Friday, October 9, 2015

इस दौर में भी मलूकदास के दोहे हैं प्रासंगिक

मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में संत परंपरा की अंतिम कड़ी के रूप में संत शिरोमणि मलूकदास के दोहे मानवीय मूल्यों को स्थापित करने तथा सामाजिक समरसता को बनाए रखने में आज भी प्रासंगिक हैं। 
     मलूकदास का जन्म यूपी के कौशाम्बी जिले के ऐतिहासिक स्थान कड़ा में सम्वत 1631 मे वैशाख वदी पंचमी को हुआ था और 1०8 वर्ष का लम्बा जीवन जीकर इस संत ने इस संसार से महाप्रयाण किया। भक्ति भावना से अभिभूत इस संत ने अपने विचार और अनुभव दोहों के रूप में गाये। दोहे इतने लोकप्रिय हुए कि दूर-दूर तक कुछ भी न जानने वाले किसानों-मजदूरों से भी उन्हें आज भी सुना जाता है। 
अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काज। दास मलूका कह गये, सबके दाता राम।

     मलूकदास का यह दोहा सम्पूर्ण विश्व में अपनी सारगर्भिता को लेकर साहित्यकारों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। इस दोहे को लेकर लोग इस संत को न केवल याद करते हैं बल्कि उनकी स्मृति को अपने जेहन मे सहेज कर रखे हुए हैं। 
     मलूकदास के इस दोहे को अनेक हिन्दी विद्वानों ने अकर्मण्यता से पूरित बताया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तो इसे काहिलों का मूलमंत्र कहा था। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने इस दोहे को घोर भाग्यवादी रचना के रूप मे स्वीकार करते किया था, लेकिन इस दोहे मे प्रयुक्त शब्दो का अभिप्राय अजगर और पंछी से नही है। परमात्मा की ओर से उनकी कृपा एवं दानशीलता में कोई पक्षपात नही किया जाता है।

दया और करुणा से ओतप्रोत जीवन
इस संत का समूचा जीवन दया और करुणा से ओतप्रोत रहा और इसीलिए वह आजीवन परोपकार एवं दीन-दुखियों की सेवा या दु:ख निवारण में तल्लीन रहे। बाह्य आडम्बरों पर विश्वास न करके वह दूसरे के दु:खों और अभावों को गहराई से महसूस करते थे। भूखों को भोजन कराना, सर्दी से कपकंपाते गरीब साधू-संतों को वस्त्र और कंबल बांटना, गंगा स्नान करने आने वाले यात्रियों के मार्ग में पड़े कंकड़ पत्थरों को साफ करना उनकी नित्य की सेवा बना गई थी। पत्थर पूजने के बजाय दु:खी इंसानों के दु:ख निवारण को वह परमात्मा तक पहुंचने का सुगम मार्ग मानते थे।
    भूर्खेंह टूक प्यार्संह पानी। यहै भगति हरि के मन मानी।। 
दया धरम हरिदे बसै बोले अमृत बैन। तेई ऊँचे जानिये जिनके
नीचे नैन।।
 
  मलूकदास इस भौतिक संसार को निष्फल बताते हुए कहा करते थे कि यहां के सभी रिश्ते नाते झूठे हैं। सद्गति के लिए तो राम से नाता जोड़ना चाहिए।

     मलूकदास संसारिक सुखों में आसक्त न होने की सलाह देते हुए कहते हैं कि संसारिक वस्तुओं में क्षणिक सुख है लेकिन परोक्ष में दु:ख बहुत हैं।
जेते सुख संसार के इकट्ठे किया बहोर। कन थोरे कांकर घने देखा फटक पछोर।। 

पाखंड, आडम्बरों, भेदभाव और संघर्षों की भर्त्‍सनामलूकदास ने धर्म के नाम पर चल रहे पाखंड, आडम्बरों, भेदभाव और संघर्षों की भर्त्‍सना की तथा इंसान को इंसानियत से जोड़ने का प्रयास किया। हिंदू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। उन्होंने तीर्थों में भ्रमण के बजाय मानव मात्र के प्रति दया धर्म अपनाये जाने पर जोर दिया।
मक्का, मदीना, द्वारिका, बद्री और केदार। बिना दया सब झूठ है कहै मलूक विचार।।

समाज के सबसे कमजोर बेसहारा व्यक्ति की सहायता करना एवं उनके जीवन में खुशियां बिखेरना मानव जीवन की सार्थकता बताते हुए संत मलूकदास ने कहा 
जे दु:खिया संसार मे खोवौ तिनका दुक्ख।
दालिददर सौपी मलूक को लोगन दीजै सुक्ख।।

हिंदू-मुसलमानों दोनो के प्रिय 
मलूकदास अपने चमत्कारिक व्यक्तित्व के कारण हिंदू-मुसलमानों दोनो के प्रिय थे। दोनों उनका आदर करते थे। भारत के अलावा नेपाल एवं अफगानिस्तान में उनके शिष्य थे। बादशाह औरंगजेब ने स्वयं इस संत के चरणों मे नतमस्तक होकर कड़ा का जाजिया कर माफ कर दिया था तथा उनके कहने पर सिपाही फतेह खां को सिपहसालार बना दिया था, लेकिन इस पद को ठुकराकर फतेह खां ने अपना सम्पूर्ण जीवन इस संत की सेवा में अर्पित कर दिया था। मरने के बाद फतेह खां की समाधि मलूकदास की समाधि के पास बनायी गई जो वर्तमान में राष्ट्रीय एकता की बेमिसाल नमूने के रूप में कड़ा में स्थित है।
     आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना संतों में रही है। मलूकदास भी आराध्य देव के प्रति पूर्ण समर्पित थे। उनकी निष्काम भक्ति का परिचय उनके निम्न दोहे से होती है।
माला जपौ न कर जपौं जिभ्या कहै न राम। सुमिरन मेरा हरि करै, मै पयों विश्राम।। 
 इस संत का संपूर्ण जीवन हिंदू मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ सत्य साधना और प्रेम से परिपूर्ण रहा और इसीलिए भारतीय संतों की परम्परा में संत मलूकदास का जीवन अनुकरणीय है। समय की बेरूखी के कारण इस संत का आश्रम एवं कृतियां उपेक्षित हैं, किन्तु कड़ा में स्थित उनकी तपोस्थली का पुर्ननिर्माण हो रहा है। उनकी रचनाओ का समावेश अब भी शैक्षिक पाठ्यक्रमों में पूरी तरह नहीं हो सका है।

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