Tuesday, October 6, 2015

किरन बेदी : भाजपा के मास्टर स्ट्रोक पर सवाल

                                                                               

जनलोकपाल आंदोलन और निर्भया कांड के बाद दिल्ली में तरेह महीने के भीतर तीसरा चुनाव है।  यहां एक दूसरे को शह और मात देने के लिए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में सियासी गहमामहमी अपने चरम पर है।
  आजादी के बाद ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि किसी राष्ट्रीय पार्टी ने किसी कार्यकर्ता को पार्टी में शामिल करने के चार दिन बाद उसे मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया हो। दिल्ली में किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने को कई दिग्गज इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं। भाजपा के हाईकमान ने किरण बेदी को इतने सम्मान के साथ पार्टी में लेने का जो फैसला किया है, उसके पीछे शायद यह विचार है कि स्थानीय नेताओं के जरिये दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतना मुश्किल होगा। किरन बेदी ही अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत चमक का मुकाबला कर सकेंगी।

भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच करीबी लड़ाई
 ज्यादातर न्यूज चैनलों के सर्वे के अनुसार भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच करीबी लड़ाई है। किरन बेदी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाने के फैसले के कारण पार्टी के अंदर और बाहर कई सवाल  खड़े हुए हैं। लोगों ने पूछा कि जिस पार्टी ने आठ महीने पहले पूरे देश में पूर्ण बहुमत के साथ लोकसभा चुनाव जीता हो, वह पार्टी क्या कोई ऐसा चेहरा पैदा नहीं कर सकी, जिसके नेतृत्व में दिल्ली का चुनाव लड़ सके। किरन वेदी के चुनाव के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। 10 जनवरी को हुई रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली को सफलता नहीं मिलने और बाद में प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय पर बिजली कंपनियों से साठगांठ के आरोप के बाद भाजपा यह कदम उठाने को मजबूर हुई। भाजपा के भीतर दिल्ली को लेकर बेचैनी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि रैली से पहले दो दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्रियों को सघन प्रचार में शामिल होने को लगाया गया।

बाहरी व्यक्ति को तरजीह से कार्यकर्ताओं में खलबली
  भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक जगदीश मुखी ने कहा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य स्तरीय नेतृत्व से बिना पूछे यह कदम उठाया गया। पार्टी के इस निर्णय से सतीश उपाध्याय, जगदीश मुखी, विजय गोयल और हर्षवर्धन को भारी झटका लगा है। पार्टी के निचले स्तर तक नेता और कार्यकर्ता भी इस वजह से नाराज हो सकते हैं कि एक बाहरी व्यक्ति को उनके ऊपर तरजीह दी जा रही है। इस दौरान आम आदमी पार्टी के बागी जैसे शाजिया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी, अशोक चौहान, एसएस धीर, अश्विनी उपाध्याय को भाजपा को शामिल कर इनमें से कई को टिकट दिया गया।
हालांकि अन्य पार्टियों ने भी भाजपा के नेताओं का टिकट दिया है। पार्टी के इस निर्णय से कार्यकर्ताओं में खलबली मचना स्वाभाविक था। यही कारण है कि पार्टी को कई जगह विरोध का सामना करना पड़ा। भाजपा के टिकट वितरण पर भी सवाल खड़े हुए। भाजपा को अपेक्षाकृत अनुशासित पार्टी माना जाता है  और शायद हाईकमान को असंतोष को नियंत्रित करने में ज्यादा समस्या न हो, लेकिन असंतोष अंदर ही अंदर तो सुलग सकता है। दिल्ली में लगभग 1200 पोलिंग बूथ हैं, जिन पर स्थानीय कार्यकर्ता ही अहम भूमिका निभाता है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय चुनाव में खड़े नहीं हुए। किरन बेदी के खिलाफ बोलने वाले सांसद मनोज तिवारी को मीडिया के सामने आकर माफी मांगनी पड़ी और बेदी को अपना नेता स्वीकार करना पड़ा।
    शुरुआती दौर में यह भी खबर आई कि आरएसएस किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ है, लेकिन बाद में आरएसएस ने इन खबरों को नकार दिया, लेकिन यह कहा जा रहा है कि आरएसएस किरन बेदी को लेकर उत्साहित नहीं है। यही कारण पार्टी में शामिल होने के बाद बेदी ने आरएसएस की जमकर प्रशंसा की।

