Tuesday, October 6, 2015

भविष्‍य में क्‍या होंगे वैकल्पिक राजनीति के मु्द्दे

 क्या आदर्श राज्य का विचार वाकई यूटोपिया है? क्या व्यवस्था परिवर्तन का विचार एक कल्पना भर है? इसको लेकर सवाल कौंध जाता है। कई बार यह भी सवाल आता है कि देश में जैसा चलता रहता है, क्या वैसा ही चलता रहेगा तो जवाब यह आता है कि आम जनता तो बदलाव चाहती है, लेकिन सत्ताधारी वर्ग, अमीर और नौकरशाही इस बदलाव में बार-बार रोड़े अटकाते हैं। आम जनता सच्चे और ईमानदार लोगों को चाहती है, यह बार-बार साबित हो चुका है। सवाल ऐस में यह है कि बदलाव की दिशा क्या हो और कैसी हो। जब तक राजनीति में आंदोलन और सरोकार के तत्व के शामिल न हों तो वह राजनीति समाज में कोई बदलाव नहीं ला सकती है। भारतीय लोकतंत्र में पिछले छह दशकों में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव की तस्वीर साफ नहीं रही है। कम से कम ज्यादातर राजनीतिक दलों को लेकर यही स्थिति है। मौजूदा समय में राजनीति दलों के कार्यकलापों और उनके घोषणापत्रों में कोई भी साम्यता नहीं दिखाई देती है। यह बीमारी अब सभी दलों की जड़ों को सड़ा चुकी है। राजनैतिक दलों में वैचारिक शून्यता स्पष्ट दिखाई देती है। सत्ता प्राप्त करने के बाद ये दल राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक विकास के स्थान पर खुद के आर्थिक विकास में जुट गए हैं। ऐसे में ही वैकल्पिक राजनीति के लिए रास्ता खुलता है। आजादी के बाद भारतीय समाज में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से कई महत्वपूर्ण बदलावों का दौर चला, जो लगातार जारी है। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण आदि ने समय-समय पर किए भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक बदलाव को लेकर पहल की। आजादी के बाद समय-समय पर इसके लिए कई बार प्रयत्न किए गए। 1975 में आपातकाल के नाम पर जब लोकतंत्र पर हमला हुआ तो सभी देशवासी उसके खिलाफ उसके खिलाफ उठ खड़े हुए। कई क्षेत्रों में हमने जो लक्ष्य हासिल किया है, उससे हमें प्रेरणा मिलती है। लेकिन काफी ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें बदलाव किया जाना बाकी है। वैकल्पिक राजनीति ऐसा ही प्रयत्न है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में किया जाने वाला सामूहिक प्रयास है। आज के दौर में भी कई ऐसे संगठन हैं, जिन्होंने वैकल्पिक राजनीति को लेकर मजबूत आधारशिला रखी है। हालांकि राजनीति में वे उस तरह सफल नहीं हुए, जिस तरह आंदोलनों में सफल हुए। लेकिन उनकी कोशिशें समाज में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण साबित हुई हैं। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सामाजिक, आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना 2011 के आकड़े जारी किए। ये आकड़े काफी चिंताजनक हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के गांवों में हर तीसरा परिवार भूमिहीन है। देश के 17 करोड़ 91 लाख ग्रामीण परिवारों में से करीब 10 करोड़ 69 लाख परिवार वंचित माने गए हैं। सिर्फ 4.6% ग्रामीण परिवार आयकर देते हैं। इन आकड़े के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में 75 फीसदी घरों की आबादी पांच हजार रुपये से कम है। इससे पता चलता है कि इस चकाचौंध में ग्रामीण भारत की हालत कितनी खराब है। ऐसे में महात्मा गांधी के ‘हिंद स्वराज’ की याद आती है, जिसमें उन्होंने शहरीकरण की जगह ग्रामीण भारत के सशक्तिकरण पर जोर दिया था। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाए बिना विकास की परिकल्पना अधूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण मेट्रो शहरों की ओर विस्थापन काफी तेजी से बढ़ा है। देश में आर्थिक सुधारों का जो सिलसिला शुरू किया, उसके 24वें साल में भारत कहां खड़ा है? यह ठीक है कि इस दौरान रोजगार के अवसर बढ़े, प्रति व्यक्ति आय बढ़ी, लोगों की औसत उम्र बढ़ी, राजमार्ग बढ़े, शहरीकरण बढ़ा, भौतिक संसाधन बढ़े, पर यह उजाला अंधेरों की सौगात साथ लाया है। इस दौरान कुछ लोगों की जिंदगियां भले ही रोशन हो गई हों, पर लाखों का जीवन दूभर हो गया। यह ऐसी तल्ख हकीकत है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के 52 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए है। यह दुर्भाग्यजनक है कि मुल्क के 40 फीसदी खेतिहर बैंकों या दूसरी संस्थाओं से नहीं, बल्कि साहूकारों से कर्ज लेते हैं। वे ऐसे मकड़जाल में फंस गए हैं, जहां से उन्हें सिर्फ मौत या विस्थापन बचा सकता है। आज भारी तादाद में किसान मजदूर बनने को विवश हैं। ऐसे में देश के किसानों को छोड़कर कोई भी वैकल्पिक राजनीति नहीं की जा सकती है। देश में कई संगठन में हैं जो किसानों की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन उनको दिशा दिखाने वाला कोई नहीं है। उनमें तात्कालिक मुद्दे हावी हैं। आने वाले समय में वही सरकार और संगठन सत्ता में रह सकता है, जो किसानों की समस्याओं का समाधान साहस के साथ कर सके। नेताओं ने अपनी पार्टियों