2014 में मई के महीने में लोकसभा चुनावों के दौरान जब मैं बनारस से अपने घर जा रहा था, तब बस में बैठे लोगों ने तीन घंटे की यात्रा के दौरान कई बार ‘अच्छे दिन आ गए’ नारे लगाए। उस दौरान बस में बैठे सभी वर्गों के लोगों खासकर नौजवानों की आंखों में बदलाव की उम्मीद देख रहा था। उस समय लोगों में नरेंद्र मोदी से उम्मीद, अरविंद केजरीवाल से कौतूहल ओर मनमोहन सरकार से निराशा थी। इसी का प्रतिफलन चुनाव के दौरान देखने को मिला। समाज के सभी वर्गों का वोट प्राप्त करते हुए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। इसके ठीक साल बाद जब मैं बनारस से नई दिल्ली के लिए ट्रेन से आ रहा था तो वहां के लोगों में नई सरकार को लेकर कई आशंकाएं देखने को मिली।
बुनियादी सुविधाओं को ठीक करने के प्रयास
लोगों का कहना था कि विकास के नाम पर कागजों पर तो बहुत कुछ किया जा रहा है लेकिन जमीनी धरातल पर बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। पूर्वी भारत के नौजवानों, जिसे नई सरकार से रोजगार और अवसरों की उम्मीद थी, उसको लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं। एक साल का समय किसी देश में बदलाव के लिए कम होता है, लेकिन उसके बीज इस एक साल में दिखाई देने लगते हैं। हालांकि, इस एक साल में एक बात साफ दिखाई दे रही है कि जगह-जगह गंदगी के ढेर से पटे रहने वाले बनारस में सफाई पर ध्यान दिया गया था और टूटी-फूटी रहने वाली सड़कें दुरुस्त हो गई थीं। बनारस में मेट्रो को लेकर सर्वे हो रहा है। यह स्थिति केवल बनारस की नहीं है कि देश के 50 शहरों में मेट्रो को लाए जाने की कवायद शुरू हो चुकी है। बनारस से लेकर गोरखपुर तक छह लेन का हाईवे बनाया जा रहा है। बुनियादी सुविधाओं को ठीक करने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश में मध्यवर्ग ही ऐसा समूह है, जो लगातार अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है। यह मध्य वर्ग अपनी इच्छाओं से प्रेरित है। यह वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से विभिन्न मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है।दुनिया में ज्यादातर पार्टियां अपने एजेंडे में मध्य वर्ग को फोकस में रखती है। भाजपा ने भी ऐसा ही किया है। पिछला एक साल लोगों की उम्मीदों को दर्शाता है। आर्थिक मोर्चे पर सरकार के लिए यह राहत भरा रहा है। तेल की कीमतों में कमी के कारण लोगों ने महंगाई से राहत महसूस की, वहीं सरकार द्वारा शुरू किए गए जनधन योजना, स्वच्छता अभियान, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, नमामि गंगे, सौ स्मार्ट सिटी का निर्माण, 24 घंटे बिजली आपूर्ति, रेलवे के सुदृढ़ीकरण जैसे प्रोग्रामों से लोगों में उम्मीद बंधी है। सरकार द्वारा रेलवे के बजट में एक भी ट्रेन की घोषणा नहीं करके यह दर्शा दिया कि सरकार की मंशा देश की बुनियाद मजबूत करने की है। सरकार की ओर से लांच किए गए ज्यादातर प्रोग्राम कहीं न कहीं मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर बनाए गए हैंं। यही कारण पिछली सरकारों की तुलना में मध्यवर्ग इस सरकार के निर्णयों से खुश है।
इसकी तुलना में ग्रामीण भारत जिसकी आबादी देश की 65 फीसदी है, उसके लिए सरकार द्वारा कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया है। उनके प्रति सरकार का नजरिया पिछली सरकारों की तरह ही है। भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के कारण ग्रामीण भारत के लोगों में सरकार के कदम के प्रति आशंकाएं हैं। केंद्र सरकार के सामने कर्ज में डूबे किसानों के मुद्दे को सुलझाना अहम है। कुछ महीनों पहले ओलावृष्टि और आंधी तूफान से देश के कई हिस्सों में फसल बर्बाद हो गई थीं। ऐसे में काफी संख्या में किसानों को नुकसान झेलना पड़ा था। ऐसे में देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी किसानों ने आत्महत्या की थी। इसमें केंद्र सरकार ने 50 फीसदी की 33 फीसदी नुकसान पर मुआवजे का ऐलान किया गया। हालांकि यूपी सहित कई राज्य सरकारों ने कहा कि उन्हें केंद्र सरकार की ओर से कोई रकम नहीं मिली। इसके अलावा देश में खेती-किसानी करना अब घाटे का सौदा है। ऐसे में खेती-किसानी की तरफ किस तरह लोगों का झुकाव बढ़े, इसके लिए सरकार को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे क्योंकि देश में अब भी बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है।
लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौ दिन में काला धन लाकर हर भारतीय को 15 लाख रुपये देने की बात कही थी। दिल्ली में विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसे सिर्फ चुनावी जुमला कहा, जिससे पार्टी की काफी भद्द पिटी थी। हालांकि पार्टी अब विदेशों मेंं कालाधन ले जाने से रोकने के लिए संसद में एक विधेयक लाई है, जिससे बजट सत्र में पास कर दिया गया है। इसे लेकर राम जेठमलानी जैसे कानून विशेषज्ञों ने आशंका व्यक्त की है।