दिल्ली में आमने-सामने की टक्कर
लोकसभा चुनाव के बाद देश में हुए चार राज्यों के चुनाव में भाजपा बिना मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को घोषित कर चुनाव लड़ रही थी, लेकिन दिल्ली में भाजपा अपने इस निर्णय को बदलना पड़ा। नरेंद्र मोदी के आठ महीने के शासन काल में हरियाणा, झारखंड में तो पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की सरकारें आई हैं, महाराष्ट्र में दो नंबर से एक नंबर की पार्टी बनते हुए उसने मुख्यमंत्री का पद भी पा लिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव का समीकरण बाकी राज्यों से यूं भी अलग है। अभी तक जहां-जहां चुनाव हुए, वहां बहुकोणीय लड़ाई में भाजपा उभरकर सबसे आगे आ खड़ी हुई। दिल्ली पहला राज्य है, जहां आमने-सामने की टक्कर है। हालांकि बीजेपी यह चाहती है कि यह टक्कर आमने-सामने की न होकर त्रिकोणीय हो, जिससे वोट बंट सके।

सोशल मीडिया में बराबरी में मुकाबला
दिल्ली ऐसा प्रदेश है, जहां कांग्रेस न तो सत्ता में भागीदारी में है और न ही लड़ाई की स्थिति है क्योंकि उसकी साख गिर चुकी है और अभी मुकाबले की स्थिति में नहीं है। इसके साथ ही सोशल मीडिया में भाजपा का बराबरी में मुकाबला करने वाली आम आदमी पार्टी चुनाव में आमने-सामने है। ट्विटर के ट्रेंड इन दोनों पार्टियों के पक्ष में हो या खिलाफ, ये मजबूत उपस्थिति के साथ उस पर रहती हैं। दिल्ली में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी काफी अधिक है, इसलिए यहां एक लड़ाई इंटरनेट पर भी देखने को मिलेगी।  भाजपा के इस फैसले ने दिल्ली का विधानसभा चुनाव जो अरविंद केजरीवाल बनाम मोदी या अन्य था, उसे अरविंद केजरीवाल बनाम किरन बेदी कर दिया।  

1998 के बाद सत्‍ता में कभी सत्‍ता में वापस नहीं आ सकी भाजपा 
दिल्ली मध्यवर्ग का केंद्र रहा है। इस वर्ग में शुरू से बीजेपी और उसके मातृ संगठन आरएसएस की पैठ रही है। 1993 में संविधान संशोधन के बाद दिल्ली में पहली सरकार बनी तो उसमें भाजपा ने 70 सीटों में 49 सीटें जीती थी। लेकिन इस दौरान उसने मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज के रूप में तीन मुख्यमंत्री बदले। उसके बाद भाजपा की सत्ता पर कभी वापस नहीं सकी। 1998 मेंं ऐसा माना जाता है कि प्याज के दामों वृद्धि के कारण भाजपा चुनाव हार गई और शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं और लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहीं। 15 वर्षों में कांग्रेस ने मध्यवर्ग के साथ निम्न मध्यवर्ग को साधे रखा।
 