को प्राइवेट पार्टी के रूप में तब्दील कर दिया है। पार्टियों पर इनके परिवारों का शिकंजा ऐसा कसा हुआ है, जिनमें दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलता है। यही कारण है कि लोगों में वंशवादी राजनीति के खिलाफ नाराजगी है। इसीलिए वैकल्पिक राजनीति को वंशवादी राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोलना होगा। स्वराज की व्याख्या करते हुए महात्मा गांधी ने लिखा था कि ‘सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न करना, फिर वह नियंत्रण विदेशी सरकार का हो या स्वदेशी सरकार का। यदि स्वराज हो जाने पर लोग अपने जीवन की हर छोटी बात के नियमन के लिए सरकार का मुंह ताकना शुरू कर दें तो स्वराज-सरकार किसी काम की नहीं होगी।’ निर्णय लेने में लोगों की भागीदारी को बढ़ना ही मूलत: स्वराज है। वैकल्पिक राजनीति बगैर स्वराज की संकल्पना के नहीं हो सकती है। कई दल इसकी बात तो करते हैं, लेकिन अपने आचरण में इसे नहीं उतारते हैं। यही कारण है कि पार्टियों के स्तर पर केंद्रीकरण बढ़ा है।
 वैकल्पिक राजनीति के लिए जरूरी है कि वे स्वराज की अवधारणा को अपने आचरण के स्तर पर उतारें। अंग्रेज राजनेता, लेखक और इतिहासकार जॉन डालबर्ग-एक्टन ने कहा था कि सत्ता भ्रष्ट करती है और असीम सत्ता, असीमित रूप से भ्रष्ट करती है। कई लोग यह भी कहते हैं कि इस देश में ईमानदार वही है, जो सत्ता से बाहर है। सत्ता हाथ में आते ही भ्रष्ट होना तय है। लेकिन मनुष्य का स्वभाव है कि वह भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए प्रयत्न करे तो नामुमकिन नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर कई लोगों ने इसके लिए मिसाल भी रखी है। एक सर्वे में पाया गया कि भ्रष्ट होने की संभावना बहुत ज्यादा प्रतिशत लोगों में होती है और यह संभावना सत्ता की मात्रा के अनुपात में बढ़ती जाती है। यानी सत्ता बढ़ते ही भ्रष्टाचार भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। नए प्रयोग से यही साबित होता है कि क्रूरता और भ्रष्टाचार के बीज भी इंसान में होते हैं। इसीलिए समाज में ऐसी संस्थाएं बनाई जाती हैं, जो व्यक्तिगत तानाशाही, क्रूरता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रख सकें। सत्ता का विकेंद्रीकरण और संस्थाओं का नियंत्रण असीमित सत्ता और उससे जुड़े असीमित भ्रष्टाचार की आशंका को कम करता है। इसको लेकर भी लगातार प्रयत्न किए जाने की जरूरत है।
 भ्रष्टाचार अभी भी देश में एक ज्वंलत मुद्दा है, इस पर केंद्रित करने की जरूरत है। इसमें बडे़ भ्रटाचार के साथ छोटे-छोटे भ्रष्टाचार पर भी ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जिससे आम लोग पीड़ित होते हैं। अब लोग जाति और समुदाय से हटकर स्वच्छ और गतिशील प्रशासन के लिए वोट देते हैं। यह पिछले कई चुनावों में लोगोंं ने साबित किया है। अब अगले कदम की राजनीति राजनीति संगठनों को करनी होगी। पिछड़ेपन की राजनीति से परहेज करना होगा। हालांकि भारत जैसे देश मेंं जातियों का महत्व है। कई जातियां अभी भी मुख्यधारा से कोसों दूर हैं। पिछड़ी जातियों, मुसलमानों, दलितों और महिलाओं को समाज मेंं बराबरी पर लाने के लिए अलग से पहल करने की जरूरत है, लेकिन अब सिर्फ जातियों की राजनीति से लोग परहेज करने लगे हैं। अगर आपके पास विकास और उन्नति का एजेंडा नहीं है तो आप सिर्फ जाति के सहारे एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सकते। लगभग डेढ़ दशक से महिला आरक्षण बिल संसद में लंबित है। सभी पुरुष प्रतिनिधियों ने अडंगा लगाकर इसे रोक रखा है। कोई भी दल इसको लेकर सीरियस नहीं है। यह बिल लागू होने से समाज में एक महत्वपूर्ण होगा, इसमें कोई शक नहीं है।
 वैकल्पिक राजनीति को लैंगिक भेदभाव और भागीदारी को अपना मुद्दा बनाना होगा, तभी वह बदलाव की वाहक होगी। इसके अलावा शिक्षा, पानी, पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी वैकल्पिक राजनीति को केंद्रित करने की जरूरत है। वहीं लोकतंत्र के विकास के लिए जरूरी है कि राजनीति से लेकर समाज तक सबको अतीत के बोझ से मुक्त करें। हालांकि देश में अलग-अलग क्षेत्रों में इसके लिए लोग आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनको एक मुकम्मल दिशा देने की जरूरत है।
इस उपभोक्तावादी दौर में ‘विचारधारा’ की राजनीति काफी पीछे छूट गई है। क्षेत्रीय दलों के उदय और विस्तार ने इसे और धुंधला कर दिया है। जिस संगठन या राजनीति को आगे बढ़ना है, उसे लोगों के समाने मुकम्मल एजेंडा पेश करना होगा, तभी वह राजनीति या आंदोलन आगे बढ़ सकता है। देश में बह रही सोशल मीडिया की लहर का अगर कोइ्र्र नेता और संगठन इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है तो वह अपना बड़ा नुकसान कर रहा है। नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी अभियान से साबित किया है। किसी भी राजनीतिक दल और संगठन द्वारा सोशल मीडिया का बेहतर इस्तेमाल ही उसकी सफलता का रास्ता दिखाएगा।

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