Thursday, October 8, 2015

चुनावों में नुक्कड़ नाटकों की बढ़ी मांग

बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए नुक्कड नाटकों की बढी मांग से बदहाली का जीवन जी रहे नाट्य कलाकारों की इन दिनों बहार है। चुनाव प्रचार के लिये किए जा रहे नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता बढने से कलाकार विभिन्न दलों के प्रत्याशियों की मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं ।

सार्वजनिक स्थल पर किया जाता है मंचित
      नुक्कड़ नाटक अभिव्यक्ति की एक ऐसी नाट्य विधा है जो परंपरागत रंगमंचीय नाटकों से भिन्न है। यह रंगमंच पर नहीं खेला जाता तथा आमतौर पर इनकी रचना किसी एक लेखक द्वारा नहीं की जाती बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और संदर्भों से उपजे विषयों को इनके जरिये उठाया जाता है। जैसाकि नाम से जाहिर है इसे सड़क, गली, चौराहे, किसी संस्थान के गेट अथवा किसी भी सार्वजनिक स्थल पर मंचित किया जाता है। नुक्कड़ नाटक में बुद्धिजीवियों द्वारा किसी उद्देश्य को सामने रख कर सशक्त अभिव्यक्ति की जाती है। वैसे तो नुक्कड़ नाटक भारत में पहले से मंचित किए जाते रहे हैं लेकिर इन्हें लोकप्रिय बनाने का श्रेय सफदर हाशमी को जाता है। उनकी जयंती 12 अप्रैल को देश में राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राजनीतिक दल हो रहे आकर्षित
     
जन सामान्य से जुड़ी समस्याएं और उनका निराकरण नुक्कड़ नाटकों के लोकप्रिय विषय हैं। गलत व्यवस्था का विरोध और उसके समांतर एक आदर्श व्यवस्था क्या हो सकती है, इसी पर नुक्कड़ नाटक की धुरी टिकी होती है। आज बड़ी-बड़ी व्यावसायिक-व्यापरिक कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटकों का प्रयोग कर रही हैं। सरकारी तंत्र अपनी नीतियों-निर्देशों के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक जैसे माध्यम का सहारा लेते हैं और राजनीतिक दल चुनाव के दिनों में अपने दल के प्रचार-प्रसार के लिए इस विधा की ओर आकर्षित होते हैं। नुक्कड़ नाटकों के बहुविध रूप और रंग दिखाई पड़ते हैं।
      बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए हर राजनीतिक दल नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके कारण पूरे बिहार में कलाकारों की मांग बढ़ गयी है। कलाकार राजनीतिक दलों के पक्ष में नाल, ढोलक और खंजरी की धुन पर मतदाताओं को रिझाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं ।

बेरोजगार युवकों को किया गया शामिल 
सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दल नुक्कड़ नाटक का बिहार में प्रयोग करते रहे हैं। यह पहली बार नहीं है, जब नुक्कड़ नाटकों का इस्तेमाल पार्टियां अपने प्रचार के लिए कर रही हैं। वर्ष 2००9 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भी बिहार में नुक्कड़ नाटक का खूब इस्तेमाल किया गया था। बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नुक्कड़ कलाकार मांग पूरी नहीं कर पा रहे है । इस मांग को पूरा करने के लिए नुक्कड़ के संचालक गांवों से पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वालों और ठीक-ठाक संवाद अदायगी करने वाले बेरोजगार युवकों को नुक्कड़ नाटक में शामिल कर रहे हैं ।
रंगमंच संस्था प्रयास ने नुक्कड़ नाटक की 7०-75 टीमें तैयार की हैं। एक टीम में आठ से 1० कलाकार होते हैं। प्रयास से जुड़े मनीष ने बताया कि ‘‘मांग के हिसाब से कलाकारों को बुलाना पड़ता है। कई बार ये एक बंधे-बंधाए पारिश्रमिक मसलन आठ-1० हजार रुपये महीने पर काम करने को तैयार हो जाते हैं तो कई बार 1० -15 दिन के लिए काम करते हैं। गोपालगंज निवासी 26 वर्षीय सचिन एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। उन्हें पांच हज़ार रुपए की तनख्वाह मिलती थी। नुक्कड़ नाटक के लिए सचिन ने वह नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कहा कि दो महीने यहां काम करूंगा, उसके बाद 2० हज़ार या उससे ज्यादा रुपए मेरे हाथ में होंगे, फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ लेंगे।