2011 में दिल्ली मेंं इस मध्यवर्ग ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दिल्ली में जनलोकपाल और निर्भया कांड जैसे दो बड़े आंदोलन हुए, जिसने सरकार को झुकने को मजबूर कर दिया। जनलोकपाल आंदोलन में दिल्ली ने भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ने वाले दो योद्धा किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल देश को दिए। किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल में कई समानताएं हैं। दोनों ही आईआईटी से पढ़े हुए हैं। एक पूर्व आईपीएस है तो दूसरा आईआरएस। दोनों रमन मैगसेसे पुरस्कार पा चुके हैं और राजनीति को ना-ना करते-करते सामाजिक कार्यकर्ता से अब नेता बन चुके हैं। किरण और अरविंद, दोनों ने अपने बल पर मुकाम हासिल किया है। हालांकि, देखने में दोनों समान उम्र के लगते हैं। मगर अरविंद केजरीवाल 1949 में पैदा हुईं किरण बेदी से 19 साल छोटे हैं।

मील का पत्थर साबित हुआ 2013विधानसभा चुनाव 
   दिसंबर 2013 को दिल्ली का विधानसभा चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ। इस दौरान आम आदमी पार्टी (आप)ने धमाकेदार इंट्री करते हुए 28 सीटें जीतीं। निम्नमध्य वर्ग और मध्यवर्ग का वोट बंट जाने के कारण सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी भाजपा दिल्ली की सत्ता में नहीं आ सकी। आप ने कांग्रेस के समर्थन से 49 दिनों तक शासन किया। सरकार छोड़ने के कारण उनकी शास को धक्का लगा। लोकसभा चुनावों के पूर्व सरकार के पतन से अरविंद केजरीवाल के समर्थन में मध्यवर्ग के तेजी से गिरावट आई। 2014 में हुए लोकसभा के चुनावों में यह मध्य वर्ग भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया। यही कारण है कि दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा सीटों को जीतने में सफल रही।

इस बार संशय में मध्यवर्ग 
हालांकि सभी सातों सीटों पर आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही। ‘आप’ के खिलाफ सबसे बड़ी घेराबंदी यह है कि उसे सरकार चलाने का मौका मिला और उसने सरकार छोड़ दी।  हालांकि सरकार छोड़ने के लिए केजरीवाल लोगों से बार-बार माफी मांगी। ऐसे में अरविंद केजरीवाल को लेकर मध्यवर्ग इस बार संशय में है। हालांकि भ्रष्टाचार रोकने के लिए लिए गए निर्णय और बिजली-पानी के बिलों में कमी के कारण वह निम्नमध्य वर्ग में अभी भी लोकप्रिय हैं। पिछली बार आम आदमी पार्टी पहली बार चुनाव लड़ रही थी और लोगों को उनकी स्थिति को लेकर संदेह था। इस बार वह मुख्य मुकाबले में आ गई है। पिछले चुनाव के तुलना में इस बार मुसलमानों का ज्यादा वोट मिलने की संभावना है क्योंकि कांग्रेस अभी मुकाबले में नहीं है।


उच्च मध्यवर्ग और मध्य वर्ग में लोकप्रिय हैं किरन बेदी    
अरविंद केजरीवाल के बरक्स किरन बेदी उच्च मध्यवर्ग और मध्य वर्ग में लोकप्रिय हैं। दिल्ली में रहने वाले लगभग चार फीसदी पंजाबी वोट में से काफी हिस्सा मिलने की संभावना है क्योंकि वह खुद पंजाबी समुदाय से हैं। वह महिलाओं में भी काफी लोकप्रिय हैं क्योंकि उनकी छवि एक दबंग और बेदाग महिला अफसर की है। यही कारण है कि चुनाव के दौरान वह महिला सुरक्षा के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही हैं। हालांकि उन्हें राजनीति का अनुभव नहीं है। आंदोलन की तुलना में राजनीति ज्यादा लचीलेपन की मांग करती है, जैसाकि इस विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल दिखा रहे हैं। वह सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और किरन बेदी पर सीधे-सीधे वार नहीं कर रहे हैं। ऐसे में क्या किरन बेदी अपने आप को राजनीति के अनुरूप ढाल पाएंगी, यह मौजूं सवाल है। जानकारों का मानना है कि किरन बेदी का स्वभाव राजनीति के आड़े आ सकता है। एक टीवी शो के दौरान उलझे हुए सवालों के कारण वह शो बीच में छोड़कर चली गईं।

