Wednesday, October 7, 2015

पूरबिहा हूं, जहां भी हूं मैं वही

               
केदार नाथ सिंह से कविताओं का संबंध करीब आधी शताब्दी से ज्यादा समय का है। कविताओं के साथ उनका संबंध ओढ़ना-बिछौना की तरह है। उनकी कविताओं का विस्तार शहर से लेकर गावों तक है। दिल्ली में लंबे समय से रहने के बावजूद अपने गांव को नहीं भूले बल्कि उससे जुड़े रहे। उनकी कविताओं में भोजपुरी मातृभाषा के रूप में प्रकट होती रहती है। यही कारण है कि वह कविता संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ में एक ओर ‘कपास के फूल’, ‘फसल’, ‘अन्न संकट’, ‘बैलों का संगीत प्रेम’, ‘एक ठेठ किसान के सुख’ जैसी ग्रामीण संवेदनाओं को छूने वाली कविताएं लिखते हैं, वहीं दूसरी ओर ’भारतीय नागरिक के कुछ सुझाव’, ‘गमझा और तौलिया’, ‘मनाली’, ‘घर में प्रवास’ जैसी शहरी संवेदना की कविताएं लिखी हैं।
  केदार की कविताओं में ग्रामीण जीवन के प्रति सम्मोहन है। यही कारण है कि उन्होंने ‘काली सदरी’ कविता में लिखा है कि ‘मैंने बहुत कोशिश की/ वह जरा सी धूल/ मेरे संग-संग बची रहे महानगर में/ पर पता नहीं कैसे धीरे-धीरे झरती रही/ वह झरती रही मेरी पहचान।’ केदार की कविताओं में स्मृति की अहम भूमिका है। यही कारण है कि ‘पत्नी की अट्ठाइसवीं पुण्यतिथि पर’ जैसी कविता लिखी है। इसके अलावा कई व्यक्तिओं पर भी कविताएं लिखी हैं। जैसे कवि कुंभनदास के प्रति, ज्यां पाल सात्र की कब्र पर, प्रो. वरयाम सिंह, कवि देवेंद्र कुमार, त्रिलोचन को पढ़ना, निराला की आवाज, हीरा भाई। इन कविताओं के माध्यम से उन्होंने अपने करीबियों को याद किया है।
   ‘गमछा और तौलिया’ कविता के माध्यम से दो अलग-अलग जीवन शैलियों को याद किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘मैंने सुना/ तौलिया गमछे से कह रहा था/ तू हिंदी में सूख रहा सूख /मैं अंग्रेजी में कुछ झपकी लेता हूं। कई कविताओं में केदार ने हिंदी और भोजपुरी के प्रति अपने लगाव को जाहिर किया है।
उन्होंने लिखा है कि ‘मैं दोनों को प्यार करता हूं और देखिए न मेरी मुश्किल पिछले साठ बरसों से दोनों में दोनों को खोज रहा हूं’। यह उनका दुचित्तापन भी है, जिससे वह अंदर बाहर होते रहते हैं। कविता के जिंदा रहने के बारे में वह लिखते हैं कि उनके शब्दों के फांक में/ कई बार सहसा कौंध जाती है वह/ पता लगा लो जो मारे जाते हैं जंगलों में/ उन युवा होंठों पर/ अक्सर होती है कोई न कोई कविता। ‘देव नागरी‘ कविता में उन्होंने लिखा है कि यह मेरे लोगों को उल्लास है/ जो ढल गया है मात्राओं में/ अनुस्वार में उतर आया है/ कोई कंठावरोध। केदार प्राय: पौधों, जानवरों, पहाड़ों या नदियों से बात करते हुए और लोक कथाओं का उपयोग करते हुए कविता को आगे बढ़ाते हैं। ‘घास’ कविता में उन्होंने लिखा है कि कुछ जरूरी सूचनाएं हैं उसके पास/ कुछ बातें जरूरी/ जो वह बुदबुदाना चाहती है/ तुम्हारे कान में/ कभी भी.../ कहीं से भी उग आने की एक जिद है वह। ‘एक पुरबिहा का आत्मकथ्य’ कविता में उन्होंने लिखा है कि ‘हर गिरा खून अपने अंगोछे से पूछता/ मैं वही पूरबिहा हूं/जहां भी हूं।’ इस कविता के माध्यम से महाराष्ट्र एवं अन्य जगहों पर भोजपुरी भाषियों की पिटाई पर कवि का दर्द झलकता है। केदार नाथ सिंह ने कविताओं के माध्यम से हिंदी और भोजपुरी दोनों से संबंध बनाए रखा है। शब्दों का नापतौल कर प्रयोग केदार नाथ सिंह की कविताओं की विशेषता है, इसके बावजूद उनकी कविताएं सहज लगती हैं। नई पीढ़ी और कवियों के लिए उनकी कविताएं प्रेरणा हैं।


पुस्तक : सृष्टि पर पहरा 

कवि : केदार नाथ सिंह 

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