Wednesday, October 7, 2015

जयशंकर प्रसाद की उपेक्षा हुई


प्रसिद्ध कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने कहा है कि जयशंकर प्रसाद जी के साथ न्याय नहीं हुआ। किसी न किसी कारण से प्रसाद जी की उपेक्षा हुई। प्रसाद ने अपनी सृजन यात्रा यथार्थवाद से शुरू की और आदर्शवाद की ओर उन्मुख हो गए। यह उस समय की जरूरत थी। इसे समझना होगा।
 प्रो.काशीनाथ सिंह विद्याश्री न्यास की ओर से आयोजित ‘जयशंकर प्रसाद की सृजन यात्रा’ विषयक तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘कथाकार जयशंकर प्रसाद’ विषयक सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी पर प्रेमचंद की एक टिप्पणी को गलत संदर्भों में लिया गया। प्रेमचंद जी ने एक बार कहा था कि ‘प्रसाद जी गड़े मुर्दे उखाड़ते हैं।’ दो महान रचनाकारों के आपसी मतभेद की गलत व्याख्या का दुष्परिणाम आज तक हम भुगत रहे हैं।
 उन्होंने कहा कि गड़े मुर्दे गांधी और नेहरू ने भी उखाड़े थे। यह उस समय की आवश्यकता थी। उन्होंने बताया कि प्रसाद जी ने सबसे पहले 1911 में ‘ग्राम’ नामक कहानी लिखी जो पूरी तरह यथार्थवादी है। हिन्दी साहित्य में 1950 के बाद जो आंचलिकता आई वह ‘ग्राम’ में ही दिखाई पड़ती है, इसलिए प्रसाद को सही संदर्भों में समझने की आवश्यकता है।
प्रो.सदानंद शाही ने कहा कि प्रसाद अनूठे किस्म के साहित्यकार थे। प्रसाद को पढ़ते हुए टैगोर की याद आती है। रामदेव शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद और प्रसाद की दृष्टि अलग-अलग है। प्रो.बलराज पांडेय ने कहा कि जिस साहित्य का आधार दु:ख और वेदना है, वह यथार्थवाद पर आधारित होगा। प्रसाद के साहित्य में दोनों मिलता है। लेखिका उषा किरण खान ने कहा कि किसी खेमे में न होने के कारण प्रसाद जी की अधिक चर्चा नहीं हो पाई। प्रो.कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कहा कि प्रसाद के नाटक अतीतजीवी नहीं हैं। उनमें वर्तमान की झलक है। प्रसाद के रंगकर्म को समझने की जरूरत है। कुंवर जी अग्रवाल ने कहा कि प्रसाद के नाटकों का मंचन करना है तो उनके साहित्य को समझना होगा।

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