टीवी पर आमने-सामने बहस से किया इनकार
इसके अलावा किरन बेदी अब तक खुद को गांधीवादी मानती रही हैं, जबकि वह जिस दल में शामिल हुईं हैं, वह हिन्दुत्व की विचारधारा में विश्वास रखती हैं। ऐसे में दोनों में तालमेल में बिठाना उनके लिए कठिन साबित हो सकता है। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल ने टीवी पर आमने-सामने बहस के लिए आमंत्रित किया तो बेदी ने उसे नकार दिया और कहा कि विधानसभा में चुने जाने के बाद बहस करेंगे। वह यह जानती हैं कि बहस के दौरान कई ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा, जिसके लिए वह तैयार नहीं हैं। कई और सवाल हैं, जिनसे रूबरू होना है। दिल्ली में रहना और समस्याओं को जानना दो अलग-अलग बातें हैं। वह सामाजिक कार्यों से लंबे समय से जुड़ी रही हैं और राजनीति में भाजपा की प्रशंसक लंबे समय से थीं। 

 झुग्गी झोपड़ियों में लोकप्रिय हैं अरविंद 
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि ‘अरविंद केजरीवाल अपने उन निम्न मध्यवर्ग और गरीब समर्थकों की भाषा बोलते आ रहे हैं, जो अपनी तंगहाली के लिए व्यवस्था को कोसते आए हैं। यही वह मोर्चा है जहां किरन बेदी को अरविंद केजरीवाल को मुकाबला करने में मुश्किल होगी। खासकर कारोबारी घरानों पर केजरीवाल के हमलों का, जिसे सुनने वालों की तादाद दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में काफी है।’

 विधानसभा चुनाव में बिजली और पानी का मुद्दा यहां दूसरे राज्यों से अलग है। आप दिल्ली में बिजली के दाम आधे करने और प्रति परिवार प्रतिमाह 700 लीटर पानी मुफ्त फ्री में देने के वादे के साथ मैदान में है। पिछली बार सब्सिडी देकर आप की सरकार ने यह राहत दी थी। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में लोगों को बिजली के दाम आधा करने का वादा किया। भाजपा भी बिजली के दाम 30 प्रतिशत घटाने की बात पिछले घोषणा-पत्र में कर चुकी है। प्रधानमंत्री ने अपनी रैली में उस राहत का तो कोई जिक्र नहीं किया, लेकिन बिजली कंपनियों में स्पद्र्धा और बिजली अपनी पसंद की सप्लायर कंपनी से लेने की सुविधा की बात जरूर कही है। हालांकि चुनावी विज्ञापनों में बिजली के दाम आधा करने का वादा कर रही है। पिछले चुनाव में ’आप’ ने पूरे चुनाव का पहला मकसद जन-लोकपाल बताया था।

चुनाव जीतने के बाद रामलीला मैदान में आम जनता के सामने जन-लोकपाल बिल पास कराना उसका सबसे बड़ा एजेंडा था। इस बार जन-लोकपाल उसके मुद्दों की तालिका में है, मगर कई घोषणाओं के बाद। इसको लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। भाजपा, जिसने पिछली बार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने को अपने घोषणा-पत्र के प्रमुख मुद्दों में रखा था, इस बार इस मसले पर बगलें झांक रही है। केंद्र में भाजपा सरकार होने के कारण घेराबंदी भी यही है कि जब अन्य प्रस्तावों के लिए अध्यादेश आ सकते थे, तो दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे के लिए क्यों नहीं? 15 साल राज्य और 10 साल केंद्र में रही कांग्रेस भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की पक्षधरता दिखा रही है।

 दिल्ली का चुनाव देश में बदलाव का सूचक होगा। भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की ओर से तीन नए चेहरे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में दस फरवरी को ही देखने को मिलेगा कि दिल्ली का नेत्त्व किसे मिलता है।    


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