मतदाताओं को रिझाने की जिम्‍मेदारी 

दरभंगा के हीरालाल राय के पास फिलहाल राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल (यूनाइटेड)और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समेत कई प्रत्याशियों के लिए मतदाताओं को रिझाने की जिम्मेदारी है। श्री राय के पास 4० कलाकार हैं, जो इन दिनों पटना के प्रेमचंद रंगशाला में अभ्यास कर रहे हैं। हीरालाल ने कहा कि जैसे मांग हुई, वैसे नाटकों की टीम भेज देते हैं। एक दिन में पांच-छह शो पार्टी के बताए इलाके में करने पड़ते हैं।एक कलाकार को रोजाना 5०० रुपए मिल जाते हैं।
       कई कलाकारों ने बताया कि उन्हें प्राय: काम नहीं मिलता, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उनकी मांग बढ़ जाती है, जिससे उनकी अच्छी कमाई हो जाती है। चुनाव नुक्कड नाटक के कलाकारों के लिए कमाई का अच्छा साधन साबित होते हैं। एक दूसरे कलाकार मनीष महिवाल ने बताया कि जो एजेंसियां पार्टियों का काम देख रही हैं, वे कई बार कलाकारों को वाजिब पैसा नहीं देती हैं। पार्टी से पैसा पूरा लिया जाता है लेकिन कलाकारों को बहुत कम मिलता है।

करना पड़ता है लोगों के गुस्‍से का सामना 
 नुक्कड़ नाटक के जरिए पार्टियों के प्रचार-प्रसार में खतरे भी कम नहीं हैं। चूंकि इस विधा में सीधा संवाद होता है, इसलिए लोगों का गुस्सा भी झेलना पड़ता है। हीरालाल ने बताया कि नुक्कड़ नाटक के दौरान कई बार लोगों का नाराजगी सहनी पड़ती है। पार्टी अपनी तरफ से अपनी स्क्रिप्ट दे देती है, जिसमें वह जनता से जो वायदे करती है, उन्हें संवाद के जरिये जब बोला जाता है तो कई बार लोगों का गुस्सा भी झेलना पड़ता है। हीरालाल ने कहा लोग कहते हैं, आप झूठ बोल रहे हैं। ऐसे में हमें लोगों को ये समझाना पड़ता है कि हम बस नाटक करने वाले हैं।
      इस बार के विधानसभा चुनाव में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) पूरे बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ  नाटक कर रहा है। पूरे बिहार में इप्टा की 22 यूनिट भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और भाजपा को निशाना बनाते हुए नुक्कड़ नाटक करेंगी। इप्टा के कलाकार तनवीर अख्तर ने कहा कि ‘‘हम अपने एजेंडा को जनता के बीच रख रहे हैं, लोगों से कह रहे हैं कि भाजपा के खिलाफ जो भी उम्मीदवार आपको मजबूत लगे, उसको वोट दें। यदि लाइक-माइंडेड लोग हमें चाहेंगे तो हम उनके इलाके में भी नाटक करेंगें।

कलाकारों की बात सुनती है पब्लिक 
      राजनीतिक गलियारों में नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता की वजह के इन सवालों के जवाब में 35 साल से रंगमंच से जुड़े शफी अहमद कहते हैं कि नजरें चार होती हैं तो मुरव्वत आ ही जाती है। नुक्कड़ नाटक आपकी आंख में आंख डालकर संवाद करता है तो जब ये संवाद होते हैं तो कलाकारों की बात पब्लिक सुनती है।

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