वहीं दूसरी ओर मोदी सरकार को लेकर अल्पसंख्यकों के मन में संदेह बरकरार है। सरकार से जुड़े कुछ नेताओं द्वारा समय-समय पर उनके खिलाफ बयान दिए जाने से अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों के मन में सरकार के प्रति शंकाएं बढ़ी हैं। इसको लेकर मोदी ने टाइम मैगजीन सहित कई जगहों पर सफाई दी है कि उनका नजरिया अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है। वह सबका साथ, सबका विकास के नारे में विश्वास करते हैं, लेकिन सरकार के प्रति अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों में शंकाएं बरकरार है। इसके लिए सरकार को विशेष कदम उठाने की जरूरत है।
अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के लिए उनके खिलाफ बोलने वाले राजनेताओं और धार्मिक नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत है। एनडीए सरकार ने पिछले एक साल में नेपाल और भूटान जैसे छोटे देशों के साथ संबंध सुधारने पर जोर दिया है। अप्रैल महीने में भूकंप आने पर नेपाल के लिए उठाए कदमों की नरेंद्र मोदी की प्रशंसा हुई है। लेकिन इसके साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी के साथ संबंध बिगड़ गए हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान भारत की अपेक्षा चीन के ज्यादा करीब हो गया है। ऐसे में सरकार को यह समझना होगा कि दोस्त बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं।
ऐसे में पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने को लेकर पहल करनी ही होगी। इसके अलावा मोदी सरकार की ओर से अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। इससे मेक इन इंडिया जैसी सरकार की मुहिम पर जोर पड़ा है और भारत में विदेशी निवेश आकर्षित हुआ है। पिछले एक साल में ब्रांड ‘मोदी’ की अहमियत लगातार बढ़ी है, इसीलिए सत्ता का केंद्रीकरण हुआ है। यही कारण है कि अरुण शौरी जैसे भाजपा के वरिष्ठ नेता को कहना पड़ा कि सरकार और पार्टी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली के इर्द-गिर्द घूम रही है। विदेश दौरों पर विदेश मंत्री को साथ न ले जाकर खुद नरेंद्र मोदी के जाने से सुषमा स्वराज जैसे नेताओं की अहमियत कम हो रही है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी अन्य प्रधानमंत्रियों की तुलना में तेज काम करने, प्लानिंग और ब्रांडिंग में विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि ट्विटर और अन्य सोशल साइट्स पर सक्रिय रहते हैं। इस कारण मोदी युवाओं में लोकप्रिय हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले एक साल में कोई हाईप्रोफाइल भ्रष्टाचार सामने नहीं आया है, जो सरकार के प्रति लोगों को संतुष्ट करने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यही कारण है। महानगरों में अभी भी मोदी सरकार की पकड़ मजबूत है। लेकिन छोटे नगरों में बहुत कुछ किया जाना बाकी है, जहां लोग अभी बेरोजगारी, महंगाई और कई बुनियादी समस्याओं को लेकर जूझ रहे हैं।
उद्योगों का विकास न होने और काम की समस्या के कारण ग्रामीण और छोटे नगरों से महानगरों की ओर प्रतिभा का पलायन अभी भी जारी है। आने वाले दिनों में सरकार को कई मोर्चे पर जूझना पड़ सकता है। जैसे यदि तेल की कीमतें फिर बढ़ीं तो लोगों को फिर महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। वहीं उत्तर और पश्चिमी भारत के लोगों में समृद्धि आई है, उसकी तुलना में पूर्वी भारत अभी भी काफी पिछड़ा है। इसका उल्लेख नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में भी किया है। इसके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उद्योगों की स्थापना और निवेश की संभावना के लिए बेहतर माहौल बनाना होगा।
सरकार के लिए बेहतर बात यह है कि उसके सामने मजबूत विपक्ष नहीं है। उसका बहुमत सिर्फ राज्यसभा में है, जहां सरकार को भूमि अधिग्रहण बिल सहित कई बिलों को लेकर जूझना पड़ना है। कांग्रेस में उत्साह हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा। राहुल गांधी ने दो माह के विश्राम से लौटने के बाद कुछ मुद्दे तो उछाले हैं, लेकिन जनता का आत्मविश्वास जीतने के लिए अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा। जनता परिवार अभी भी बिखरा हुआ है। बिहार चुनाव में अपनी एकता को दर्शाना होगा। वहीं अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अपनी हरकतों के कारण जनता में क्रेज खोते जा रहे हैं। उम्मीद है कि मोदी जिन मोर्चों पर अब तक असफल रही है, उस पर कदम बढ़ाएगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसे कई क्षेत्रों में सरकार को बेहतर तरीके से पहल करने की जरूरत है।

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