Tuesday, October 6, 2015

जब तक दुख और असमानता है तब तक भक्ति आंदोलन प्रासंगिक रहेगा



राजेंद्र प्रसाद अकादमी और लिखावट के तत्वावधान में 21 मार्च (शनिवार) को आईटीओ स्थित राजेंद्र भवन में युवा आलोचक डॉ. मनोज कुमार सिंह की पुस्तक ‘भक्ति आंदोलन और हिंदी आलोचना’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा जामिया सहित कई विश्वविद्यालयो से बड़ी संख्या में लोग आए हुए थे। कवि और आलोचक मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा कि आज भी भक्ति आंदोलन उसी तरह प्रासंगिक है, जिस तरह मध्य काल में प्रासंगिक था। उन्होंने सूरदास के एक पद का उदाहरण देते हुए कहा कि ग्वाल-बाल और श्रीकृष्ण के बीच बराबरी का संबंध था। आलोचक अजीत कुमार ने कहा कि यह पुस्तक ठस्स सैद्धांतिक होने की जगह काफी व्यवहारिक है। यह वर्तमान से संवाद करने वाली पुस्तक है। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि यह भक्ति आंदोलन के लिए अनिवार्य पुस्तक है। भक्ति आंदोलन ने साहित्य और सत्ता के संबंध को परिवर्तित किया।
   उन्होंने कहा कि भक्ति आंदोलन का सीधा संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ता है। यही कारण है कि श्रम की महत्ता को महत्व देते हुए गांधी जुलाहे की तरह चरखे से कपड़ा बुनते हैं और तुलसी दास की तरह राम राज्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं। वरिष्ठ आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि आजकल भक्ति में समानता की जगह विभिन्नता पर जोर दिया जाता है, जोकि गलत है। हिंदी आलोचकों ने भी विभिन्नता की जगह समानता पर जोर दिया है। भक्ति आंदोलन को लेकर जो विभेद और अलगाव पैदा करने की कोशश चलती रही है, उसको यह किताब तार्किक ढंग से मोर्चाबंदी करती है।
 उन्होंने कहा कि भक्ति की अवधारण मूलत: सेकुलर सोसाइटी की अवधारणा है। इनमें जो समानता के बिंदु हैं, वह सेकुलर है। आज के समय में भक्ति को डी कांस्ट्रक्ट किया जाता है, जोकि ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि आज के समय में साधु-साधुनियां पैदा हो गई हैं, उनका जुड़ाव भक्ति से नहीं है। ये सभी मूलत: पावर डिस्कोर्स के कारण पैदा हुए हैं, जबकि भक्ति इनके विरोध में है। उन्होंने कहा कि आचार्य शुक्ल ने कहा था कि रीति काल में मौलिकता का अभाव है। मौलिकता का प्रसंग मूलत: भक्ति काल से पैदा होता है।
वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि लोक में कुछ अच्छी बातें हैं तो कुछ बुरी बातें भी हैं, इसे स्वीकार करने की जरूरत है। समकालीन आलोचना में परंपरा का मूल्यांकन काफी कम हो गया है। यह पुस्तक दो परंपराओं का मूल्यांकन करने में कामयाब रही है। यह पुस्तक नाभादास, मिश्रबंधु से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पीतांबर बड़थ्याल, आचार्य हजारी प्रसाद दिवेद्वी, परशुराम चतुर्वेदी, राहुल सांस्कृत्यायन, रांगेय राघव, डॉ. रामबिलास शर्मा, नामवर सिंह, रमेश चंद्र मिश्र तक की आलोचना का मूल्यांकन करती है। ऐसे उत्तर आधुकनिक समय में जब भाषा अपठनीय हो गई, ऐस में यह पुस्तक अपनी पठनीयता के चलते विशिष्ट स्थान रखती है। अंत में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि मनोज कुमार सिंह की पुस्तक भक्ति आंदोलन के सैद्धांतिक और व्यवहारिक आलोचना का समान रूप से मूल्यांकन और विश्लेषण करती है। भक्ति काल लगभग एक हजार साल तक चला, ऐसे में इसे आंदोलन कहने के बजाय प्रवाह कहा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। सभी आलोचकों ने इस पुस्तक में भक्ति आंदोलन और हिंदी आलोचना के सभी बिदुओं को गहराई से विश्लेषित करने के लिए युवा आलोचक को बधाई दी।
   पुस्तक की वैचारिक स्पष्टता, भाषा की पारदर्शिता और पठनीयता की सभी आलोचकों ने प्रशंसा की। युवा आलोचक डॉ. मनोज कुमार सिंह ने कहा कि भक्ति आंदोलन की बड़ी विशेषता आत्मालोचन की है, जो हमारे दौर में सिरे से गायब है। नैतिकता को समाज पर लादने की जरूरत नहीं है बल्कि अपने-आप को नैतिकता से परखने की जरूरत है, जो भक्ति काल के सभी कवियों के यहां देखा जा सकता है। कार्यक्रम के संचालन पत्रकार प्रियदर्शन बीच-बीच में अपनी टिप्पिणयों से माहौल को सारगर्भित बनाते रहे।

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