बेलारूस की लेखिका स्वेतलाना एलेक्सीविच को वर्ष 2015 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। स्वीडिश एकेडमी ने गुरुवार को अपनी घोषणा में कहा कि स्वेतलाना को बहुआयामी, मानवीय त्रासदी से जुड़े विषयों और अपने समय के साहसिक लेखन के कारण चुना गया है।
स्वेतलाना को चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना और द्वितीय विश्व युद्ध के भावनात्मक पक्षों को उभारने वाले लेखन से अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। उनकी कई किताबों का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और उन्हें तमाम अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। उन्होंने कई लघु कहानियां, उपन्यास और रिपोर्ताज भी लिखे हैं।
हालांकि रूसी भाषा में लिखी गई उनकी किताबों को उनके ही देश में प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी गई। बेलारूस में लंबे समय तक तानाशाही शासन वाले राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको सत्ता में रहे। मेडल के साथ स्वेतलाना को करीब छह करोड़ 20 लाख रुपये की इनामी राशि भी मिलेगी।
स्वीडिश एकेडमी ने बयान में कहा, पिछले 30-40 सालों से स्वेतलाना सोवियत संघ और उसके विघटन के बाद की परिस्थितियों के मार्मिक चित्रण में जुटी हैं। उन्होंने अपनी किताबों में ऐतिहासिक घटनाओं के मानवीय और भावनात्मक पक्षों को प्रमुखता दी है। इसमें चेर्नोबिल हादसा, अफगानिस्तान में सोवियत संघ का दखल जैसे विषय शामिल हैं। उन्होंने इन घटनाओं से भुक्तभोगी हजारों पुरुषों-महिलाओं और बच्चों के साक्षात्कार लेकर सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को झकझोरा है।
पहली किताब से ही छा गईं
स्वेतलाना ने स्कूली पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता से अपना करियर शुरू किया। द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाली सैकड़ों महिलाओं के इंटरव्यू पर आधारित पहली किताब ‘वार्स अनवोमेनली फेस’ से ही स्वेतलाना सुर्खियों में आ गईं। द्वितीय विश्व युद्ध में करीब दस साल सोवियत महिलाओं ने हिस्सा लिया था और उनसे पहले किसी ने उन महिलाओं के दर्द को नहीं समझा था। इस किताब की बीस लाख से ज्यादा प्रतियां बिकीं। अफगानिस्तान में हुए हमले में जान गंवाने वाले सोवियत संघ के सैनिकों की मांओं के दर्द को बयां करने वाली उनकी किताब र्द ंजकी ब्वाय ने साहित्य जगत को हिलाकर रख दिया। सोवियत संघ के पतन के रूस पर पड़ने वाले असर पर आधारित उनकी किताब सेकेंड हैंड टाइम जल्द आने वाली है।
सट्टेबाजों ने भी लगाया था उन्हीं पर दांव
नोबेल विजेता स्वेतलाना एलेक्सीविच पुरस्कार के लिए सट्टेबाजों की भी पसंदीदा थीं। उनके अलावा जापान के हारुकी मुराकामी, केन्या के गुगी वा थियोंग, अमेरिका के जोयस कैरोल ओटेस और नार्वे के लेखक जोन फोसे भी दौड़ में शामिल थे।

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