प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फावड़ा चलाकर श्रमदान करने के लगभग आठ महीने बाद वाराणसी के ऐतिहासिक अस्सी घाट की तस्वीर बदल गई है। अब यहां प्राचीन स्वरूप के साथ आधुनिकता का समावेश नजर आता है, जो बड़े-बुजुर्गोँ के साथ-साथ युवाओं को भी खासा आकर्षित कर रहा है।
सफाई व्यवस्था में पहले से मुकाबले काफी सुधार
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने गत वर्ष आठ नवंबर को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित अस्सी घाट पर सफाई अभियान के साथ यहां के तमाम गंगा घाटों को संवारने का जो अभियान शुरू किया था, वह कई घाटों पर दिखने लगा है। घाटों की सफाई व्यवस्था में पहले से मुकाबले काफी सुधार हुआ है। अस्सीघाट के साथ रीवा घाट पर मिट्टी हटाने का काम काफी हद तक पूरा हो गया है और तुलसी घाट भी साफ-सुथरा नजर आता है। दशाश्वमेध घाट और डॉ राजेन्द्र प्रसाद घाट पर वाईफाई सुविधा का लाभ श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मिल रहा है। मणिकर्णिका घाट पर सफाई सहित तमाम सुविधाएं पहले के मुकाबले काफी कुछ बदल गया है। घाटों पर एलईडी रोशनी की वजह से पर्यटक सुरक्षित महसूस करते हैं और कई लोग प्रमुख घाटों पर देर रात तक बैठे पवित्र गंगा की कलकल धारा का आनंद लेते नजर आते हैं।
पर्यटकों की संख्या बढ़ी
अस्सी घाट सहित कई घाटों पर चेजिंग रूम बना दिये गए हैं, जिससे गंगा स्नान करने वाली महिला श्रद्घालुओं को कपड़े बदलते वक्त असहज स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है। अस्सी घाट पर पंडों की गद्दियां लगने और फुल-मालाओं की कई दुकानें सजने लगी हैं। श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए लोहे के बेंच की व्यवस्था है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से नाविक खुश हैं। उत्तर प्रदेश की इस धर्म नगरी में देश-विदेश से आने वाले बुजुर्ग श्रद्धालुओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में युवा भी इस घाट का रुख कर रहे हैं। खास बात यह कि यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी पहुंचने लगे हैं, उनमें ज्यादातर बीएचयू के बच्चे शामिल हैं।
सफाई और रोशनी की अच्छी व्यवस्था
पर्यटकों की संख्या बढ़ी
अस्सी घाट सहित कई घाटों पर चेजिंग रूम बना दिये गए हैं, जिससे गंगा स्नान करने वाली महिला श्रद्घालुओं को कपड़े बदलते वक्त असहज स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है। अस्सी घाट पर पंडों की गद्दियां लगने और फुल-मालाओं की कई दुकानें सजने लगी हैं। श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए लोहे के बेंच की व्यवस्था है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से नाविक खुश हैं। उत्तर प्रदेश की इस धर्म नगरी में देश-विदेश से आने वाले बुजुर्ग श्रद्धालुओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में युवा भी इस घाट का रुख कर रहे हैं। खास बात यह कि यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी पहुंचने लगे हैं, उनमें ज्यादातर बीएचयू के बच्चे शामिल हैं।
सफाई और रोशनी की अच्छी व्यवस्था
बीएचयू के फाइन आट्र्स विभाग के कई विद्यार्थी सुबह-सुबह शांत वातावरण में घाट की सीढ़ियों पर बैठकर गाजनों पर चित्र उकेरते नजर आते हैं। दूसरे कालेजों और स्कूलों के भी बहुत से बच्चे अक्सर घूमते देखे जा सकते हैं। इन लोगों कहना है कि पहले के मुकाबले यहां सफाई और रोशनी की अच्छी व्यवस्था है। इस वजह से उन्हें यहां आना अच्छा लगता है। अस्सी घाट पर वाराणसी के आरएन इंटरनेशनल स्कूल के ग्यारहवीं क्लास के छात्र आयुष अग्रवाल, हर्षित कोठारी, लक्ष्य मोटवाल, मलिका खेतान और समृद्धि मुरारकर ने बताया कि वे यहां अक्सर एक साथ आते हैं। उनका कहना है कि यहां पहले के मुकाबले सफाई सहित तमाम व्यवस्थाओं में काफी सुधार हुआ है।
मलिका खेतान कहती है, ‘वह सबसे बड़ा बदलाव यह मानती है कि जब वह अस्सी घाट आती हैं तो प्रधानमंत्री मोदी का सफाई का संदेश निश्चित तौर पर याद आ जाता है और वह उस पर अमल करती हैं।’ सुश्री खेतान का कहना है कि घाट या कहीं दूसरे जगह भी जब बिस्कुट या नमकीन आदि खाते हैं तो उसका रैपर यत्र-तत्र नहीं फेंकते। कूड़ा डालने की जगह नहीं मिलने पर वह बैग या अपनी जेब में ही उसे डाल लेते हैं और उसे उचित स्थान मिलने पर डालते हैं।
