और राजाओं को खरीद लिया तथा यातायात के संबंध टूट गए। अंत में बेगम की कोठी पर भी ब्रितानियों ने कब्जा कर लिया और लखनऊ पर पूरा अधिकार जमा लिया। बेगम हजरत महल पहले ही महल छोड़ चुकी थीं, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
बेगम हजरत महल ने कई स्थानों पर मौलवी अहमदशाह की बड़ी मदद की। उन्होंने नाना साहब के साथ संपर्क कायम रखा। लखनऊ के पतन के बाद भी बेगम के पास कुछ वफादार सैनिक और उनके पुत्र विरजिस कादिर थे। वह आखिर तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ती रहीं।

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