तस्वीर काफी हद तक बदल गई
वाराणसी के भेलूपुर के निवासी और नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में स्नोकोत्तर छात्र शाहित मलिक का कहना है कि घर के करीब होने के कारण वह बचपन से ही अस्सी घाट आते रहे हैं। अब उन्हें यहां काफी बदलाव आया है। सफाई, रोशनी और सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त होने की वजह से वह अपने दोस्तों के साथ कई बार तो रात के 1०-11 बजे भी यहां आते हैं।
बीएचयू में फाइन आर्ट्स में द्वितीय वर्ष के छात्र सचिन गौंड़ का कहना है कि प्रधानमंत्री द्वारा अस्सी घाट की सफाई शुरू करने के बाद यहां की तस्वीर बदल गई है। वह अक्सर यहां सुबह-सुबह आते हैं। कक्षा से बाहर जाकर चित्र बनाने उनके कोर्स का हिस्सा है, इस वजह से वह रोजाना दो-तीन घंटे अस्सी घाट पर आते हैं। उनका कहना है कि उनके जैसे अनेक विद्यार्थी यहां आते हैं। पिछले आठ महीने में अस्सी घाट पर हुए बदलाव को विरोधी दल के लोग भी नजरअंदाज नहीं कर पाते। कांग्रेस के स्थानीय निगम पार्षद गोविंद शर्मा कहते हैं कि ‘राजनीति अपनी जगह है, लेकिन इस बात से वह इनकार नहीं करते कि प्रधानमंत्री द्वारा अस्सी घाट की सफाई अभियान शुरू करने के बाद यहां की तस्वीर काफी हद तक बदल गई है।’ साथ ही उनका कहना है कि श्री मोदी जनता से किये अपने अन्य वादों पर भी अमल करते तो अच्छा होता।
मलिका खेतान कहती है, ‘वह सबसे बड़ा बदलाव यह मानती है कि जब वह अस्सी घाट आती हैं तो प्रधानमंत्री मोदी का सफाई का संदेश निश्चित तौर पर याद आ जाता है और वह उस पर अमल करती हैं।’ सुश्री खेतान का कहना है कि घाट या कहीं दूसरे जगह भी जब बिस्कुट या नमकीन आदि खाते हैं तो उसका रैपर यत्र-तत्र नहीं फेंकते। कूड़ा डालने की जगह नहीं मिलने पर वह बैग या अपनी जेब में ही उसे डाल लेते हैं और उसे उचित स्थान मिलने पर डालते हैं।
तस्वीर काफी हद तक बदल गई
वाराणसी के भेलूपुर के निवासी और नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में स्नोकोत्तर छात्र शाहित मलिक का कहना है कि घर के करीब होने के कारण वह बचपन से ही अस्सी घाट आते रहे हैं। अब उन्हें यहां काफी बदलाव आया है। सफाई, रोशनी और सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त होने की वजह से वह अपने दोस्तों के साथ कई बार तो रात के 1०-11 बजे भी यहां आते हैं।
बीएचयू में फाइन आर्ट्स में द्वितीय वर्ष के छात्र सचिन गौंड़ का कहना है कि प्रधानमंत्री द्वारा अस्सी घाट की सफाई शुरू करने के बाद यहां की तस्वीर बदल गई है। वह अक्सर यहां सुबह-सुबह आते हैं। कक्षा से बाहर जाकर चित्र बनाने उनके कोर्स का हिस्सा है, इस वजह से वह रोजाना दो-तीन घंटे अस्सी घाट पर आते हैं। उनका कहना है कि उनके जैसे अनेक विद्यार्थी यहां आते हैं। पिछले आठ महीने में अस्सी घाट पर हुए बदलाव को विरोधी दल के लोग भी नजरअंदाज नहीं कर पाते। कांग्रेस के स्थानीय निगम पार्षद गोविंद शर्मा कहते हैं कि ‘राजनीति अपनी जगह है, लेकिन इस बात से वह इनकार नहीं करते कि प्रधानमंत्री द्वारा अस्सी घाट की सफाई अभियान शुरू करने के बाद यहां की तस्वीर काफी हद तक बदल गई है।’ साथ ही उनका कहना है कि श्री मोदी जनता से किये अपने अन्य वादों पर भी अमल करते तो अच्छा होता।
प्रधानमंत्री से उम्मीद
अस्सी घाट पर नाव के पेशे से जुड़े श्याम मांझी और वैद्यनाथ माझी कहते हैं, ‘जब-जब प्रधानमंत्री के वाराणसी दौरे की खबर मिलती है तो यहां के नाविक समाज के लोगों में यह उम्मीद जगती है कि उनके लिए भी कुछ घोषणाएं होंगी, लेकिन ऐसा नहीं होता। इस बार भी वह प्रधानमंत्री से उम्मीद लगाए बैठे हैं।
वैद्यनाथ मांझी करते हैं कि सरकार की ओर से फ्री जलशव वाहिणी शुरू करने से उनके रोजगार पर असर पड़ा है। उनका कहना है कि मुफ्त सेवा शुरू करना अच्छी बात है, लेकिन सरकार को इस पेशे से जुड़े लोगों के लिए कोई ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे उनकी की रोजी-रोटी प्रभावित न हो। उनका कहना है कि देर-सबेर मोदी उनकी समस्याएं जरूर दूर करेंगे।

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